बाणवीर- कथा- गजेन्द्र ठाकुर - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 15 जुलाई 2009

बाणवीर- कथा- गजेन्द्र ठाकुर


साढ़े तीनसँ चारि फीटक बीच लेटराक लम्बाइ छल। सभ कहैत छैक जे ओकर माए-बाप दोसराक बच्चाकेँ देखि कए भुट्टा-भुट्टा कहैत रहैत छलथि।से पता नहि की भेलैक लेटरा तकरा बादसँ बढ़िते ने अछि, ओकर लम्बाइ एकदम्मेसँ बढ़ब रुकि गेलैक।
“धुर! माए-बापक कतहु नजरि लगैत छैक बच्चाकेँ”।
“नञि यौ, माएक तँ लगिते छैक, देखियौ ने लेटराकेँ”।
गौआँ सभ आपसमे गप करथि। जे से, सभ बच्चा पैघ भेल। बढ़ए लागल । मुदा लेटरा घुटमुटाएले रहल। सभ क्यो ओकरा परोक्षमे लेटरा आ मुँहपर लेटरबम कहए लगलाह।
लेटरबमक माए-बापकेँ जमीन-जाल ततेक नहि। से महीसेपर निर्भर छलन्हि हुनकर सभक जीवन। लेटरा महीसक सेवामे भोरेसँ लागल रहैत छल। भोरमे भोरहा कातमे रगड़ि-रगड़ि कऽ चिक्कन बना दैत छल महीसकेँ। पुआरक नूरीसँ साफ करैत काल गोट-गोट अठौरी निकालि दैत छल। बेरू पहर बौआ-चौड़ीमे महीस चरबैत काल निसभेर भऽ सूति रहैत छल महीसक पीठपर।
लोक सभ हँसीमे कहितो रहए जे लेटरबम बौआ-चौड़ी हाइ स्कूलसँ मैट्रिक पास कएने अछि। महीसो लक्ष्मी रहए ओकर। आन माल-जाल सिंह लड़ाबए तँ लेटरबमक महीस घास चरबामे लागल रहए। से साँझमे घर-घुरैत काल जखन आन सभ गोटेक महीसक पेट पाँजरमे धसल रहैत छल, लेटराक महीसक दुनू पेट दुनू दिसन फूलि कए लटकि जाइत छल। बिना परिश्रम पन्हाइत छलैक महीस।
लेटरा अपन माए-बापकेँ तैयो प्रसन्न कए सकल की? ओ दुनू गोटे लेटराक गुजर कोना चलतैक, ओकरासँ बियाह के करतैक- एहि बात सभकेँ लऽ सोचिते रहैत छलाह।


गाममे बैतरणी नाटक आएल रहैक। कठपुतली सभ, मनुक्खक मरलाक बाद बैतरणी धार पार करबाक दृश्य, जे भयावहे-भयावह छल, खूब नीज जेकाँ प्रदर्शित करैत छलाह।
लेटरबम सेहो माए-बापक संग नाटक देखि अएलाह। आ एतहिसँ लेटराक जीवन एकटा दिशा लए लेलक। लेटराक बाबूक पाछाँ बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लागि गेल। धरोहि दऽ देलक, साँझ-भोर ओकर घरपर पहुँचए लागल।
लेटरा अपन महिसबारीमे मगन रहैत छल। मुदा ओ अनुभव करए लागल जे आइ-काल्हि माए-बाप ओकरापर किछु बेशीए ममता राखए लागल छथि। सभ कहैत रहओ जे लेटराक जीवन कोना के चलतए, से की ओकर माए-बाबूपर आब कोनो असरि थोड़बेक पड़तए।
मुदा बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लेटराक बापक पाछाँ पड़ि गेल। कहए लागल जे ओ तँ लेटराकेँ नीक नोकरी दियबा रहल अछि। लेटरबमक बाबू सभसँ पुछथि जे की करी? सभ यैह कहैत रहन्हि जे ओ लेटराकेँ कीनि रहल अछि, नोकरी नहि दऽ रहल अछि। ई नाटक कम्पनी सभ बणवीर सभकेँ गामे-गाम तकने फिरैत अछि आ शहरी सर्कस कम्पनी सभकेँ बेचि दैत अछि। फेर एक बेर जे बेटा जएत तँ की घुरिकऽ अएत? बेटा धन छी, बाणवीरे सही!
अकश-तिकश करैत एक दिन माए-बाप लेटरसँ पुछलन्हि- “भगवानक इच्छा सर्वोपरि। भगवान पेट दइ छथिन्ह तँ ओकरा पोसबाक जोगार सेहो करैत छथिन्ह। लोक सभ कहैत रहल जे लेटराक गुजर कोना चलतए तँ ककरो गपक हम मोजर नहि दैत छलियैक। मुदा ई बैतरणी नाटक कम्पनी बला तँ पाछूए पड़ि गेल अछि। लोकसभ कहए-ए जे ई सभ शहरी सर्कस कम्पनीक लेल बाणवीर सभक ताकिमे गामे-गाम फिरैत अछि आ ओहि कम्पनी सभमे ओकरा सभकेँ बेचि दैत अछि। मुदा ई कहए-ए जे से नहि छैक। सभ दिनुका दिनचर्जा छैक। शहरे-शहरे घुमैत अछि ई सभ। जखन कतहु सर्कस नहि लगैत छैक तँ छुट्टिओ भेटिते छैक। आर के नोकरी देत एतेक कम लम्बाइ बलाकेँ? से हम अहींसँ पुछैत छी जे की कएल जाए”।
लेटराक तँ आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलैक। गौआँ सभ ठीके कहैत रहए। माए-बाप तँ लागैए निर्णय कऽ लेने छथि।
“माए-बाबू। हमरा बुझल अछि जे हमर बियाह-दान नहि होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरिये लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि देलकउ, से ठीके अछि की”?
आब तँ कन्नारोहट उठि गेल। माए-बापक संग लेटराक कानबसँ अँगनामे अनघोल मचि गेल।
जेना सुति कऽ उठलाक बाद ढेर-रास गप महत्त्वपूर्ण कोटिसँ उतरि कऽ अमहत्वपूर्ण वा ततेक महत्वपूर्ण नहि रहि जाइत अछि, तहिना दिन बितैत लेटरा सेहो अपन मोन मना लेलक। कनी देखियैक बाहरक दुनियाँ केहन होइत छैक। माए-बाप तँ बेचिए लेने छथि, ओतेक सिनेह रहितन्हि तँ बेचबे करितथि? तँ हमहीं किएक अधभगिया सिनेह राखी?



बैतरणी कम्पनीबला लेटराकेँ एकटा सर्कस बला लग लऽ गेल।
ओतए ई लगैत रहए जे जेना सभ बाणवीरक नोकरीक ओतए जोगार होअए। दुनियाँक सभ बाणवीरक नोकरी ओकरा लग पक्का रहए। लेटरा जेना बाणवीरक देशमे पहुँचि गेल छल। मोँछबला, निमोछी, पातर-मोट, नव-बूढ़- मुदा सभ धरि बाणवीर।
लेटरा ओकरा सभक बीच रहए लागल। किछु दिन धरि तँ ओकरा लगैत रहए जे ओ कोनो विशिष्ट व्यक्ति अछि आ तेँ बेशी दुखी अछि आ दोसर बाणवीर सभ तँ अही योग्य अछि। मुदा आस्ते-आस्ते जखन संगी-साथी सभसँ ओकरा गप होमए लगलैक, तखन ओकरा बुझबामे अएलैक जे सभक एक्के खेरहा छैक।
फेर ओहि जेलरूपी घरमे हँसी-खुशीसँ, छोट-छीन झगड़ा-झाँटी आ मान-मनौअलक संग ओ आगाँ बढ़ए लागल। अपन जिनगीक ई रूप ओकरा एहन सन लगैत छलैक जेना ओ नोकरिहारा होअए। ओहो घुरि जएत गाम आ फेर आपस अएत नोकरीपर। गामक दोसर नोकरिहारा सभकेँ ओ देखैत छल। गाम अबैत काल जतबे उल्लसित रहैत छलाह, नोकरीपर घुरैत काल सभक घुघना लटकि जाइत छलन्हि।
धुर, माए-बाप हमरा बेचलक थोड़बेक अछि। हमरा सन बाणवीरकेँ एहिसँ नीक आर कोन नोकरी भेटतैक। सर्कसमे जखन हम कला देखबैत छी तँ बच्चा सभ कोना पेट पकड़ि हँसैत अछि, कतेक थोपड़ी पड़ैत अछि। थोपड़ीक अबाज तँ निसाँ आनि दैत अछि। काल्हि ओ दु जुट्टी बला बचिया, केहन लगैत रहए जेना अपने लोक रहए। गाममे बड़का कक्काक बेटीक बियाह नौगछिया भेलन्हि तँ हुनको दिआ तँ लोक सभ उरन्ती उड़ेने छल जे बेटी बेचि लेलन्हि। कतेक दुरगर बियाह करा देलन्हि!
ई लोको सभ, बुझु इनारक बेङ सभ छी। दिल्ली-मुम्बइ घुमत गऽ तखन ने बुझबामे अओतैक जे भागलपुर-नौगछिया कोनो ततेक दुरगर नहि छैक। माए-बाप हमरा बेचि लेत?....आ ई सोचिते लेटराक कंठ सुखा गेलैक आ आँखि पनिया गेलैक।
“रे भाइ, चल । तैयारी करबा लेल घण्टी बाजए बला छैक। ओहिसँ पहिने किछु खा-पीबि ली”।