गजल- आशीष अनचिन्हार - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

गजल- आशीष अनचिन्हार


देखिऔ कोना भेलैक गाछ के कात भेने
चिड़ैया बाजब छोड़ि देलक परात भेने


अहाँक दरस-परस महग थिक सजनी
सटि सकितहुँ अहाँक देह मे बसात भेने


आशो राखी तँ कनेक नीक जकाँ राखी
दालिए-तीमन ने बचै छैक भात भेने


हरेक घर मे एकटा कए अगत्ती जन्मए
सरकारक निन्न टुटिते छैक खुरापात भेने


लागि गेल छैक भरना सभहँक भाग-सोहाग
की हेतैक आगि लग सप्पत सात भेने