छठि'क घाट (बीहनि कथा) - वी०सी०झा"बमबम" - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 7 नवंबर 2016

छठि'क घाट (बीहनि कथा) - वी०सी०झा"बमबम"

~ बउआ रउ बउआ !
~ हँ कि भेलहु ?

~ कि भेलहु करय छंऽ ! देखहि सब छठि'क घाट पर जाइतो गेलय आ तूँ एखन धड़ि - - - -
~ हँ सब गेलय तऽ कि भऽ गेलय ? एखन रातिक दूइए बजैत छैइक एखने कतय लोक जेतय ?

~ ऐंऽ रउ टोल पार मे कियो बाँकियो रहलय सब जाय गेलय आ तोहर निन्ने पहाड़ छउ ! दिनकर दिनानाथ तोरा कहिया उहि देथून से नहि कहि ?
~ तूं एना किआ करय छंऽ ? लोक गेलय तऽ जाय दहि हम भोर मे जायब जखन पह फटतय तखन !

~ ऐंऽ रउ तखन तोरहि लऽ लोक जगह रहऽ देतहु ? डाली प्रसाद रखवाक जगहो भेटतहु कि ?
~ नहि भेटतय तऽ एक कात संऽ पाछूए मऽ राखि देवय से हेतय नेऽ ?

~ लोक आगू मे रखय छैइक आ तों पाछू मे रखबहि से कहऽ तऽ ?
~ तऽ कि भऽ जेतैक सूर्यदेव आगू बला केर प्रसाद स्विकार करथिन आ पाछू बला'क नहि ! कि हुनक दृष्टि पाछू नहि परैत छैन्ह ? लोक सब अपनहि जँका देवीयो देवता केऽ सेहो बूझि गेलनि एह ! हुनक कृपा सगरहिं एकहि रंग रंह रहैत छैइक से लोक नित्य देखैत छैइक तइयो इहय हाल !

~ नहि से बात नहि छैइक !
~ आब कोनो बात रहौक हम सूतली राति मऽ जाऽ कऽ किआ हुनका अकच्छ करियौन से कह ? बेचारे भरि दिनका थाकल रहैत छथि आ अधरतिए सऽ जा'कऽ हम ओतय - - - ! नहि हम एहन पापक काज नहि करैत छी !
~ हरउ तोरा जे फूरौ से कर !


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