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चंचल मन छी समेट के रखने

तैं बुझा रहल छी अति गंभीर
मुँह अछैते बौक बनल छी
बिनु गुज्जी के कान बहीर


ब्रह्मा चूक जरुर केने छथि
एहि सृष्टिक निर्माण में
हमर कार्य स्थिर कए देलन्हि
भूत भविष्य वर्तमान में

सुनि रहल छी आलोचना आ
निष्कलंको रहैत कलंकित छी
घर-घर क्रंदन घर-घर रोदन
शापक भय स' आतंकित छी


कियो कहैइयै समय डकूबा
हत्यारा कहि झारय रोष
कियो कहय दिन हमरो घुमतै
मुदा एखन अछि समयक दोष


स्वार्थक आगू आन्हर मानव
क' लैइयै हमरहु स' छल
मोनक मनोरथ पूर भेला पर
बाजय पौलहुं अप्पन कर्मक फल

सदिखन हमरे दोष नै दिय'
निर्दयी कहि जुनि करू अधीर
उलहन सुनि-सुनि कान पाकि गेल
बनि गेल छी आब मूक-बधिर


मुदा हमर के बुझत भावना
जे हम कियै स्तब्ध छी
हमर व्यथा के आबि के पूछत
जे हम कियै निःशब्द छी


दुखी जीवन आ जन कष्ट देखि-देखि
होइयै हमरो हृदयाघात
कियैकि हम छी समय आ
एहि तरहें होइयै हमरा अश्रुपात

मनीष झा "बौआभाई"
ग्रा.+पो.- बड़हारा
भाया-अंधरा ठाढ़ी
जिला-मधुबनी (मिथिला)
Blog: http://www.manishjha1.blogspot.com

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  1. बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

    बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
    अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर

    सनसनाते पेड़
    झुरझुराती टहनियां
    सरसराते पत्ते
    घने, कुंआरे जंगल,
    पेड़, वृक्ष, पत्तियां
    टहनियां सब जड़ हैं,
    सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

    बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
    पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
    पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
    तड़तड़ाहट से बंदूकों की
    चिड़ियों की चहचहाट
    कौओं की कांव कांव,
    मुर्गों की बांग,
    शेर की पदचाप,
    बंदरों की उछलकूद
    हिरणों की कुलांचे,
    कोयल की कूह-कूह
    मौन-मौन और सब मौन है
    निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
    और अनचाहे सन्नाटे से !

    आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
    महुए से पकती, मस्त जिंदगी
    लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
    पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
    जंगल का भोलापन
    मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
    कहां है सब

    केवल बारूद की गंध,
    पेड़ पत्ती टहनियाँ
    सब बारूद के,
    बारूद से, बारूद के लिए
    भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
    भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

    फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    बस एक बेहद खामोश धमाका,
    पेड़ों पर फलो की तरह
    लटके मानव मांस के लोथड़े
    पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
    टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
    सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
    मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
    वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
    ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
    निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
    दर्द से लिपटी मौत,
    ना दोस्त ना दुश्मन
    बस देश-सेवा की लगन।

    विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
    अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
    बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
    अपने कोयल होने पर,
    अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

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  2. बहुत निक प्रस्तुति बौआ भैया अहिना धराधर लिखैत रहू..

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  3. bah, bad neek

    सुनि रहल छी आलोचना आ
    निष्कलंको रहैत कलंकित छी
    घर-घर क्रंदन घर-घर रोदन
    शापक भय स' आतंकित छी

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  4. दुखी जीवन आ जन कष्ट देखि-देखि
    होइयै हमरो हृदयाघात
    कियैकि हम छी समय आ
    एहि तरहें होइयै हमरा अश्रुपात
    neek

    उत्तर देंहटाएं

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