रूपैआक ढेरी- उमेश मंडल - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

रूपैआक ढेरी- उमेश मंडल

फुदकैत फुलि‍या कि‍ताब-काँपीक बस्‍ता माटि‍क रैकपर राखि‍ माएकेँ ताकए लगलीह। माए आंगनमे नहि‍ छलीह। पछुआरमे गोरहा पाथैत छलीह। ओना गोरहा पाथैक समए नहि‍ छल तेँ फुलि‍याक मनमे गोरहा पाथैक बात ऐबे नहि‍ कएल छल। मुदा तकबो करैत आ शोरो पाड़ैत। आंगनसँ नि‍कलि‍ जखने फुलि‍या डेढ़ि‍या लग आयलि‍ की गोरहा मचान लगसँ माएक बाजब सुनलक। गोरहा मचान लग पहुँचते फुलि‍या देखलनि‍ जे माए गोरहा पाथि‍ रहलीहेँ। मनमे तामस उठए लगलनि‍ जे एक तँ काति‍क मास तहूमे सूर्यास्‍तक समए, ई कोन समए भेल। अनेरे ठंढ़ लगतनि‍। मन खराब हेतनि‍। मुदा कि‍छु बाजलि‍ नहि‍। अप्‍पन बात बाजलि‍- “माए, परसू मधुबनी जाएब। लड़की‍ सबहक बीच ऽमहि‍ला सशक्‍तीकरणऽ वि‍षयक प्रति‍योगि‍ता अछि‍। सौंसे जि‍लाक छात्रा सभ रहतीह। हमहूँ जाएब। तहि‍ले कमसँ कम पच्‍चीस टा रूपैआक ओरि‍यान कए दे।”

मधुबनीक नाओ सुनि‍ अपन सभ सुधि‍-बुद्धि‍ बि‍सरि‍ गेलीह। हाथ गोबरपर रहनि‍, आँखि‍ बेटीक आँखि‍पर अा मन अकासमे कटल धागाक गुड्डी जकाँ उड़ए लगलनि‍। पँजरामे बैसि‍ फुलि‍या कहए लगलनि‍- “माए, हमरा जरूर इनाम भेटत।‍”

अकाससँ माएक मन धरतीपर खसि‍ पड़ल, मने-मन सोचए लगलीह जे पच्‍चीस रूपैआ कतऽ सँ आनब? कहलखि‍न- “‍बुच्‍ची, ताबे ककरोसँ पैइच लऽ लेह कि‍ए तँ जुग-जमाना बदलि‍ रहल अछि‍, बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोककेँ कोनो मोजर रहतै। तेँ कोनो धरानी रूपैआक ओरि‍यान कऽ लेह। गाए बि‍आएत तँ दूध बेचि‍ कऽ दऽ देबै।”

माएक बात सुि‍न फुलि‍या मुस्‍कुराइत कहलकनि‍- “धुर बुढ़ि‍या नहि‍तन, तीनि‍ रूपैये गोरहा बि‍काइ छै, दसेटा बेचि‍ लेब तहीमे तँ तीस रूपैआ भऽ जाएत। तइले ककरोसँ मुँह छोहनि‍ कि‍ऐ करब। ई तँ रूपैआक ढेरी छि‍अौ। जखैन जत्ते रूपैआक काज हेतौ, तखैन तत्ते बेचि‍ लि‍हेँ। तोरा कि‍ कोनो हेलीकेप्‍टर कीनैक छओ?‍”