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मैथिली वा कोनो भाषाक उत्पत्तिक मूलमे मनुक्खक मुँहसँ बहराएल ध्वनि आ ओहि ध्वनिक अर्थ कोनो वस्तु, व्यक्ति वा विचारसँ होएब सिद्ध होएत। ध्वनि तँ चिड़ै, चुनमुनी, माल-जाल आ बौक व्यक्ति द्वार सेहो उत्पन्न होइत अछि मुदा से अर्थपूर्ण नहि भऽ पबैए आ भाषाक निर्माण नहि कऽ पबैए।
१८६६ ई. मे पेरिसमे “ला सोसिएते द लिंग्विस्टीक” नाम्ना संस्था भाषाक उत्पत्ति आ विश्वक भाषा सभक निर्माण” एहि विषयकेँ अपन कार्यकारिणीसँ हटा देलक कारण एहि विषयक विवेचन अनुमानपर अधारित होएबाक कारणसँ वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ दूर रहैत अछि।
वैदिक संस्कृतसँ लौकिक संस्कृत आ ओहिसँ पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिलीक क्रम ताकल जा सकैत अछि। मुदा वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ ओ भाषा अस्तित्वमे रहल होएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल होएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक संस्कृतक उत्पत्ति दैवी रूपमे भेल वा आंगिक-वाक संकेतक संप्रेषणीयता बढ़ेबाक लेल से मात्र अनुमानेक विषय भऽ सकैत अछि। भाषामे ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य आ अर्थक परिवर्तन भेलासँ वैदिकसँ लौकिक संस्कृत बहराएल आ फेर पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिली। पाणिनी द्वारा भारतक विभिन्न क्षेत्रसँ लेल शब्दावली लौकिक संस्कृतकेँ ततेक समृद्ध कएलक जे ओहिसँ आन सभ भाषाक कतेको तरहक रूप बहार भेल। कतेक तरहक क्षेत्रीय प्राकृत आ अपभ्रंश ओहि भौगोलिक क्षेत्रक विस्तारकेँ लैत बहार भेल आ ओहिसँ आजुक आधुनिक भारतीय आर्य भाषा सभक उत्पत्ति भेल।
मैथिली भारोपीय भाषा परिवारसँ सम्बन्धित अछि। भारोपीय भाषा परिवारक भीतर विश्वक लगभग चालीस प्रतिशत जनसंख्या अबैत अछि। ई सभसँ पैघ भाषा परिवार अछि, सभसँ समृद्ध सेहो। मोटा-मोटी एकर दू विभाग छैक, पहिल यूरोपक आर्य भाषा आ दोसर भारत-ईरानी शाखा। भारत-ईरानी आर्यभाषाक भीतर ईरानी, दरद आ भारतीय आर्यभाषा अबैत अछि। दरद भाषामे कश्मीरी आ पामीर पठारक पूर्व दक्षिणक भाषा सभ अछि। मैथिली भाषाक उद्गम आ विकास भारतीय आर्यभाषाक भीतर ताकल जाइत अछि।
भाषाक उद्गम तँ अनुमानक विषय थिक। भाषाक उद्गमक आ तकर प्रयोगक कतेक वर्षक पश्चात् ओहिमे साहित्य रचना होइत अछि। तखन जा कऽ ओकर रूप स्थिर होइत अछि। वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेद, लौककिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण, पालि भाषाक प्राचीनतम ग्रन्थ बुद्ध त्रिपिटक, प्राकृतक प्राचीनतम ग्रन्थ विमल सूरिक पउमचरिउ, अपभ्रंशक प्राचीनतम ग्रन्थ यूगीन्द्रक परमात्म प्रकाश अछि। आदि मैथिलीक प्राचीन साहित्य सिद्ध साहित्य, बौद्धगान आ ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकर अछि। सिद्ध सरहपाद 700-780 सरहपाद-सिद्धिरत्थु मइ पढ़मे पढ़िअउ ,मण्ड पिबन्तोँ बिसरउ एमइउ।मिथिलामे अक्षरारम्भ सिद्धिरस्तु (गणेशजीक अंकुश आँजी) सँ होइत अछि। मिथिलामे ई धारणा अछि जे माँड़ पीलासँ स्मरण शक्ति क्षीण होइत अछि। दोसर उदाहरण- बलद बियायल गबैया बाँझे- बड़द बिया गेल आ गाए बाँझे अछि।
मध्यकालीन मैथिलीक ग्रन्थ विद्यापतिक मैथिली साहित्य आ तकर बाद चतुर चतुर्भुज, शंकरदेव, विभिन्न मल्ल नरेश द्वारा रचित साहित्य, कीर्तनिया आ अंकिया नाटसँ मनबोध धरि अबैत अछि। आधुनिक मैथिली साहित्य चन्दा झासँ प्रारम्भ होइत अछि।
प्राचीन भारतक आर्यभाषाक क्षेत्र वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदमे वर्णित धार सभक आधारपर निर्धारित कएल जा सकैत अछि आ एकर प्रसार कोना आन क्षेत्रमे भेल सेहो एहिसँ निर्धारित होइत अछि। ऋगवैदिक आर्य “सप्त सन्धव” माने सात धारक क्षेत्रमे रहैत छलाह- ई सात धार छल वितस्ता, अश्किनी, परुष्णी, शतुद्रु, विपाशा, क्रुमु आ गोमती। एहिमे पहिल पाँचटा धार पंजाबक आ शेष दूटा अफगानिस्तानमे बहैत छल। ई सातो धार ऋगवेद कालक सभसँ उपयोगी धार सिन्धुक सहायक छल। ऋगवेदमे सरस्वती धारक वर्णन “धार सभ माय”क रूपमे भेल अछि। ऋगवेदमे यमुनाक दू बेर आ गंगाक एक बेर वर्णन अछि। ऋगवेदक दसम मण्डलमे “धारक स्तुति” मे सिन्धु आ सप्तसैन्धवक स्तुति भेल अछि। ओहि कालमे पुरु, अनु, द्रुह्य, यदु आ तुर्वस नाम्ना पंचजन बसैत छलाह। क्रिवि, त्रित्सु, सेहो ओहि कालमे छलाह। पुरु आ सभसँ शक्तिवान भरत कबीला मिलि बादमे कुरु कबीला बनल। भरत कबीला दाशराज्ञ युद्धमे पाँच आर्य आ पाँच अनार्य कबीलाक संगठनकेँ हरेलक, जाहिमे भरतक पुरहित वशिष्ठ रहथि आ पाँच आर्य आ पाँच अनार्य (दस्यु) कबीलाक संगठनक पुरहित रहथि विश्वामित्र। बोगजकोई एशिया माइनरमे हित्ती शासकक १४म शती ई.पू.क उत्कीर्णित अभिलेखमे इन्द्र, दशरथ, अर्त्ततम आदि राजाक, इन्द्र, वरुण, नासत्य, आदि देवताक उल्लेख अछि। यजुर्वेदक प्रचलित संहिता वाजसनेयी आ सामवेदक संहिता कौथुम, सामवेदक आरण्यक आ उपनिषद छान्दोग्यक आधारपर मिथिलामे ब्राह्मणक वाजसनेयी आ छान्दोग्यमे उर्ध्वाधर विभाजन एखन धरि अछि। यजुर्वेदमे विदेहक वर्णन अछि तँ ऋगवेदमे वैदिक जनकक (सीताक पिता सीरध्वज जनक पछाति भेलाह।)
'वैदेह राजा' ऋगवेदिक कालक नमी सप्याक नामसँ छलाह, यज्ञ करैत सदेह स्वर्ग गेलाह, ऋगवेदमे वर्णन अछि। इन्द्रक संग देलन्हि असुर नमुचीक विरुद्ध ताहिमे इन्द्र हुनका बचओलन्हि।शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक- समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। निमि गौतमक आश्रमक लग जयन्त मिथि -जिनका मिथिला नामसँ सेहो सोर कएल जाइत छन्हि, मिथिला नगरक निर्माण कएलन्हि। निमीक जयन्तपुर वर्तमान जनकपुरमे छल, मिथीक मिथिलानगरीक स्थान एखन धरि निर्धारित नहि भए सकल अछि, अनुमानित अछि जनकपुरक लग ।सीरध्वज जनकसीताक पिता छथि एतयसँ मिथिलाक राजाक सुदृढ़ परम्परा देखबामे अबैत अछि।कृति जनकसीरध्वजक बादक 18 पुस्तमे भेल छलाह। कृति हिरण्यनाभक पुत्र छलाह जनक बहुलाश्वक पुत्र छलाह। याज्ञवलक्य हिरण्याभक शिष्य छलाह, हुनकासँ योगक शिक्षा लेने छलाह। कराल जनक द्वारा एकटा ब्राह्मण युवतीक शील-अपहरणक प्रयास भेल जनक राजवंश समाप्त भए गेल (संदर्भ अश्वघोष-बुद्धचरित कौटिल्य-अर्थशास्त्र)।अर्थशास्त्रमे(. विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायः इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः) कराल जनकक पतनक सेहो चर्चा अछि। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मण कन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रो विननाश करालश्च वैदेहः,...
वैदिक संस्कृतक कालमे आर्य सप्तसन्धवसँ विदेह धरि आबि गेल छलाह। अनार्य (दस्यु)सँ ओही कालमे हुनकर सम्पर्क भऽ गेल छल आ शाब्दिक आदान-प्रदान सेहो भऽ गेल छल। यजुर्वेदमे बादमे अथर्ववेदमे ई आदान-प्रदान दृष्टिगोचर होइत अछि। अनार्य (दस्यु) आ व्रात्य (अनार्यसँ आर्य बनल जाति) दुनुक भाषा सप्तसैन्धव आर्यक भाषासँ मिलि गेल आ पुबरिया आ आन क्षेत्रीय बसात लगलासँ वैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृतमे बदलि गेल। निरुक्तक समयमे सेहो वैदिक शब्दावली कठिन भऽ गेल छल, ओकर उत्पत्तिपर विवेचन शुरू भऽ गेल छल। पाणिनीक भाषा पुबरिया, दछिनबरिया, पछबरिया आ उत्तरबरिया सभ क्षेत्रक दस्यु आ व्रात्य भाषाक शब्दावलीकेँ समाहित कऽ बनल छल। ई संस्कारित भाषा बादक लोक मध्य संस्कृतक रूपमे विख्यात भेल। पाणिनी लौकिक संस्कृतकेँ जेना “भाषा” कहलन्हि, तहिना यास्क आ पाणिनी वैदिक संस्कृतकेँ “छन्दस्”। यैह छन्दस् अवेस्ता भाषाक भाष्य लेल जेन्द (छन्द) कहल गेल।

संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली
१. संस्कृत
देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तर भारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणक (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, , , ह क वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नहि होइत अछि छथि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्चारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) क प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ क बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओहि फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा आकार क बाद बिकारीक आवश्यकता नहि अछि।
जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि।
वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि।
स्वरक वर्णन एहि प्रकारेँ अछि- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर।
स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जाहिमे बाजैमे एक मात्राक समय लागए से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आ जाहिमे तीन मात्राक समय लागल से भेल प्लुत।

मूलभूत स्वर अछि- अ उ ऋ लृ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह।
दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह।
लृ दीर्घ नहि होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि।
अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कऽ १२ वर्ण भेल। लृ क ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३), तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर।

एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।
ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि।
नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित।
स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ।
दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तटपर बनबाओल, एतए इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ दात्तआद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलोपर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह।
स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्र स्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि।
आब व्यञ्जन पर आऊ।
व्यञ्जन ४२ टा अछि।
क् ख् ग् घ् ङ्
च् छ् ज् झ् ञ्
ट् ठ् ड् ढ् ण्
त् थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्
य् र् ल् व्
श् ष् स्
ह्
य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो।
एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग।
ई दुनूटा, स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि।
विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् क विकार अछि। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व।
अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि।
उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि।
कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति)
पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल।
यम सेहो अयोगवाह होइत अछि।
अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय क उच्चारण कण्ठमे होइत अछि।
इ ई चवर्ग य श क उच्चारण तालुमे होइत अछि।
ॠ टवर्ग र ष क उच्चारण मूर्धामे होइत अछि।
लृ तवर्ग ल स क उच्चारण दाँतसँ होइत अछि।
उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय क उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि।
क उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठक सहायतासँ होइत अछि।
ए ऐ क उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि।
ओ औ क उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि।
य र ल व अन्य व्यञ्जन जकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि।
क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कऽ छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल।
सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि।
अनुस्वार आ यम क उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् क उच्चारण नहि होएबाक चाही।
जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भऽ पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्।
श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल घोषवान्। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि अल्पप्राणआ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेलमहाप्राण
कचटतप क पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप क पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।
छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । मुदा एहिसँ ई नहि बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद, मे परिगणित होइत अछि तकर चरचा नीचाँ जा कए होएत - जेना यदि अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादकेँ बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः।
आजुक नव कविताक संग हाइकू/ क्षणिका/ हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय, संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व '' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि, मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि ? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि।

छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द ।
वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि मात्रिक छन्दक नहि ।
वार्णिक छन्दमे वर्ण/ अक्षरक गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। एकसँ बेशी मान कोनो वर्ण/ अक्षरक नहि होइछ। मोटा-मोटी तीनटा बिन्दु मोन राखू-
१. हलंतयुक्त अक्षर-०
२. संयुक्त अक्षर-१
३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक।
आब पहिल उदाहरण देखू-
ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+१=१७
आब दोसर उदाहरण देखू

पश्चात्=२
आब तेसर उदाहरण देखू
आब=२
आब चारिम उदाहरण देखू
स्क्रिप्ट=२
मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-
गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतए छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना-
वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः
गुण आ वृद्धिकेँ अलग कए सेहो अक्षर पूर कए सकैत छी।
ए = अ + इ
ओ = अ + उ
ऐ = अ/आ + ए
औ = अ/आ + ओ

छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त गुरुलघुछंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,,,,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,,,,ए.ऐ,,, ई आठ दीर्घ स्वर अछि।
ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ गुणिताक्षरबनैत अछि।
क्+अ= क,
क्+आ=का ।
एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक अक्षरकहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना अवाक्शब्दमे दू टा अक्षर अछि, , वा ।

१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर लघुमानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।
२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर गुरुमानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।
३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।
४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।
५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना
स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि)।
१. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि।

१. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण कउत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,, आ ४ मंत्रक समूह) मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ।
उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल।
हाथक मुद्रा- हाथक मुद्रा १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद

ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल।
ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९
सात टा स्वर सा,रे,,,,,नि, आ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान।
ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि विशेषण-विपर्यय।
वेदपाठ-
१. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ।
अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्।
२. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढ़ल जाइत अछि।
३. क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अछि।
४. जटापाठ- एहिमे ज्योँ तीन टा पद क, , आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि।
साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बड़ाबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे यति। ६. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा हाउ’ ‘राइजोड़ैत छथि। राणानीय शाखा हावु’, ‘रायिजोड़ैत छथि।
मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत रहए। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि।
१. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर।
२. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद।
३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद।
४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद।
५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि।
६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद।
७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ।
यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि।
(अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः।
(आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि।
ए= अ + इ
ओ= अ + उ
ऐ= अ/आ + ए
औ= अ/आ + ओ
अहू प्रकारेँ नहि पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि।
यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)।
ॐ भूर्भुवस्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।
वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतए आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि।

वैदिक (छन्दस् ) आ लौकिक संस्कृत (भाषा) क व्याकरण :
वैदिक आ लौकिक दुनू संस्कृतमे संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग, तीन वचन- एक, दू आ बहुवचन रहल, पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग लिंगक द्योतक नहि अछि, दारा- पुल्लिंग, कलत्र- नपुंसक लिंग आ भार्या- स्त्रीलिंग; मुदा तीनू पत्नीक पर्यायवाची अछि। तहिना ईश्वरः (पुल्लिंग), ब्रह्म (नपुंसक लिंग) आ चितिः (स्त्री लिंग) होइत अछि। संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक आठटा कारक (विभक्ति) सेहो होइत अछि। दस गणक धातुक रूप  परस्मैपदी (फल दोसराकेँ), आत्मनेपदी (फल अपनाकेँ) आ उभयपदी ई तीन तरहक होइत अछि। कर्तृ, कर्म आ भव ई तीन वाच्य आ बारह लकार (लट्, लिट्, लङ्, लुङ्, लुट्, लृट्, लोट्, विधिलिंङ्, आर्शीलिंङ्, लृङ्, लेट् आ लेङ् ) होइत अछि। लेट् आ लेङ् लकार लौकिक संस्कृत (भाषा) मे नहि होइत अछि।
संस्कृतमे तीनटा पुरुष- प्रथम (आन भाषाक अन्य पुरुष) , मध्यम आ उत्तम होइत अछि।उद्देश्य आ विधेय; कर्ता आ क्रिया; विशेष्य आ विशेषण आ संज्ञा आ सर्वनामक परस्पर गुण-समानता रहैत छै।
वैदिक संस्कृतमे गीतात्मक आ बलात्मक स्वराघात रहए मुदा लौकिक संस्कृतमे खाली बलात्मक स्वराघात रहि गेल। वैदिक उच्चारण उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (संगीतशास्त्रक आरोह, अवरोह आ सम सँ तुलना द्रष्टव्य) लौकिक उच्चारणमे खतम भऽ गेल।
वैदिक छन्दमे एक चरण, जकरा पाद कहैत छिऐ ओहि पादमे वर्णक गनती होइत अछि। छन्दमे गति (लय) आ यति (विराम) सेहो होइत अछि। ह्रस्व स्वर लघु होइत अछि, ह्रस्वक बाद संयुक्त वर्ण अएलासँ लघु स्वर गुरु स्वर भऽ जाइत अछि।
(आगाँ)

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  1. मागधी प्राकृतसँ मैथिली, भोजपुरी, बंगला, ओड़िया, असमी आदि भाषा (११०० ई. सँ) क उत्पत्तिक जे बात कहल जीत अछि से तार्किक नहीं अछि कारण मगढ़क साम्राज्य विशाल होइतो ओत्तुक्का बोली मगही एखन धरी भाषक स्तर नहीं पाबी सकल अछि तेन एकरा मिथिला प्राकृत कहने अधिक उचित रहित ई हमर व्यक्तिगत मान्यता अछि .
    लगैत अछि जे कहियो कियो पश्चिम भारतक व्यक्ति एही प्रकारक वर्गीकरण केलन्हि जिनका सब पुबरिया भाग मगधक राज्य प्रावाल्यक कारण मागधी आ तहिना अर्धमागधी कहने उचित लगालैन्ही आ सिह वर्गीकरण तोतारटंत जनका चली रहल अछि. कहू त अवधी, बुन्देली के केना अर्धमागधी कही देल गेल आ ओ चालित रहल.
    एहिमे चंपारणक भोजपुरीपर प्रभाव त जरुर मैथिलीक छैक मुदा गंडक क पश्चिम के हुनको सबहक अनुसार अर्धमागधी क भाग मानक चाही वल्कि दक्षिणमे नागपुरी मैथिलिक निकट अछि .
    हम एहू बातक विरोधी छि जे संस्कृत स भारतीय भाषा सबहक निर्माण भेल अछि . कुमार संभवक आठम सर्गक एक श्लोक में कहल गेल छैक जे शिव पर्वतीक विवाहक बाद शिवक स्तुति संस्कृतमे कायल गेलन्हि आ पार्वतिक लोकभाषामे .
    एहेन लोकभाषा सभकें परिमार्जित के संस्कृत कहियो बनल होयत आ तेन संस्कृतक स्वरुप काश्मीर स कन्याकुमारी तक एक अछि .
    ई बात अलग जे बादमे एकर प्रभाव लोक्भाश्पर सेहो परल हेतैक आ एकर विपरीत सेहो.
    विन्ध्यक उत्तर पंचगौड़क जे विवरण अछि ताहि अनुसारे सारस्वतः कन्कुब्जः बंग मैथिल उत्कालाह गौड़ प्राकृतसँ निकलल मानल जा सकित अछि ओना मैथिली, मगही, नागपुरिया , बंगला, ओड़िया, असमीकें प्राकृतसँ निकलल मानल जेबक चाही खासके मिथिलाक्षरस बंगला, ओड़िया, असमीकें लिपि निकलल होयबाक चलते.
    तें जे कियो भाषाविज्ञानी एही प्रकारे भारतक भाषक वर्गीकरण करैत छथि हुनक दृष्टिमे किछु ने किछु दोष छनि. एही विषयपर शोधक आवश्यकता अछि
    डॉ. धनाकर ठाकुर

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  2. मागधी प्राकृतसँ मैथिली, भोजपुरी, बंगला, ओड़िया, असमी आदि भाषा (११०० ई. सँ) क उत्पत्तिक जे बात कहल जीत अछि से तार्किक नहीं अछि कारण मगढ़क साम्राज्य विशाल होइतो ओत्तुक्का बोली मगही एखन धरी भाषक स्तर नहीं पाबी सकल अछि तेन एकरा मिथिला प्राकृत कहने अधिक उचित रहित ई हमर व्यक्तिगत मान्यता अछि .
    लगैत अछि जे कहियो कियो पश्चिम भारतक व्यक्ति एही प्रकारक वर्गीकरण केलन्हि जिनका सब पुबरिया भाग मगधक राज्य प्रावाल्यक कारण मागधी आ तहिना अर्धमागधी कहने उचित लगालैन्ही आ सिह वर्गीकरण तोतारटंत जनका चली रहल अछि. कहू त अवधी, बुन्देली के केना अर्धमागधी कही देल गेल आ ओ चालित रहल.
    एहिमे चंपारणक भोजपुरीपर प्रभाव त जरुर मैथिलीक छैक मुदा गंडक क पश्चिम के हुनको सबहक अनुसार अर्धमागधी क भाग मानक चाही वल्कि दक्षिणमे नागपुरी मैथिलिक निकट अछि .
    हम एहू बातक विरोधी छि जे संस्कृत स भारतीय भाषा सबहक निर्माण भेल अछि . कुमार संभवक आठम सर्गक एक श्लोक में कहल गेल छैक जे शिव पर्वतीक विवाहक बाद शिवक स्तुति संस्कृतमे कायल गेलन्हि आ पार्वतिक लोकभाषामे .
    एहेन लोकभाषा सभकें परिमार्जित के संस्कृत कहियो बनल होयत आ तेन संस्कृतक स्वरुप काश्मीर स कन्याकुमारी तक एक अछि .
    ई बात अलग जे बादमे एकर प्रभाव लोक्भाश्पर सेहो परल हेतैक आ एकर विपरीत सेहो.
    विन्ध्यक उत्तर पंचगौड़क जे विवरण अछि ताहि अनुसारे सारस्वतः कन्कुब्जः बंग मैथिल उत्कालाह गौड़ प्राकृतसँ निकलल मानल जा सकित अछि ओना मैथिली, मगही, नागपुरिया , बंगला, ओड़िया, असमीकें प्राकृतसँ निकलल मानल जेबक चाही खासके मिथिलाक्षरस बंगला, ओड़िया, असमीकें लिपि निकलल होयबाक चलते.
    तें जे कियो भाषाविज्ञानी एही प्रकारे भारतक भाषक वर्गीकरण करैत छथि हुनक दृष्टिमे किछु ने किछु दोष छनि. एही विषयपर शोधक आवश्यकता अछि
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मिथिला दैनिक (पहिने मैथिल आर मिथिला) टीमकेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, पाठक लोकनि एहि जालवृत्तकेँ मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय आ सर्वग्राह्य जालवृत्तक स्थान पर बैसेने अछि। अहाँ अपन सुझाव संगहि एहि जालवृत्त पर प्रकाशित करबाक लेल अपन रचना ई-पत्र द्वारा mithiladainik@gmail.com पर सेहो पठा सकैत छी।

 
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