फेरसँ हरियर - रमण कुमार सिंह - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

फेरसँ हरियर - रमण कुमार सिंह


एक टा वयसक एकाकीपनसँ त्रास्त
हम आ अहाँ भेल छलहुँ संग
दुःख, उमेद आ उत्सवक ओहि राति

एक दोसरासँ अपन-अपन दुःख बाँटैत
पता नहि कहिया क’ नेने छलहुँ निर्णय
जे जहिया कनियों टा सुख क’ लेब अर्जित
दुनू गोटए मिलि क’ भोगब
साँचे कहै छी मीता
अहाँक आँखिमे चमकैत आकांक्षा देखि
मौसम अनेरो लाग’ लागल छल सोहाओन
हमर साँसमे व्यग्रता और
शब्दमे उत्साहक होमए लागल संचार
अहर्निश अहींक संगीत गूँजै छल
हमरा हृदयमे
अपन सपनाक एकान्तमे रचने छलहुँ एक टा
सुख-संसार
मुदा यातना आ प्रेमक एहि कथाक
अन्त भेल संशय आ नाउमेदीक कुहेसमे
सब किछु सूगा-मैनाक कथा जकाँ
व्यर्थ भेल मीता
कोनो कथाक एहन अन्त
कतेक दारुण होइ छै से बूझल अछि मीता?
तकर बाद किछु बाकी नहि रहै छै
निपट रिक्तता आ बेमतलब जीवन
अपने मोन समझाबै छै अपना मोनकें
दैत रहै छै भरोस
मित्रा-परिजन सब बुझबैत रहैत अछि
जीवनकें फेरसँ सुखमय बनेबाक व्योंत
नाउमेदीक एहि दौरमे कतहुसँ
उमेदक एक टा टुस्सी फुटैत अछि
आ जिनगी होमए लगैत अछि
फेरसँ हरियर।