"भय" - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

"भय"


हे प्रिय

हम अनंतकाल सँ,

तकैत छी अहाँक बाट ।

दिन-राति हमर

अनिमेष दूनू नेत्र सँ,

बहइछ गंगा-जमुनाक धार ।

करैत छी अहाँक स्मरण कऽ-कऽ-

करूण क्रन्दन ।

अहाँक एक झलक देखबा' लेल,

आकुल रहैछ हमर,

सर्वांग, तन-मन,

संगहि-

मोन रहैछ भयभीत-

अहाँके देखिकऽ,

अहाँके देखबाके,

हमर ई व्याकुलता

नहि कम भऽ जाइ