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के पतियाएत
ई कएकरा कहु
सभक आँखिमे
पसि कए कोना रहु

सदिखन आँगुर
हमरेपर उठल
कतेक परीक्षा
आबो सहु

जतए ततए हमहीँ
लूटल गेलहुँ
घर बाहर सभतरि
हमहीँ ठकेलहुँ

हम नारी नहि
नरकेँ भोग्या
सबदिन हमहीँ
जितल गेलहुँ 

झूठ्ठे घर-घर 
पूजल जाइ छी
मुड़ी मचौरि हम
भोगल जाइ छी

आबू रावण
बनि भाइ हमर
रामसँ पाछू
छुटल जाइ छी | 
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जगदानन्द झा ‘मनु’                        

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