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नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म - १५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. )



मिथिला उवाच



पुरवा बहि रहल अछि चंडाल जकां सायं-सायं कऽ रहल अछि जेना दौगि रहल अछि .....आतुर भऽ - व्याकुल भऽ, हरा गेलैए किछु ..ताकि रहल अछि जेना !

सुखा गेल मुँह , नाक , कान सभटा , पैर तरक धरा मे दरार पड़ि गेल अछि....सौंसे खेत मे ,



छाती फाटि कऽ कानि रहल अछि जेना बुझा रहल छै सीता एखने गेलीहेँ धरतीमे फांक दऽकऽ !

मूड़ी ऊपर उठेलहुँ तँ लागल जेना चुनरी ओढा देलक कियो मुँहपर .........!

हे भगवान् बज्जर खसौ ई करिया बदरा केँ। सभ दिन कऽ अपन सकल देखा कऽ ...मुँह दुइस कऽ भागि जाइए! कनेकबो दर्द नै छै कोंढ़मे बेदर्दाकेँ ......!

आह ..हा ...नाक पर एगो शीतल बूंद खसल ओढ़नी सँ चुबि कऽ .......मोनक भ्रम अछि की .....



तखने दुनु पपनीपर खसल जेना कहि रहल अछि, उठू, आब नै सताएब हम अहाँकेँ किया एतेक अन्धेरेज

भेल अछि .....संतोख भेल भीतरसँ कने !

ठनका ,ठनकल जोरसँ तखने ........!

कतऽ गेल गै छौड़ी ........अमोट सुखाइ छौ अंगनामे उठा ले ने, पाइन एलै...... भिजलौ सभटा !

यै भौजी, असगनीपर सँ कपड़ा उतारू सभटा ..........भिजल ........( अमोट उठबैत एगो भौजीयोकेँ काज अरहेने गेल दुलरिया )

एक अछार बरिस कऽ रुकि गेल तँ निकलि गेलौं खेत दिस कने .......... आह हा ........ह्रदयक गहराइ तक उतरि गेल ओ सोन्ह्गर माटिक सुगंध पहिल अछारक बाद दबने छल जे बहुत दिनसँ भीतरमे !

मृग मरीचिका जेना भटकलौंहेँ कने काल ....., ओर ने कोनो छोर ओइ सुगंधक ,...



सजि-धजि कऽ बैसल अछि जेना मिलनक आसमे प्रेमीक बाट तकैत...

चारु दिस सुन्न पड़ल अछि खेत, नबका फसलक इंतजारमे!

सरजू काका महिना भरिसँ हरक शान चढ़ा रहल छथि फारक, बड़द सभकेँ खुआ-पिया कऽ टनगर बनेने निङहारैत छलथि आकाश ..



सभ दिन चारू दिशामे घूमि कऽ बरखाक आसमे,

लिअ आइ बरसि पड़ल !


राति भरि कतेक बरसल नै बुझि पड़ल , मुदा निन एहन पड़लौं जेना काल्हिये बोर्डक परीक्षा खतम भेल ......!

भरि गर्मीकेँ निन आँखिमे घुरमैत छल !

भोरे उठि दलानपर बैसि कऽ चाह पिबैत रही.....चन्दन बाबू कान्हपर कोदारि नेने दौगल जाइत छलाह बाध दिस ......



टोकलियनि तँ इशारामे किछु कहि कऽ भागि गेला ..... आन दिन चाहक नामपर बिन बजेन्हो टपकि पड़ैत छलथि .......आइ की भऽ गेलनि!

हे यौ, ई चन्दन बाबूकेँ की भऽ गेलनिहेँ, भोरे -भोरे .....- सरजू काका ओम्हरसँ अबैत रहथि, पुछलियनि।

हौ बौआ हुनकर खेतक पाइन सभटा बहल जाइत छनि, गेलाहेँ आइर बान्हऽ ,



..........ओहो सुआइत.!

संझाक बेर बिदा भेलहुँ पोखरि दिस .....लागल, बेंगक अज्ञातवास खतम भऽ गेल .......टर्र.. टर्र ... करैत खत्ताक ओइ पारसँ अइ पार तक .........



सुर ताल देबऽबलाक कमी नै, सभ एकै साथे प्रतियोगितामे ठाढ़ भेल जेना !

सबहक धानक बीया खसि पड़ल .........लुटकुन बाबूक बीया बड़ जोरगर छनि ....हेतै कोना ने, बेचारा ..राति दिन एक कऽ कऽ छाउर आ गोबरसँ खेतकेँ पाटि देने छलखिन! हुनकर खेतो तँ सभसँ पहिने गाममे रोपा जाइत छनि ...!

आइयो कादो कऽ कऽ एलैथहेँ .......झौआहमे ..!

गमछामे किछु फड़फराइत देखलियनि.....पुछलियनि काका की अछि तौनी मे ......?

हौ, खेत मे बड़ माछ छल गमछा सँ माँरलहुँहेँ ! काल्हि निचका बला खेत मे चास देबै, भेज दिहक छोटका केँ, बड़ माछ छै ..ओहू खेत मे !

ठीक छै ......कहलियनि ......!

मंगनीक माछ खाइमे बड़ मोन लगै छै मुँहमे पाइन आबि गेल सुनि कऽ!

जल्दी अबिहेँ, मशाला पिसबा कऽ रखने रहबौ ..............( छोटका केँ जाइत-जाइत कहलिऐ। )

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