बाजार-कालमे मन- गंगेश गुंजन - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

बाजार-कालमे मन- गंगेश गुंजन


शब्दकें छुच्छे काने टा नहि
आँखि चाहिऐ
आँखिकें मन-मस्तिष्क।
मन-मस्तिष्ककें चाहिऐ जेना ज्ञान
तकरा लेल छठम इन्द्रिय।
अंगकें निरोग सम्वेदन-गुण,
गुणकें चाही अपन सहज प्राकृतिक सुगन्धि।
कोनो वस्तु बिलाइत-तिलाइत नहि छै
ब्रह्माण्डसँ बाहर तँ कथमपि नहि।
कखनो हेराइत, कखनो नुकाइत, आ कखनो बलात।
नुकाओल-चोराओल वा बेचि देल जाइ छै
हमर, अहाँक, अहाँक मित्राक वा सखी-बहिनपाक प्राण-वस्तु पर्यन्त बन्हकी।
मामूली लोटा किम्बा हाथ घड़ी वा पाँच-दस टाका
विभागीय परिचय फोटो-कार्ड, थोड़ेक टेलिफोन नम्बर वला फाटल मनीबैग
हेरा जाइत अछि, केहन विकल भेल दौड़ै छी पुलिस थाना--
एफ.आइ.आर. लिखेबा लेल?
एते रास शब्द, मन, गुण, गन्ध
एहन देखार बलजोरीसँ बेचल-बिकनल चल जा रहल’ए--
ई धूत्र्त बजार-काल,
तखनहुँ कोना छी एतेक निश्चिन्त, नहि जानि।
भने मैथिले होइ अहाँक मन किऐक नहि खदकै-बड़कै’ए
चूल्हि परक बासनक खिच्चड़ि, लोहियाक तीमन-तरकारी जकाँ?
आ कि गाएब अछि, आइ-काल्हि जेना बासन-लोहियासँ खदकब-बड़कबक शब्द
अहूँक हृदयसँ तहिना अनुभूति?
कोन आश्चर्य काल्हि खन स्नेह आ अनुरागो हेराएल वस्तु भ’ चलए। आ प्रेम?
प्रेमकें तँ ई डिजिटल युग, प्रतिदिन क’ लैत अछि अगवा,
आ पठा दैत अछि -- अमेरिका-इंगलैंड।
हाल हालक पछिला शताब्दीमे जेना कोंचि-काँचि क’ ल’ गेल जाइत रहए
भूखें असहाय यू.पी., बिहारक सए-हजार ज’न बनिहार
पानिक विशाल जहाजक जहाज -- माॅरिशस-फीजी-त्रिनिदाद?
-समुद्रे-समुद्र?