समयक अश्रुपात - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 18 मई 2010

समयक अश्रुपात


चंचल मन छी समेट के रखने

तैं बुझा रहल छी अति गंभीर
मुँह अछैते बौक बनल छी
बिनु गुज्जी के कान बहीर


ब्रह्मा चूक जरुर केने छथि
एहि सृष्टिक निर्माण में
हमर कार्य स्थिर कए देलन्हि
भूत भविष्य वर्तमान में

सुनि रहल छी आलोचना आ
निष्कलंको रहैत कलंकित छी
घर-घर क्रंदन घर-घर रोदन
शापक भय स' आतंकित छी


कियो कहैइयै समय डकूबा
हत्यारा कहि झारय रोष
कियो कहय दिन हमरो घुमतै
मुदा एखन अछि समयक दोष


स्वार्थक आगू आन्हर मानव
क' लैइयै हमरहु स' छल
मोनक मनोरथ पूर भेला पर
बाजय पौलहुं अप्पन कर्मक फल

सदिखन हमरे दोष नै दिय'
निर्दयी कहि जुनि करू अधीर
उलहन सुनि-सुनि कान पाकि गेल
बनि गेल छी आब मूक-बधिर


मुदा हमर के बुझत भावना
जे हम कियै स्तब्ध छी
हमर व्यथा के आबि के पूछत
जे हम कियै निःशब्द छी


दुखी जीवन आ जन कष्ट देखि-देखि
होइयै हमरो हृदयाघात
कियैकि हम छी समय आ
एहि तरहें होइयै हमरा अश्रुपात

मनीष झा "बौआभाई"
ग्रा.+पो.- बड़हारा
भाया-अंधरा ठाढ़ी
जिला-मधुबनी (मिथिला)
Blog: http://www.manishjha1.blogspot.com