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अजय ठाकुर (मोहन जी)
गजल


भोरे-भोरे उठी क शराब पीनाय कैलो हँन चालु
प्रभाकर जी आहा कहु जे इ पैग में कते पैन डालु

आहा ठंडा पैन स अपन आँखी धो क लाली त हटाबु
फ्रिज में स नबका बैगपेपर (दारू) के बोतल त पकराबु

रोज राति क सपना में हम ठेका पर जय छी
सबटा खेत और घरारी भरना लगा दैत छी

खेत और घरारी कखनो हम भरना नहीं लगैतो
आहा जे एक बेर अपन शराबी नैन स पिया दैतो

मानलो हम आहा के बहुत दूख-दर्द देलो
मुदा आहु त हमरा स पूरा प्रेम नहीं केलो

मानलो की आहा सुंदर-सुशिल हमर कनिया भेलो
मुदा आहा स ज्यदा हम दारू स प्रेम केलो

आब नहीं सताबु आबी जाऊ अपन घरे में रहब
भले दारू छोरी , दोस्त छोरी आहा के मारी सहब



रचनाकार :- अजय ठाकुर (मोहन जी)

अजय ठाकुर (मोहन जी)
ग्राम+पोस्ट - भाल्पट्टी
जिला - दरभँगा

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