अजय ठाकुर (मोहन जी)- गजल - मिथिला दैनिक

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शनिवार, 5 नवंबर 2011

अजय ठाकुर (मोहन जी)- गजल

हमरा सुताबे के लेल जखन अन्हार रैत आबाई या
हम सुईत नै पाबै छी रैत अपने सुईत रहे या
पुछला पर दिल सँ एक आवाज़ आबै या
आई याद क लियऽ अपन प्रिय जान के रैत त रोज-रोज आबै या

कहाँ स लाबु ओ हम शब्द जे आहाँ के तारीफ के काबिल होय
कहाँ स लाबु ओ हम चाँद जैऽमे आहाक खूबसूरती शामिल होय
हे याई हमर बेवफा सनम एक बेर बता दिय
कहाँ स लाबु ओ किस्मत जै में बस आहा हमर होय

तारा में अकेला चाँद जगमगाय या
मुश्किल में अकेला इन्शान डगमगाया या
कँट (काँटा) स घबरैब नै मिथिला वाशी
कियाकी काँट में अकेला गुलाब मुस्कुराय या

आँइख में मंजिल छलै
गिरलो और समरैथ रहलो
आँधी में की दम छलै
चिराग हवा में जरबैत रहलो

दिल के हालत ककरो स कहल नै जय छल
दिल के हालत आब हमरा स सहल नहीं जय छल
तरपती तऽ हैती ओहो हमरे जेकॉँ
कियाकी हुनकर याद हरिदम नहीं आबे छल

आयल चिट्ठी मून भेल हुनकर हाथ के चूइम ली
जखन ओ पढ़ती त हुनकर होट के चुइम ली
भगवान नै करथि की ओ थिट्ठी के फारी दैथि
गिरैत-गिरैत हुनकर पैर के चुम ली

बितल बात हमरा याद आबै या
कुछ लम्हा के याद स आँखी भरी जाय या
ओ शाझ ओ भोर निराली जाय या
जखन आहा जेहन दोस्त के याद आबै या

हमरो कियो कुमारी कन्या याद करत हेती
अपना सपना में सजा रहल हेती
कियो करे या नै करे
ओ हमर जरुर इंतजार करेत हेती

कशिस त बहुत छल हमरो प्यार में
मगर की करू पत्थर दिल पिघलैतऽ नै या
अगर भगवान मिलता त हुनका स अपन हम प्यार मँगव
लेकिन सुनलो हन जे मरला स पहीले भगवान मिलते नहीं या

अजय ठाकुर (मोहन जी)
ग्राम+पोस्ट - भाल्पट्टी
जिला - दरभँगा