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संस्कृत भाषा केर प्रासंगिकता एही में छैक जे पाठ्यक्रम के साथे-साथ एकरा बातचीतक माध्यम बनाओल जाए। लोकमानस के कंठ में संस्कृत उतरतैक, तखनहिं ओ अपन प्रासंगिकता के बरकरार राखि सकत। एही संकल्पक संग श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में काल्हि राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन समाप्त भेल। सम्मेलन के आखिरी दिन संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन आ लौकिक संस्कृत साहित्य में बिहार के प्रतिभागिता पर व्यापक चर्चा भेलैक। सम्मेलन एहि निष्कर्ष पर समाप्त भेल जे अखुनका समय संस्कृत के देव भाषा कहिकए गौरव-गान करबाक नहिं छैक। बल्कि, शिक्षण-प्रशिक्षण आ प्रचार-प्रसार के अतिरिक्त,एकरा व्यवहार में अनबा लेल, रोजगारपरक बनएबा लेल आ वैज्ञानिक पद्धति अपनएबाक नितांत आवश्यकता छैक। संस्कृत भाषा आमजन केर बोली में केना इस्तेमाल हुअए,एहू पर विद्वानलोकनि अपन-अपन विचार व्यक्त कएलनि। विशेष रूप सं, डा. शिववंश पाण्डेय संस्कृत के उन्नयन में बिहारक पत्र-पत्रिका सभहक दृष्टिकोण के अलावा संस्कृत लेखकलोकनिक चर्चा कएलनि। एहि सं पूर्व, संस्कृत के उन्नयन के ल कए चारि सत्र में चर्चा भेलैक। पहिल सत्र में, डा. शिववंश पाण्डेय लौकिक संस्कृत साहित्य पर बजलाह। एहि सत्र में डा. उमेश शर्मा, डा. मिथिलेश कुमारी मिश्र, डा. एचएन ठाकुर व प्रो. राम प्रसन्न शर्मा समेत अन्य प्रतिनिधिलोकनि हिस्सा लेलनि। प्रो. रामविलास चौधरी अध्यक्षता कएलनि आ आचार्य रामविलास मेहता धन्यवाद ज्ञापन । विविध आलेख वाचन सत्र में, कुरुक्षेत्र विवि के प्राध्यापक प्रो. रणवीर सिंह, वासुदेव प्रसाद सिंह, डा. ब्रह्मचारी सुरेन्द्र आ बी.बी. प्रसाद समेत अन्य प्रतिनिधिलोकनि विचार व्यक्त कएलनि। संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन सत्र में कोलकाता के जितेन्द्र धीर, हैदराबाद के डा. अहिल्या मिश्र, तमिलनाडु के चन्द्रभूषण, बनारस हिन्दू वि.वि., वाराणसी के प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, आर.पी. चौधू आ प्रो. अरविन्द कुमार समेत अन्य प्रतिनिधिलोकनि प्रतिभागी छलाह।

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  1. इ जानकारी देबक लेल अहांक बहुत-बहुत धन्यवाद
    नव वर्षक हार्दिक शुभकामना।

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