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"किछु पुरनका स्मृति जकरा मात्र मोन पाड़ल जा सकैत अछि"
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आधुनिक संचार युग मे व्यक्ति-व्यक्तिक मध्य संवाद स्थापित करब सुलभ भऽ गेल अछि । एक समय छल जहिया पत्र लेखनक माध्यमें संवादक प्रस्तुतिकरण होइत छल । पोस्टकार्ड, अंतर्देशी एवं लिफाफक माध्यमें चिट्ठी लिखल जाइत छल । गामक पोस्टआफिस मे भोरे-भोरे पोस्टकार्ड आदि खरीदल जाइत छल । चिट्ठीयों लिखनिहार कें ताकल जाइत छलन्हि । फलां गाम मे फलां बाबू बढ़ियां चिट्ठी लिखैत छथि एहि प्रकारक प्रक्रिया सँ विशेषरूपें गामक समाज मे अपनत्वक भावना कूटि-कूटि भरल रहैत छल आ प्रेमक अटूटता बंधन विलक्षण व अद्वितीय होइत छल । ओहिना मऽन पड़ैत अछि जे पत्र लेखनीक विशिष्ट परंपरा होइत छल । अतीतक स्मृति कें मोन पाड़ैत आह्लादित होइत छी आ किछु शब्दक प्रस्तुति करैत आनंदित होइत छी ।

तिथि .....
"श्री रामजी"
पूज्यवर/आदरणीय.......
चरण-स्पर्श ।

हम सब कुशल सँ छी । अपनेक/अपनेलोकनिक कुशलताक कामना माँ भगवती सँ मना रहल छी । जे सुनि मऽन आनंदित हो । आगां समाचार जे ........। पत्र-लेखनक शुभारंभ एहि प्रकारें होइत छल आ अंत मे लिखल जाइत छल - "चिट्ठीक जवाब शीध्रातिशीध्र दी । अपनेक पत्रक प्रतीक्षा मे .... अहाँक ......।

परन्तु आधुनिक संचार युग मे, ओझरायल प्रतिस्पर्धात्मक होड़ मे एवं एकाकीपन होइत जीवनक परिवेश मे साधनक सुलभताक अतिरेक मे हमरालोकैन उमंगित तऽ होइत छी परन्तु अतीतक मधुरमय स्मृति के सहेज कें रखबाक हेतु उदासीन बनि चुकल छी एवं चिंतनक व्यापकता कें संकुचित कऽ लेने छी । हमरालोकैन आधुनिक वातावरण एवं परिस्थिति व परिवेशक सामानांतर अपन जीवनक रक्षण-संबर्द्धन अवश्य करी परन्तु अतीतक श्रेष्ठता कें धारण करैत पूर्वज प्रदत्त धरोहर कें सेहो सहेज के राखब पारिवारिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दायित्व कें अनिवार्य बुझैत संरक्षण प्रदान करी ।

हठात् एहिना किछु स्मृति मोन पड़ि गेल आ अपने लोकनिक समक्ष प्रस्तुत करबाक प्रयास कयलौं । आशा करैत छी जे नीक लागत । जय श्री हरि ।
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