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रमा कान्त झा सौराठ
मिथिलाक विकासक बात अछि जे मिथिलाक विकास कोना होएत। मिथिलाक विकासक लेल विषय-वस्तुक बारेमे एकजुट हेबेक चाही , एक दोसरकेँ साथ चलबाक विषय हो, जे विकास नेतागण अपन राजनीतिक रोटी नहि सेकथि आर मुद्दा सिर्फ विकासक होबक चाही ! आइ बिहारमे मिथिलाक भूमि विकाससँ वंचित आछि ! आइ हम सभ अपन रोजी रोटीक तलासमे दिल्लीमे छी, कियो पंजाब आ कियो मुम्बयमे कोपक शिकार होइत अछि ! यदि मिथिलामे रोजगार होइत तखन दिल्ली तँ दूर होइत। लोकमे दम होइत, कोशी कमलाक जल संसाधनकेँ मजबूत तटबन्ध रहितै आ गाम आइ जीवित होइत। सरकारक नीति जे बिहारक नामपर घोषना तँ होइत अछि लेकिन पैसा आँखिक नोर सुखलाक बाद जाइत अछि ! फेर जर्जर के जर्जर। एकताक जरूरत आछि आर नितिश जी के नीति सही अछि जे पुनः बिहार बचेबाक नीति विकासक नीति रोजगारक नीति मिथिलाक चौतरफा विकासक नीति !



हम की हमर पहचान की


मिथिलाक पहचान माछ, पान ओ मखान ,


धोती कुर्ता ओ डोप्टा ओ मुँहमे पान ,

धैर्यय ओ बलबान सभसँ भेटय सम्मान ,

आह नहि किनको हरदम मुहपर मुस्कान !

ई हमर मिथिलाक पहचान !!

सभसँ पछुआयल छी ओ जग नाम ,

खान पान हो सबकेँ देता समान ,

नहि कियो अपन नहि कियो आन ,

सभकेँ सुआगत एक समान !

ई हमर मिथिलाक पहचान !!,

गंगा कोसी जीबछ धार ,

सभकेँ लगबथि बेर पार ,

धन समानक कुबेर के अवतार,

सगरुओ मिथिलाक महिमा अपरम पार,

ई मिथिलाक पहचान !!




घर ने पथार अछि टुटल मरैया



भैया नेने अएला सुन्दर बहुरिया ,

बुढ़ो जवान भेल देखी कऽ बहुरिया ,

नेनाक चालि चले नवकी कनियाँ ,

दिन हो राति बैसल सदिखन लाबैत रहत बात ,

निकलथि जखन बजार तखन सिटी बाजे हजार ,

घर ने पथारी अछि टुटल मरैया ,

सभ मिल ताना मारय , ई जुल्मी नजरिया ,

रातिकेँ सिटी बजबैए , पीबि तारी ओर दारू ,


माता के चरण कमलमे आरती प्रस्तुत
जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे
नूतन सघन सजल नीरद छवि शंकर नाम लेबैया ,
योगनी कोटि आंगन डाकनी नाचत ता ता थैया
जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !!
मुंडमाल उर बियाल बिराजित बसन बाघम्बर राजे ,
कर खप्पर अरु कोसल सित अति कति किंकिन अति बाजे,
जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !!
संसार पयोनिधि पार उतारिन सभ आसन सुख देया !
डीमिक डीमिक कर डमरू बाजे नाचत ता ता थैया ,
जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !!
शिव सनकादि आदि मुनि सेवक शुम्भ निशुम्भ बेधैया ,
रमा कान्त करू बिनती आरती जय जय तारिणी मैया ,
जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !!



जय श्यामा माताक आरती


जय श्यामा जय श्यामा जय जय श्यामा जय श्यामा ,

पनाचान्न वाहन महिष बिनासिनी नीरद छवि अभिरामा ,

चंड मुंड महिषासुर मर्दनी त्रिभुवन सुन्दर नामा .

जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!!

शंभु धरनी समसान निवासिनी जग जननी अभिरामा ,
सुम्भ निसुम्भ रक्क्त भव मर्दनी श्री गंगाधर बामा ,,
जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!!

नारायण नरसिंह बिनोदिनी बिन्ध्य शिखर बिश्रामा ,

चमुंडा चंडासुर घातिनी पूर्ण निज मन कामा ,

जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!!

तुअ गुण वेद पुराण बखानत को नहि जानत नामा ,

सेवक अधम रमा कान्त पुकारत पुरहु सकल मन कामा

जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!!



की गलती हमरासँ भेल


ओकर सजा किए बेटाकेँ बजा लेलहुँ ,

हमरासँ दूर किए केलहुँ ,

आप्रद यदि हमरासँ भेल ,

तँ हमर किए नहि कष्ट देल,

छ्ल आसरा एकटा तकरो ,

अहाँ राखमे समा लेलहुँ ,

सभटा अहाँ जानै छी,

एना किए नुठुर अहाँ भेलहुँ ,

पूजा हम करै छी पाठ हम करै छी ,
नाम अहाँक लय सभ दिन उठी ,

आँखि खोलू हे माता आन्हर किए ,

हमर जीबनकेँ साकार करु , बेटाक संग ,

हमरो ओधर करु जीबन ,

ककरा मुँह देखि बितायब हम जिन्दगी ,

आब तँ पहर बनि जाएत जिन्दगी ,

एकटा कृपा करु माता सभ दुःख हरू ,

माया जंजालक फंदासँ पार आब करू


चल चल रे हवा ,पूब दिसा

मिथिला राज्य बनाबी ,
जतए सीताक नगरी ,

ओतहि खिलए सबरंग फुल ,

चाहु दिस हरियर होयत खेत ,

नहि तूँ करिहऽ ककरोसँ भेँट ,

चल चल रे हवा मिथिला देस ,

गंगा कोसी कमला बलान ,

नहि करती ककरो कलेस ,

सभक कमाना पूरा करती,

मिथिलाक नरेस ,

सभ दिन पूजब अहाँक भेस ,

चल चल हवा मिथिला देस!



बिबाह ने भेल एकटा सोगातक संग भेटल

बिबाहकेँ एखन धरि झेल रहल छी ,

जेना बछड़ू बिना महिस बेकार तहिना खेल , भए रहल अछि,

सास तँ बुझु जे राँचीक काँके रिटायर

आर ससुर बुझू जे सगरु भारतसँ अवकाश प्राप्त ,

कहैले महिस स्कूलसँ बी.ए. पास ,

सास इंटर पास कनिया भेटली एम.ए. पास

सारकेँ पठेला देसे पार , छोटकी सारि सदिखन मुँहे फइर,

देखका दुनियाँ होए बेहाल, कनिक जेंगी होयत पहर .

बेटा हमर देखए तँ होय बेहाल ,

डरे भागए गाछी कात ,



मिथिला अछि नगरी , सौराठ अछि हमर गाम


देखू सभ दुनिया सहभा लगे अहि ठाम ,

सूरतसँ चलि कऽ सोमनाथ बसलाह बिच गाम ,

जखन चलला राम बिबाह करए , बाट पड़ैत अछि ई धाम ,

सोमनाथ आ राम संगहि बिबाह हेतु पहुँचला जनकपुर ,

सीता सभ सुकमारि कन्या ,पूजए चलली सती माताकेँ ,

सामने दुल्हा राम आ तीनू लोकोक नाथ ,

मिथिला अछि नगरी, सौराठ अछि हमर गाम ,

गोतम ओ तपो ऋषिगन सभ जान आबथि ,

सुन सुन धाम सब आबए , ई थिक मिथिला गाम .



नाम सुनीता रूप आब्निता अछि


सगरो गाम घूमी लाज नहि आबैत अछि

चुनरी फहराबै गीत गाबै , छौड़ाकेँ लुभबैत,

बुढ़बा हो आ जबान सभ सीटी बजबै,

कमर लचका कऽ सभ बहकबै छिऐ,

तिरछी नजरियासँ सभकेँ जान मारै छी,

किनको मुस्कुरा कऽ चाहपर बजबै छी,

किए अहाँ सभकेँ घर उजारै छी,

चुनरी फहरा कऽ रसीला गीत गाबै छी


नचारी

कहाँ बैसल छी सोमनाथ यौ ,

सभ भए अहाँ बनू हम अनाथ ,

दोगू दौगू बाबा सोमनाथ ,

फँसलहुँ बिच मजधार ,

रस्ता देखि नहि ओहि पार ,

केबल अहाँ खेबन हार ,

बाबा दरस दिखा करी बेरपर ,

हमहूँ आयब सिबरातिकेँ सभ साल ,

लाएब आक धथूर ओ बेल पात ,

करब बाबाक सिंगार ,

कहाँ बैसल छी सोमनाथ यौ ,

हम सभ भेलहुँ अनाथ यौ,


खिले रे बदन

आयल बसंत नव नव खिले रे बदन ,

पुरनका पात खसै जमीनपर,

हरस मन देखै दिगंत ,

थिक आली बसंत ,

हरु जुनि हे मन आहुके ,

एक दिन आएत बसंत ,

रूप सिंगारकेँ सजत तन ,

गाछ जनका फेर जायत तन,

अहुँकेँ आबत बसंत ,

बिसू जायत जखन मन ,

अहुँकेँ आंगन खेलता ,

परम पीरिए के संग ,

अहुँकेँ आबत बसंत ,



बसन्त आबि गेल नव कालिया सगरो गाछ छा गेल !


पुरबा पछवा बसात बहैए, जवानीक ओमद भरैए ,

दुख ने दर्दक थिक रहैए, आम मंजरमे मधु लगैए ,

देस दुनियाक हाथ चेला बनैए, बाबाक भाषन सुनैए,

कियो रमा देव , कियो कामदेव, सभ दौगी चोला पहिरे ,

नारी संग नाच नचैए, कियो चिकोटी कियो नागी पेची .

आनंद की भोगी बनैए, मदिराकेँ अमृत बुझा ,

झुट्ठे भगवानक नाम जपैए, अपना अपनीकेँ आबतर बुझैए?

कचड़ेमे परला बाबू सांचे ,

पीबि दारू तारी ,

भोर साँझ चिकड़ैत रही चित्त मर्म बुझले बानर

घूमी फिर कार्य्य ठेक हठात् गप्प पहुँचिकेँ,

सुनितु बहावे घरकेँ आबथि ,

बान्हल महीस डेंगाबथि !

जे किओ सामने आबथि मुँहसँ गारि निकालथि


परल साँझ मुनिसिमाक मायक ,

गारि दैत बजाबथि, की काज कएल भरिदिन ,


एम्हर आम्हर झगरा लगबथि,

चढ़ल नासा माथा ऊपर ,

सभटा नाम भुलाय!!

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