नेना-भुटका - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 12 अप्रैल 2010

नेना-भुटका

1.िबहुला

चम्पानगर।
ओतए एकटा पैघ बनिजारा- चाँद सौदागर।
िशवजीक भक्त।
एक बेर िवषहारा मनसा सोचलक जे ओ कैलाश त्यािग मृत्युलोक आबि जाए। लोक ओकर पूजा
करत।
मनसा मृत्युलोक आयलि- चम्पानगर। चाँद सौदागरकेँ कहलक- हमर पूजा कर।
मुदा चाँद सौदागर िशवक भक्त। मना कऽ देलक।
मनसा क्रोिधत! चाँद सौदागरक सात टा बेटा। मनसा सातूकेँ कािट लेलक। सभ मरि गेल।
फेर एक बेर जहाजसँ अबैत रहए सौदागर चाँद। दूर देशसँ। मनसा जहाज डुमा देलक।
कंगाल भऽ गेल चाँद। मुदा तखने ओकरा एकटा बेटा भेलै। लखिन्दर नाम राखल गेलै ओकर।
चाँद सौदागर डरायल रहए से अखण्ड सौभाग्यवती कन्या िबहुलासँ बेटाक िबयाह करेलक
लखिन्दरक। आब की करतीह मनसा?
मनसा सपना देलन्हि चाँद सौदागरकेँ। कोहबरमे डसब तोहर बेटाकेँ।
पातर जालीसँ कोहबर बनबओलक चाँद। आब की करतीह मनसा?
मुदा मनसा पातरो सँ पातर भऽ गेलीह। कािट लेलन्हि आ लखिन्दर खतम।
मिथिलामे साँपक काटलकेँ केराक थम्हमे बान्हि देल जाइत अछि। बहि गेल लखिन्दर गंगामे।
मुदा िबहुला। ओही केराक थम्ह पर बैिस गेलीह पिताक संग।
संगम पहुँचैत गेलाह सभ, त्रिवेणी घाट! एकटा धोिबन कपड़ा खीिच रहल छलीह। बेटा कानए
लगलन्हि तँ ओकरा मािर कऽ कपड़ासँ झाँिप देलन्हि। फेर जाइ काल ओकरा िजया कऽ िबदा
भेलीह। पुछलन्हि िबहुला- तँ पता लागलन्हि जे मनसाक कृपासँ ई सम्भव अछि।
तप, तप तप। िबहुलाक तपसँ प्रसन्न मनसा लखिन्दर आ जेठ सातू भाँएकेँ िजया देलन्हि।
चाँद सौदागर प्रसन्न। चम्पानगरक लोक प्रसन्न। सभ मनसाक आ संगमे िबहुलाक पूजा करए लगलाह
तहियासँ।

2.मोतीसाएरि

मोरंग।
राजा भीमसेन। िनःसन्तान।
यज्ञ। कन्याक प्राप्ति। नाम मोतीसाएरि।
पैघ भेिल मोतीसाएरि।
-कुंडली देखू पंिडत।
पंिडत कुंडली देखलन्हि। एकरासँ जे िबयाह करत से एहि प्रपंचक सभटा सुखपर अधिकार करत।
सोचलन्हि-
-अद्भुत। एकरासँ जे हमहॴ िबयाह कऽ ली।
मुदा कहताह कोना?
-अहाँक बेटीक भाग्यमे अनिष्टे-अनिष्ट। अहाँ आ अहाँक राज्यक समापन भऽ जएत। अविलम्ब एकरा
राज्यसँ बाहर करू।
एकटा पैघ सन्दूकमे खेनाइ-िपनाइक सामग्रीक संग मोतीसएरि बन्द भऽ गेलीह। हुनका बहा देल गेल
धारमे। पंिडत चाहलक जे संदूक ऊपर कऽ ली। मुदा प्रवाह तेज रहै। बहि गेल संदूक। आ एकटा
बोनमे कात लागल।मोरंगक बोन। एकटा सरदार रहए गवल। बोनक सरदार। ओ मोतीसएरिकेँ बेटी
जेकाँ मानए लागल।
पंिडतकेँ एहि गपक पता लािग गेलैक।
राजाकेँ फेर सन्तान प्राप्तिक िललसा भेलैक। पंिडतसँ पुछलक।
-राजन्। मोरंग बोनक गवली सरदारक पुत्रीसँ जे अहाँक िबयाह भऽ जाए तँ पुत्रक प्राप्तिक योग
अछि!
पंिडत सोचलक जे बेटीसँ िबयाह केने ओकरा राज्यसँ च्युत कऽ देल जएतैक। आ फेर पंिडत राजा
बनि सकत।
गवलसँ भयंकर युद्ध। भीमसेन हािर गेल।
भीमसेन पंिडतसँ मंत्रणा कए यादव जाितक सरदार कृष्णारामकेँ बजेलन्हि।
-गवलक बेटीकेँ आनि कऽ िदअ आ अदहा राज्य लऽ जाऊ।
बुझेलक गवलकेँ कृष्णाराम, मुदा गवल नहि मानल। आक्रमण केलन्हि कृष्णाराम मुदा नहि हारल
गवल। मरछौर िछटवा देलन्हि कृष्णाराम। मोतीसाएरिकेँ भीमसेन लग पहुँचा देलन्हि आ आधा मोरंग
भेिट गेलन्हि कृष्णारामकेँ।
मुदा जखने िबयाहक प्रस्ताव देलन्हि भीमसेन मोतीसाएरि शाप देलन्हि आ अपने अन्तर्धान भऽ गेलीह,
मोक्ष भेटलन्हि हुनका। भीमसेनक राज्य खतम भऽ गेल।


3.माधव सिंह आ अमता गाम


मिथिलामे माधव सिंहक राज्य छल तखने भयंकर दुर्भिक्ष आयल।डबरा-चभच्चा धरि सुखा गेल। दरबार बजाओल गेल।
-राजन्। नेपालक दरबारमे रामनवाज, सीताराम, राधाकृष्ण आ करताराम चारि संगीतज्ञ छथि आ चारू भाइ छथि। हुनकर संगीतमे जादू छन्हि। ओ संगीतसँ बरखा करबा सकै छथि।
नेपालसँ आग्रह कएल गेल तँ ओ राधाकृष्ण आ करतारामकेँ मिथिला दरबारमे पठेलन्हि। ई दुनू गोटे ध्रुवपदक प्रसिद्ध गबैय्या छलाह। जखन ई दुनू भाँए पखावजी भीम मल्लिकक संग राग मेघ मल्हारक सुरक नोम-तोम पूर्ण केलन्हि तँ घटा आबि गेल। बन्दिश प्रारम्भ भेल आ भीम मल्लिक पखावजपर थाप देलन्हि तँ बुन्नी पड़ए लागल। फेर बरखाक पानि दरबार आबि गेल। चारू दिस दूत पठाओल गेल जे कतहु रुक्ख तँ नहि अछि। आ जखन ई पता लागि गेल जे कतहु रुक्ख नहि अछि तखन जा कऽ गायन खतम भेल।
राजा हुनका सभक लेल अमता गाममे घर बनबा देलन्हि आ ओहि गाममे खीरीक गाछ लगबा देलन्हि जकर फरमे दूध भरल रहैत छल।
राजा अमता गाम ध्रुवपदक आनन्द लेबाक लेल जाइत रहैत छलाह। मृत्युकालमे राजा ध्रुवपद सुनबाक लेल अमता गाम बिदा भेला मुदा रस्ते मे हुनकर मृत्यु भऽ गेलन्हि।

4.उगना
विद्यापति शिवक भक्त छलाह। हुनकर नचारी सुनि कऽ शिव कैलासमे नाचए लगैत छलाह आ एक बेर ओ निर्णय लेलन्हि जे ओ विद्यापतिक घरमे नोकर बनि रहताह।
विद्यापतिक पत्नीक नाम चन्दन छलन्हि आ शिव जखन नोकरक भेषमे उगना बनि पहुँचलाह तँ विद्यापति पत्नीक सहायता करबाक लेल उगनाकेँ नोकर राखि लेलन्हि।
एक बेर विद्यापति कतौ जाइत छलाह। उगना संगमे छलन्हि। रस्तामे गुमारसँ विद्यापति बेकल छलाह, पियास लागि गेलन्हि। मुदा पानिक कतहु पता नहि। उगना सेहो पानि लेल चारू दिस घुमल आ घुमि कऽ आयल तँ विद्यापतिकेँ मूर्छित देखलक। तखन उगना अपन असली रूपमे आबि कऽ जटाक गंगधारसँ पानि निकालि विद्यापतिकेँ पियेलखिन्ह। विद्यापतिकेँ होश अएलन्हि, मुदा गंगाजलक स्वाद ओ परखि लेलन्हि। उगनाक केश एखनो भीजल छल ओ बुझि गेलाह जे ई साक्षात् शिव छथि। शिव अपन असली रूपक दर्शन विद्यापतिकेँ देलखिन्ह।विद्यापतिकेँ दुख भेलन्हि जे ओ शिवकेँ नोकर राखलन्हि मुदा शिव तँ विद्यापतिक नचारीक भूखल। कहलखिन्ह जे अहाँक गीत सुनबाक लेल हम नोकर बनि कऽ रहब मुदा जहिये अहाँ ई भेद खोलि देब तहिये हम अन्तर्धान भऽ जएब।
एम्हर पार्वती दुखी छलीह। से एक दिन जखन चन्दन विद्यापतिकेँ तेतरि अनबाक लेल पठेलन्हि तँ पार्वती सभटा तेतरि पहिनहिये तोड़बा लेलन्हि। उगनाकेँ एकोटा तेतरि नहि भेटलन्हि आ जखन ओ घुरलाह तँ तामसमे चन्दन बाढ़नि लऽ कऽ छुटलीह। विद्यापतिकेँ ई देखल नहि गेलन्हि आ ओ हा शिव! कहलन्हि आकि शिव अन्तर्धान भऽ गेलाह। तकर बाद कतेक दिन धरि विद्यापति विक्षिप्त रहलाह।