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सुशांत झा
कयकटा मैथिली वेबसाईट पर मिथिला आ बिहार सं संबंधित लेख पढि कय ओतय चलै बला विकासपरक गतिविधि के अंदाज लागि पाबैये। इम्हर हमर एहेन मैथिल मित्र के संख्या में बड तेजी सं बृद्धि भेलय जे बिहार या मिथिला के विकास के बारे में जानय त चाहैत छथि लेकिन मैथिली में लेख पढ़य कहबनि त दिक्कत भय जाय छन्हि। हुनका मैथिली बाजय त अबै छन्हि लेकिन पढ़य नहि आबै छन्हि। ओ हिंदी बड आराम सं पढ़ लैत छथि लेकिन मैथिली पढ़य में दिक्कत के वजह सं ओ मैथिली साईट पढ़िते नहि छथि। ई बड्ड पैघ समस्या अछि।

देखल जाय त अमूमन जे कोनो भाषा के अपन लिपि जीवित छैक ओकरा पढ़ैबला के कोनो दिक्कत नहि होईत छैक-कारण जे ओ बच्चे सं ओहि भाषा के ओहि लिपि में पढ़ै के अभ्यस्त होईत अछि। जेना तमिल, तमिल में लिखल जाईत अछि, त एकटा औसत अंग्रेजीदां तमिलभाषीयो के ओकरा पढ़ै में कोनो दिक्कत नहि होईत छैक। लेकिन कल्पना करु कि अगर तमिल के देवनागरी में लिखल जाई त की होयत ? ओ आदमी तमिल त बाजि लेत-चूंकि ओ ओकरा अपन माय या परिवार के अन्य सदस्य के मुंह सं सूनि क सिखलक अछि-लेकिनि ओकरा पढ़ै में बड्ड दिक्कत हेतैक। ओकरा देवनागरी लिपि सेहो सिखय पड़तै। हमर भाषा संगे येह दिक्कत अछि। मैथिली के अपन लिपि त छैक, लेकिन ओ देवनागरी में लिखल जा रहल अछि-जाहि लिपि में हम सब सिर्फ हिंदी पढ़ै के आदी छी। अधिकांश मैथिली बजै बला के मैथिली त आबै छन्हि-कियेक त ओ सुनि कय सिखने छथि लेकिन ओ पढ़ि नै सकै छथि, कियेक त पढ़ैके आदत हुनका हिंदी के छन्हि।

ई बात स्वीकार करय में हमरा कोनो संकोच नहि जे हमर भाषा हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद के शिकार भेल अछि। ई संकट मैथिलिये टा संग नहि, बल्कि हिंदी क्षेत्र के तमाम भाषा जेना अवधी, भोजपुरी, ब्रज, राजस्थानी सबके संगे छै। देखल जाय त भोजपुरी कनी नीक अवस्था में अछि कारण जे एकरा बाजार सेहो सहयता कय रहल छैक। लेकिन जेना-जेना शहरीकरण बढ़ि रहल अछि देश में छोट-छोट भाषा आ बोली के स्पेश खत्म भय रहल अछि। देश के एकात्मक स्वरुप के विकास के लेल हिंदी आ अंग्रेजी अनिवार्य बनल जा रहल अछि। हलांकि दक्षिण के प्रांत आ उत्तर में बंगाल या उड़ीसा अहि स बहुत हद तक मुक्त अछि-ओना संकट ओतहु कम नहि। हमर भाषा मैथिली जनसंख्या के आकार, भौगोलिक स्थिति, प्राचीनता आ व्याकरण के दृष्टिकोण सं कोनो भाषा सं कम नहि लेकिन तैयो हम सब असहाय किये छी-ई एकटा विचारणीय प्रश्न अछि।


हमर दोस्त सब जिनकर जन्म पटना या दिल्ली में भेलन्हि ओ हिंदी में बात करैत छथि। हलांकि ओ अपन मां-बाबूजी सं मैथिली बाजि लैत छथि लेकिन अन्य मैथिल भाषी सं ओ हिंदीये में संवाद करैत छथि। एकर पाछू कोन मानसिकता अछि, कोन कारक एकरा प्रभावित कय रहल अछि, ताहि पर विवेचना आवश्यक।

दोसर बात हीन मानसिकता के सेहो। हम सब अपन संस्कृति के जेना बिसरि गेलहुं अछि। हमरा सब ज्ञान के मतलब अंग्रेजी के जानकारी मानि लेने छी, आ संस्कारित होई के मतलब हिंदी के नीक ज्ञान यानी खड़ी हिंदी के दिल्ली या टीवी के टोन में बाजै के ज्ञान मानि लेने छी। हमरा अपन प्राचीन परंपरा के ज्ञान सं या त वंचित कयल जा रहल अछि या हम सब खुद अनभिज्ञ भेल जा रहल छी या केयक टा आर्थिक वजह हमरा सबसं अमूल्य समय छीन रहल अछि जे हम सब अपन भाषा या संस्कृति के बारे में सोची। हमर कैयकटा मैथिल मित्र के ई ज्ञान नहि छन्हि जे सर गंगानाथ झा या अमर नाथ झा के छलाह। हुनका उमेश मिश्र के बारे में नहि बूझल छन्हि। हुनका सरिसव पाही या बनगाम महिसी के भौगोलिक जानकारी तक नहि छन्हि। हुनका मंडन मिश्र या जनक या मिथिला के प्राचीन विद्रोही विद्रोही परंपरा के बारे में बिल्कुले पता नहि छन्हि। लोरिक या सलहेस एखन तक यादवे या दुसाध के देवता कियेक छथि ? आ मैथिल के मतलब मैथिल ब्राह्मणे कियेक होईत छैक ? की हम एकात्म मैथिल के रुप में कोनो प्रश्न के सोचैत छी? अहू सवाल सं टकरेनाई आवश्यक।

इंटरनेट अहि दिसा में नीक काज कय रहल अछि। एम्हर कयकटा वेबसाईट पर मैथिली या मिथिला के बारे में नीक जानकारी आबि रहल अछि। लेकिन की एतब काफी अछि ? (जारी)

(ई लेख अहि सं पहिने 'समाद' पर प्रकाशित भय चुकल अछि)

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