गजल - जगदानन्द झा 'मनु' - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

गजल - जगदानन्द झा 'मनु'



मनुखक एहि दुनियाँमे कोनो मोल नहि रहल
हमरा लेल केकरो लग  दूटा बोल नहि रहल 

बजाएब  कतए ककरा  सभटा साज टूटिगेल 
छल एकटा फूटल ओहो आब ढोल नहि रहल 

सभतरि घुमैत अछि   मनुखक भेषमे हुडार
नुकाबै लेल ओकरा लग कोनो खोल नहि रहल  

रातिक भोजन ओरिआनमे माएक मोन अधीर 
छल हमर बाड़ीमे एकटा से ओल नहि रहल 

हँसैत आ मुस्काइत रहए जतएकेँ लोकसभ 
मिथिलाक गाममे 'मनु' आब ओ टोल नहि रहल 

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९)