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जहि‍ना अगुरबार दरमाहा उठा परदेशी घरक काज सम्‍हारैक लेल पत्‍नीकेँ पठबैत आ ओहि‍ रूपैयासँ, टावरक कि‍रदानीसँ अकछि‍ तेसर मोबाइल कीनए जाइत तहि‍ना झंझारपुरक हाटक चाउर-दालि‍क बजारमे ठकाइ देहरादून चाउरक दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ आँखि‍ गरौने। थालमे जनमल कमलक भौंरा सदृश्‍य ठकाइक मनमे उठलै- ऽसात दि‍नसँ दुनू संझी नवका गहूमक रोटी खाइत एलौं, भूसीपर पाइ उठा चाउर कीनए एलौं, जे सस्‍त हएत सहए ने कीनब।ऽ

मुदा लगले थल-कमलक बि‍ढ़नी जकाँ मन घुनघुनाएल- ऽचाउर तँ चाउरे छी, तहन नीक कि‍अए ने कीनब।ऽ

ओझराएल मने ठकाइ सइओ रूपैआमे कि‍लो भरि‍ चाउर कीनि‍, गमछाक खूँटमे बान्‍हि‍, तमाकू चुनबैत घरमुँहा भेल।

बीघा भरि‍ बटाइ खेतक उपजासँ छह मासक बुतात नि‍कलि‍ जाएत। बैशाखक पूर्णिमाक दि‍न। गहूमक लरती-तरती आबि‍ गेल आ धान-चाउरक चलि‍ गेलै। बाड़ीक तरकारी नि‍ङहटि‍ गेल छलैक, लऽ दऽ कऽ पटुआक साग टा छलैक। सेहो रोटी दुआरे छोड़ि‍ये देने। पटुआ सागसँ नीक नोन-मेरि‍चाइ।

हाट जाइये काल परसुका ढोलहो ठकाइकेँ मन पड़ल। मन पड़ि‍ते मुँहसँ हँसी नि‍कलल। मुदा हँसी रूकल नहि‍ मोकरक पानि‍ जकाँ बहि‍ते रहि‍ गेल। बाटो चलै आ असकरे हँसबो करै। तहि‍ बीच एकटा अधवयसू स्‍त्रीगण माथपर छाउरक पथि‍या नेने देखलनि‍ तँ मने-मन घुनघुनेलीह- “पुरूख छी की पुरूखक नांगड़ि‍। केदैन हँसला कीदैन देखि‍।‍” मुदा कि‍छु बजलीह नहि‍।

ठकाइक खुशीक कारण छलैक जे ढोलहो दऽ सोरहा केलक जे ईंटा-सि‍मटीक घर, पानि‍ पीबैले कल, खाइक उपाए एक सए पच्‍चीस रूपैयाक प्रति‍दि‍न काज, रोग-व्‍याधि‍क लेल खरतुआ दवाइ सभकेँ भेटत। जखन सब चीजक उपाए भइये गेल तखन कि‍अए लोक अनेरे मनकेँ भरयौने रहत। तेँ मन खुशी। दरदे ने ककरो माथ टनकै छै जौं दर्द रहबे ने करतै तँ माथ किअए टनकतै।

गामक सीमान टपि‍ते ठकाइक मनमे उठल। देवि‍यो-देवता हारि‍ मानतीह। बड़ दइ छेलखि‍न ते एक दि‍आरी साँझमे समांग, वि‍द्या, धन दइ छेलखि‍न। ईंटा-सि‍मटीक घर, पानि‍ पीबैक कल आकि‍ सवा सौक बोइन तँ नहि‍ दइ छेलखि‍न।

कि‍लो भरि‍ चाउरक मोटरी देखि‍ आंगन बाहरैत बि‍लटी बाढ़ब छोड़ि‍, हाथमे बाढ़नि‍ नेनहि‍ तरंगि‍ कऽ पति‍केँ पुछल- “हाटमे चाउर नइ छलै जे छुछे हाथे घुमि‍ गेलहुँ?‍”

मुस्‍की दैत ठकाइ बाजल- “आँखि‍मे रतौनी भेलि‍ अछि‍ जे चाउरक माटरी नइ देखै छीऐ।‍”

आँत मसोसि‍ बि‍लटी मने-मन सोचए लागलि‍ जे जेहने पटुआ साग गलनमा होइए तेहने अरबा चाउर। तहूमे मोटका चाउर पाँच दि‍न चलबो करैत, ई तँ एक्को दि‍न नइ चलत।

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