अनुज सँ संवाद - रमण कुमार सिंह - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

अनुज सँ संवाद - रमण कुमार सिंह


हे
हमर अनुज लोकनि

सकय त क देब अहां सभ हमरा क्षमा
हम
नहि सौंपि सकब अहां सभ के
रागपूरित
पृथ्वी समूचा
जे
भेटल छल हमरा नेनपन में
हम
देबय चाहैत छी घर
अहां
के भेटत बाजार
हम
लिखय चाहैत छी प्रेम
अहां
के पढ़बा में आओत व्यापार

खाली अहींक गलती नै हैत
हम
सभ बहुत अन्हार समय में जीबि रहल छी
हमर
पूर्वज लोकनि पहिने रहैत छलाह जंगल में
एकटा
इजोत देखि ओ धयलनि विकासक बाट
इजोतक
पाछू-पाछू बौआय लगलहुं हमहूं
इजोत
बनि गेल मृग-मरीचिका आ
बौआयब
बनि गेल हमरा सभक बीमारी
कखनहुं
एकरा लग त कखनहुं ओकरा लग
बौआइए
रहल छी हम
अपना
लग थिर कहां रहि पबैत छी

निश्चये नीक दिन रहल होयत
जहिया
अपना लग थिर रहल होयब हम
आइ
बौआइत-बौआइत पहुंचि गेल छी
हम
विश्वग्राम धरि

हमर पूर्वज लोकनिक
वसुधैव
कुटुम्बकमक ग्राम त निश्चये नहि थिक
ग्लोबल
दुनियाक विश्वग्राम थिक ई
जतय
सभ किछु अछि बिकौआ
नेनपन
में हम बाबाक पराती सुनि
जागि
जाइत छलहुं अन्हरोखे
बाबा
लग छलन्हि अलग-अलग समयक लेल
अलग
-अलग राग
बाबा
क लैत छलाह समय सं संवाद
बाबा
समय के चिन्हबाक गुर जनैत छलाह
हम
नहि सीखि सकलहुं बाबा सं
समय
के चिन्हबाक गुर

नै बचा के राखि सकलहुं बाबाक राग
अइ
अन्हार समय में सभ किछु बिलटि गेल अछि
पथराय
गेल अछि गमर शब्द सभ
बौक
भ गेल अछि हमर इतिहास
स्मृति
के बिसरि ओझरा गेल छी
भौतिकताक
अन्हरजाली में हम सभ
हम
दिनोदिन बढ़ल जा रहल छी बुढ़ारी दिस

अहां सभ भ रहल छी
नेना
सं किशोर, किशोर सं युवा
बांचल
होयत हां सभ में अखनो
काल
सं संवाद करबाक साहस
बुढ़ायल
शताब्दीक अवसानक समय में
एकटा
लगभग असफल पीढ़ीक
प्रेम
आ सुभकामना अछि अहां संग
अपनहिं
सं चुनि लियअ अपन दिशा, अपन भविष्य
एहन
समय मे अहीं सभ गाबि सकैत छी
नव
स्वर लय ताल छंद मे
नवका
भोरक पराती...