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"भारतीय संस्कृतिक ध्वजवाहक छथि संत- समाज"
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किछु दिन पूर्व संगी- संगतुरियाक संग हमरालोकनि 'संत- समाज' विषयक सामाजिक भूमिका पर चर्चा करैत छलौं एवं विषय- वस्तु क आलोक मे एहि धारणा कें दृढ़ करैत जे श्रेष्ठ समाज मे प्रत्येक व्यक्तिक योगदान सँ समाज एवं राष्ट्रक स्वरुप, प्रगतिक मार्ग प्रशस्त करैत विश्वक मानचित्र पर भारतीय गौरव गाथा कें गौरवान्वित करैत अछि । आम धारणा मे एहि बात कें स्वीकार करबा मे रंचमात्रहुँ संकोच नञ हेबाक चाही जे कोनो वस्तु अनुपयोगी नहि अछि । साधारण बुझअ मे आबए वला वस्तु अकस्मात् अत्यन्त उपयोगी वस्तु बनि हमरालोकनिक आवश्यकताक पूर्ति करैत अछि । कोन वस्तु कखन आवश्यकता पूर्ति हेतु अनिवार्य भ' सकैत अछि, कहब कठिन अछि ।

किछु व्यक्तिक प्रश्न छनि जे सामाजिक जीवन मे 'साधु- संत' क भूमिकाक की महत्त्व अछि वा कोन तरहक योगदानक उपयोगिता अनिवार्य अछि ? एहि प्रकारक तर्कहीन धारणा वस्तुतः मधुर जीवनक दिव्यतम् चिंतन कें कुंद करैत अछि एवं सभ्य समाज एहि नकारात्मक दृष्टिकोण कें विरोध कय आध्यात्मिक श्रेष्ठता कें स्थापित करैत उपलब्ध तथ्य क आधार पर 'साधु- संत' केर प्रति सम्मान प्रदान करबाक प्रति सर्वश्रेष्ठ भूमिकाक निर्वहन करबाक संकल्प लेथि । संत- समाज आंतरिक शान्ति, समभाव, सह-अस्तित्व एवं आनंदमय जीवनक दिव्यतम् सूत्र समाज एवं राष्ट्रक समक्ष प्रस्तुत करैत छथि । राष्ट्रक राजनैतिक एवं सामाजिक वातावरण कें पवित्रता प्रदान करबाक मार्ग प्रशस्त करबाक हेतु नैतिक ज्ञानक माध्यम सँ सात्त्विक जीवन जीबाक महत्त्व कें जीवंतता प्रदान करैत छथि ।

भारतीय समाज सदैव संत- समाज कें आदर एवं सम्मान द्वारा सर्वश्रेष्ठ सिंहासन पर प्रतिष्ठित कय स्वयं कें गौरवान्वित एवं आह्लादित महसुस करैत आबि रहल अछि । संत- समाज आध्यात्मक अनुसरण करैत सम्पूर्ण प्राणीमात्रक कल्याणक कामना करैत राष्ट्र एवं समाज कें श्रेष्ठ चेतना प्रदान करबाक मार्ग नियोजित करैत छथि ।

तैं विनम्रतापूर्वक निवेदन करब जे तथाकथित व्यक्तिक संकीर्ण नकारात्मक धारणा कें महत्त्वहीन बनाय, पूर्वज द्वारा प्रदत्त सर्वोत्तम एवं सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक धरोहर कें सम्पूर्णतः संबर्द्धित करैत तथा श्रेष्ठ संत परम्पराक प्रति हृदय सँ सम्मान प्रदान करैत, भारतीय संस्कृति कें उज्जवल, प्रखर एवं प्रमुदित बनेवाक पवित्र संकल्प सँ संकल्पित भ' ऋषि परम्परा कें प्रतिष्ठा प्रदान करी । इत्यलम् । जय श्री हरि । राजकुमार झा ।
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