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देखिऔ कोना भेलैक गाछ के कात भेने
चिड़ैया बाजब छोड़ि देलक परात भेने


अहाँक दरस-परस महग थिक सजनी
सटि सकितहुँ अहाँक देह मे बसात भेने


आशो राखी तँ कनेक नीक जकाँ राखी
दालिए-तीमन ने बचै छैक भात भेने


हरेक घर मे एकटा कए अगत्ती जन्मए
सरकारक निन्न टुटिते छैक खुरापात भेने


लागि गेल छैक भरना सभहँक भाग-सोहाग
की हेतैक आगि लग सप्पत सात भेने

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  1. नये वर्ष की शुभकामनाओं सहित
    आपसे अपेक्षा है कि आप हिन्दी के प्रति अपना मोह नहीं त्यागेंगे और ब्लाग संसार में नित सार्थक लेखन के प्रति सचेत रहेंगे।
    अपने ब्लाग लेखन को विस्तार देने के साथ-साथ नये लोगों को भी ब्लाग लेखन के प्रति जागरूक कर हिन्दी सेवा में अपना योगदान दें।
    आपका लेखन हम सभी को और सार्थकता प्रदान करे, इसी आशा के साथ
    डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
    जय-जय बुन्देलखण्ड

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  2. यद्यपि एहि बात पर विवाद छैक जे हिंदी पत्र-पत्रिका में ग़ज़ल सन विधा के कतेक स्थान देल जाए(प्रश्न पूछल जाइत छैक जे जं हिंदी पत्र-पत्रिका में ग़ज़ल छपतैक,त छप्पय,दोहा,छंद,चौपाई,सवैया,कवित्त,कुंडलियां आदि की उर्दू पत्रिका में छपतैक?) मुदा,बूझि पड़ैछ जे एहि में लोकप्रियताक तत्व प्रचुर छैक आ ई मैथिली केर संस्कृतनिष्ठताक पक्षधरलोकनि के सेहो हिंदुस्तानी बोली दिसि उन्मुख करबा में सक्षम छैक। लिखैत रहू।

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  3. कुमार राधारमण जी अपनेक टिप्णणी कोन संदर्भक थिक से बुझबा मे हम असमर्थ छी। सब सँ पहिल गप्प जे हम हिंदी मे नहि लिखैत छी आ ने उपरोक्त ब्लाग हिंदीक थिक। तखन अपनेक प्रश्न जे हिंदी पत्र-पत्रिका मे गजल छपतैक त की उर्दू मे दोहा, कुडंलिया. सवैया आदि छपतैक कतेक समीचीन अछि से अहाँ अपने जानू मुदा हमरा नजरि मे इ दिमगी गुलामीक प्रतीक थिक। हिंदीक गुलामी करैत-करैत अपनेक विचारो बन्हा गेल अछि। जँ अपने के इएह प्रश्न अभीष्ट हो त ओहि सँ पहिने अपने संपूर्ण रुपें उर्दूक साहित्य पढ़ू जतए अपने के अकबर इलाहाबादी भेटताह संगहि-संग भारतीय छंद शास्त्र सेहो भेटत। गजलक अधिकांश बहर भारतीय छंद सँ मेल रखैत अछि इ कहबाक हमरा कोनो जरुरति नहि ।
    दोसर गप्प जे हम गजल एहि कारणे लिखैत छी जे मैथिल लोकनि मैथिलीक दिस झुकथि हिनदुस्तानीक दिस नहि। मैथिली आ हिनदुस्तानी मे बड्ड अंतर छैक।
    जाहि दिन हमर गजल पढ़ि मैथिल लोकनि हिन्दुस्तानी दिस झुकताह ओहि दिन हमर कलमक पराजय होएत आ हमर लेखनक अंत सेहो।

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