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एकटा निवेदन
हे मिथिला-मैथिलीक उन्नायक-कर्मसाँढ़!
अछि एकटा निवेदन--
राजकमलक स्वरगन्धा आ
अन्य-अन्य कुकीर्तिक छै पसरल दुर्गन्धि,
वातावरण भेल छै विषाक्त आ सड़ाइन,
भ’ ने जाए अहूँंक साँस कतौ दूषित,
तें उनटा क’ खुटिया धोतीक खूट
क’ लिअ’ प्राणायामक कुम्भक
छोड़ि दिअ’ साँस लेब, एहि दूषित--सड़ाइन वायुमण्डलमे।
गरदनियाँ द’ निकालि दिऔ
ओहि दूषित प्राणवायुकें
जे किंचित जान वा अनजानमे
खिंचा गेल अछि साँसमे।
मानि लिअ’ हमर निवेदन आ’ ई सद्यः प्रार्थना--
मुक्ति प्रसंगक यौनाक्रान्त कुण्ठाक
अन्हर-बिहाड़िमे
उड़िया ने जाए अहाँक पाग कतौ
तें धेने रहू कसि क’
(भ’ सकए तँ काँख तर दाबि लिअ’)
मटर भरि गीड़ि लिअ’ बालु-गोबर
करेज पर बामा हाथ द’
मोकि दिऔ कण्ठ अपन साँसक--धुकधुक्कीक,
जे अनुखन करैत अछि--
धक्-धक्-धक्, धक्-धक्-धक्-
राजकमल ! राजकमल !!

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