पाँच पत्र/ रेलक अनुभव/ मर्यादाक भंग-हरिमोहन झा - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

पाँच पत्र/ रेलक अनुभव/ मर्यादाक भंग-हरिमोहन झा

पाँच पत्र
एक
दड़िभङ्गा १-१-१९
प्रियतमे
अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ। परन्तु हमरा ओ अहाँक बीचमे भारी भदबा छथि। अहाँक बाप-पित्ती, जे दू मासक बाद फगुआमे हमरा आबक हेतु लिखैत छथि। साठि वर्षक बूढ़केँ की बूझि पड़तनि जे साठि दिनक विरह केहन होइत छैक !
प्राणेश्वरी, अहाँ एक बात करू माघी अमावस्यामे सूर्यग्रहण लगैत छैक। ताहिमे अपना माइक संग सिमरिया घाट आउ। हम ओहिठाम पहुँचि अहाँकें जोहि लेब। हँ एकटा गुप्त बात लिखैत छी जखन स्त्रीगण ग्रहण-स्नान करऽ चलि जएतीह तखन अहाँ कोनो लाथ कऽकऽ बासापर रहि जाएब। हमर एकटा संगी फोटो खिचऽ जनैत अछि। तकरासँ अहाँक फोटो खिचबाएब देखब ई बात केओ बूझए नहि। नहि तँ अहाँक बाप-पित्ती जेहन छथि से जानले अछि।
हृदयेश्वरी हम अहाँक फरमाइशी वस्तु –चन्द्रहार- कीनिकऽ रखने छी। सिमरियामे भेट भेलापर चूपचाप दऽ देब। मुदा केओ जानए नहि हमरा बापके पता लगतनि तँ खर्चा बन्द कऽ देताह। हँ एहि पत्रक जबाब फिरती डाकसँ देब। तें लिफाफक भीतर लिफाफ पठारहल छी। पत्रोत्तर पठएबामे एको दिनक विलम्ब नहि करब। हमरा एक-एक क्षण पहाड़सन बीतिरहल अछि। अहाँक प्रतीक्षा मे आतुर।
पुनश्च : चिट्ठी दोसराके छोड़क हेतु नहि देबैक। अपने हाथसँ लगाएब रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक।
दू
हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-२९
प्रिय,
बहुत दिनपर अहाँक पत्र पाबि आनन्द भेल। अहाँ लिखैत छी जे ननकिरबी आब तुसारी पूजत, से हम एकटा अठहत्थी नूआ शीघ्र पठा देबैक। बंगट आब स्कूल जाइत अछि कि नहि? बदमाशी तँ नहि करैत अछि? अहाँ लिखैत छी जे छोटकी बच्चीके दाँत उठि रहल छैक, से ओकर दबाइ वैद्यजीसँ मङबाकऽ दऽ देबैक। अहूके एहिबेर गामपर बहुत दुर्बल देखलहुँ जीरकादि पाक बनाकऽ सेवन करू। जड़कालामे देह नहि जुटत तँ दिन-दिन ह्रस्त भेल जाएब। ओहिठाम दूध उठौना करू। कमसँ कम पाओभरि नित्य पिउल करब।
हम किछु दिनक हेतु अहाँकें एहिठाम मङा लितहुँ। परन्तु एहिठाम डेराक बड्ड असौकर्य। दोसर जे विद्यालयसँ कुल मिला साठि टका मात्र भेटैत अछि। ताहिमे एहिठाम पाँचगोटाक निर्वाह हएब कठिन। तेसर ई जे फेर बूढ़ीलग के रहतनि ! इएहसभ विचारिकऽ रहि जाइत छी। नहि तँ अहाँक एतऽ रहने हमरो नीक होइत। दुनू साँझ समयपर सिद्ध भोजन भेटैत बंगटो के पढ़बाक सुभीता होइतैक। छोटकी कनकिरबीसँ मन सेहो बहटैत। परन्तु कएल की जाए ! बड़की ननकिरबी किछु आओर छेटगर भऽ जाए तँ ओकरा बूढ़ीक परिचर्यामे राखि किछु दिनक हेतु अहाँ एतऽ आबि सकैत छी। परन्तु एखन तँ घर छोड़ब अहाँक हेतु सम्भव नहि। हम फगुआक छुट्टीमे गाम अएबाक यत्न करब। यदि नहि आबि सकब तँ मनीआर्डर द्वारा रुपैया पठा देब।
अहींक कृष्ण
पुनश्च : चिट्ठी दोसराकें छोड़क हेतु नहि देबैक अपने हाथसँ लगाएब। रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक।


तीन

हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-३९
शुभाशीर्वाद

अहाँक चिट्ठी पाबि हम अथाह चिन्तामे पड़ि गेलहुँ। एहिबेर धान नहि भेल तखन सालभरि कोना चलत। माएक श्राद्धमे पाँच सए कर्ज भेल तकर सूदि दिन-दिन बढ़ले जा रहल अछि। दू मासमे बंगटक इमतिहान हएतनि। करीब पचासो टका फीस लगतनि। जँ कदाचित पास कऽ गेलाह तँ पुस्तकोमे पचास टका लागिए जएतनि। हम ताही चिन्तामे पड़ल छी। एहिठाम एक मासक अगाउ दरमाहा लऽ लेने छियैक। तथापि उपरसँ नब्बे टका हथपैंच भऽ गेल अछि। एहना हालतिमे हम ६२ टका मालगुजारी हेतु कहाँसँ पठाउ? जँ भऽ सकए तँ तमाकू बेचिकऽ पछिला बकाया अदाय कऽ देबैक। भोलबा जे खेत बटाइ कएने अछि, ताहिमे एहिबेर केहन रब्बी छैक? कोठीमे एको मासक योगर चाउर नहि अछि। ताहिपर लिखैत छी जे ननकिरबी सासुरसँ दू मासक खातिर आबऽ चाहैत अछि। ई जानि हम किंकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल छी। ओ चिल्हकाउर अछि। दूटा नेना छैक। सभकेँ डेबब अहाँक बुते पार लागत? आब छोटकी बच्ची सेहो १० वर्षक भेल। तकर कन्यादानक चिन्ता अछि। भरि-भरि राति इएहसभ सोचैत रहैत छी, परन्तु अपन साध्ये की? देखा चाही भगवान कोन तरहें पार लगबै छथि!
शुभाभिलाषी
देवकृष्ण
पुनश्च : जारनि निंघटि गेल अछि तँ उतरबरिया हत्ताक सीसो पंगबा लेब। हम किछु दिनक हेतु गाम अबितहुँ किन्तु जखन महिसिए बिसुकि गेल अछि तखन आबिकऽ की करब?
अहाँक देवकृष्ण


चारि
हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-४९
आशीर्वाद
हम दू माससँ बड्ड जोर दुखित छलहुँ तें चिट्ठी नहि दऽ सकलहुँ। अहाँ लिखैत छी जे बंगट बहुकें लऽकऽ कलकत्ता गेलाह। से आइकाल्हिक बेटा-पुतहु जेहन नालायक होइत छैक से तँ जानले अछि। हम हुनकाखातिर की-की नहि कएल! कोन तरहें बी।ए। पास करौलियनि से हमहीं जनैत छी। तकर आब प्रतिफल दऽरहल छथि। हम तँ ओही दिन हुनक आस छोड़ल, जहिया ओ हमरा जिबिते मोछ छँटाबऽ लगलाह। सासुक कहबमे पड़ि गोरलग्गीक रुपैया हमरालोकनिकेँ देखहु नहि देलनि। जँ जनितहुँ जे कनियाँ अबितहि एना करतीह तँ हम कथमपि दक्षिणभर विवाह नहि करबितियनि। १५०० गनाकऽ हम पाप कएल, तकर फल भोगिरहल छी। ओहिमेसँ आब पन्द्रहोटा कैँचा नहि रहल। तथापि बेटा बूझैत छथि जे बाबूजी तमघैल गाड़नहि छथि। ओ आब किछुटा नहि देताह आर ने पुतहु अहाँक कहलमे रहतीह। हुनका उचित छलनि जे अहाँक संग रहि भानस-भात करितथि, सेवा-शुश्रुषा करितथि। परञ्च ओ अहाँक इच्छाक विरुद्ध बंगटक संग लागलि कलकत्ता गेलीह। ओहिठाम बंगटकें १५० मे अपने खर्च चलब मोश्किल छनि कनियाँकें कहाँसँ खुऔथिन। जे हमरालोकनि ३० वर्षमे नहि कएल से ईलोकनि द्विरागमनसँ ३ मासक भीतर कऽ देखौलनि। अस्तु। की करब? एखन गदह-पचीसी छनि। जखन लोक होएताह तखन अपने सभटा सुझतनि। भगवान सुमति देथुन। विशेष की लिखू? कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।
देवकृष्ण
पुनश्च: जँ खर्चक तकलीफ हो तँ छओ कट्ठा डीह जे अहाँक नामपर अछि से भरना धऽकऽ काज चलाएब। अहाँक हार जे बन्धक पड़ल अछि से जहिया भगवानक कृपा होएतनि तहिया छुटबे करत!
पाँच
काशीतः
१-१-५९
स्वस्ति श्री बंगटबाबूकें हमर शुभाशिषः सन्तु।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। आगाँ सुरति जे एहि जाड़मे हमर दम्मा पुनः उखरि गेल अछि। राति-रातिभरि बैसिकऽ उकासी करैत रहैत छी। आब काशी-विश्वनाथ कहिया उठबैत छथि से नहि जानि। संग्रहणी सेहो नहि छूटैत अछि। आब हमरालोकनिक दबाइए की? औषधं जाह्नवी तोयं वैद्यो नारायणो हरिः। एहिठाम सत्यदेव हमर बड्ड सेवा करैत छथि। अहाँक माएकें बातरस धएने छनि से जानिकऽ दुःख भेल परन्तु आब उपाये की? वृद्धावस्थाक कष्ट तँ भोगनहि कुशल! बूढ़ीकें चलि-फीरि होइत छनि कि नहि? हम आबिकऽ देखितियनि, परञ्च अएबा जएबामे तीस चालीस टका खर्च भऽ जाएत दोसर जे आब हमरो यात्रा मे परम क्लेश होइत अछि। अहाँ लिखैत छी जे ओहो काशीवास करऽ चाहैत छथि। परन्तु एहिठाम बूढ़ीके बड्ड तकलीफ होएतनि। अपन परिचर्या करबा योग्य त छथिए नहि, हमर सेवा की करतीह? दोसर जे जखन अहाँ लोकनि सन सुयोग्य बेटा-पुतहु छथिन तखन घर छोड़ि एतऽ की करऽ औतीह? मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा! ओहिठाम पोता-पोतीके देखैत रहैत छथि। पौत्रसभके देखबाक हेतु हमरो मन लागल रहैत अछि। परञ्च साध्य की? उपनयनधरि जीबैत रहब तँ आबिकऽ आशीर्वाद देबनि। अहाँक पठाओल ३० टका पहुँचल एहिसँ च्यवनप्राश कीनिकऽ खा-रहल छी। भगवान अहाँके निकें राखथु। चि। पुतहुके हमर शुभाशीर्वाद कहि देबनि। ओ गृहलक्ष्मी थिकीह। अहाँक माए जे हुनकासँ झगड़ा करैत छथिन से परम अनर्गल करैत छथि। परन्तु अहाँकेँ तँ बूढ़ीक स्वभाव जानले अछि। ओ भरिजन्म हमरा दुखे दैत रहलीह। अस्तु कुमाता जायेत क्वचिदपि कुपुत्रो न भवति, एहि उक्ति के अहाँ चरितार्थ करब।
इति देवकृष्णस्य
पुनश्च : यदि कोनो दिन बूढ़ीके किछु भऽ जाइन तँ अहाँलोकनिक बदौलति सद् गति होएबे करतनि जाहि दिन ई सौभाग्य होइन ताहि दिन एक काठी हमरोदिस सँ धऽ देबनि।


रेलक अनुभव

वैद्यनाथधाम सँ गाम अबैत रही । ओही डिब्बा मे एक बंगाली सज्जनक परिवार छलनि। बंगाली बाबू हुनक स्त्री एक युवती कन्या तथा एक स्तन्धन्य शिशु । ओ लोकानी एक सम्पूर्ण गद्दा पर अपन एकाधिकार स्थापित कयने छलाह । ओही बेंच पर आउर केओ आबी क बैसे स हुनका लोकनि के अभीष्ट नहि छलैन्ह तें खूब पसरी क बैसल छलाह । संगही संग पेटी बिस्तर ओ अन्यान्य समानक तेहन चक्रबुह बनोने छलाह जाकर भेदी क प्रवेश कयनाय ककरो हेतु सहज नहि छलैक । आगंतुक शत्रु स मोर्चा लेबक हेतु बंगाली बाबू स्वयं अगला मोहरा पर बैसल छलाह ।

शेष बर्थ लोक स गचा गच भरल छल ।झा झा मे दुई टा मारवाड़ी सज्जन चढ्लाह बेस भरी भरकम अढाई मन स कम नहि ।बंगाली बाबू आक्रंकारी के आयल देखि अपन दुर्ग रक्षा क हेतु सतर्क भय गेलाह ।दुनु सज्जन एम्हर ओम्हर ताकि बंगाली बाबू के संबोधन क कहाल्खिंह उधार बहुत जगह है जरा खिसक जाईये तो हम लोग भी बैठ जाय । बंगाली बाबू बिगडी क बजलाह जोगाह कहाँ है ? दोसर डिब्बा देखिये । मारवाड़ी ---बाबू साब आउर कही जगह नहि है जरा आप ही तकलीफ कीजिये ।परन्तु बंगाली बाबू टस स मस नहि भेलाह ।अगतया दुनु मारवाड़ी सज्जन हमरा लोकनिक बर्थ लग आबी ठाढ़ भय गेलाह ।कोनो तरहें बैसबाक समावेश कैल गेल ।ओम्हर बंगाली बाबू अपन प्रोढ़ा पत्नी के आराम स ओंगठी जयबाक ब्योत लगाबय लगलाह ।हुनका कष्ट नहि होइन तदर्थ एकटा गल तकियों राखी देल्खिंह ।गिधोर मे एकटा वृधा चढ्लीह दीनता पूर्ण दृष्टि स बंगाली बाबू दिस तकैत ठाढ़ी भय गेलीह ।परन्तु बंगाली बाबू ओही मूक प्रार्थना स विचलित होमय बाला जीव नहि छलाह ।ओ दोसर दिश ताकै लगलाह लोक जेना भिक्षुक स आंखि फेर लेत अछि ।अंत में बूढी स्पष्ट शब्दे एक बीत बैसवाक योग्य स्थानक भिक्षा मंगलैंह ।बंगाली बाबू अहि हेतु पहिनाही स तैयार छलाह ।कहाल्खिंह जोनानी गाड़ी में जाइए बूढी कहाल्खिंह जनानी गाड़ी मे स्थान नहि छैक हमरा एक स्टेशन जएबाक अछि ।जमुई में उतारी जायब ।बंगाली बाबू उत्तर देल्खिंह जे एक स्टेशन जाना है तब तो उसी माफिक खड़े खड़े ही चोलने सकता है ।

इ कही बंगाली बाबू आउर पसरी क़ बैसी गेलाह ।हम स्वय ट्रंक पर बैसी गेलहुं आ वृधा के अपना स्थान पर बैसा देलयनी।ओ हमरा आशीर्वाद देत बैस गेलीह आउर जमुई पहुंचला पर उतरी गेलीह ।

जमुई मे तीन टा गोरखा चढ़ल । सबहक संग एक एक खुखरी । ओ सब सोझे बंगाली बाबू दिस धाबा क देलकैन ।बंगाली बाबू फराके स घुड़की देलखिन्ह इधर कहाँ स आने मांगता ?दोसर डिब्बा मे जाओ ।परन्तु नेपाली बोको की बुझे !हुनकर किलाबंदी के धडैत धडैत लग में पहुच गेलैंह । बंगाली बाबू भयभीत होयत बजलाह अरे बाबा जनाना के मुड़ी पर बोसेगा ?हम अलार्म खिचता है ।

बंगाली बाबू धरफरा क जिन्जिर खिचाबक हेतु उद्यत भेलाह ।इ देखि नेपाली गोरखा हँसैत दोसर कोठरी मे चल गेल ।आब बंगाली बाबू सुभ्यस्त भय थर्मस बाहर केलैंह ।हुनकर स्त्री प्याला सब मे चाह भरि भरि क देबय लागल खिन्ह।

तावत गाडी क्विअल पहुँच गेल । एक सज्जन हाथ मे आनंद बाजार पत्रिका नेने कोठली क सामने पहुँचलाह ।हुनका पाछा दुई टा स्त्री बंगला परिधान मे छाल्खिंह आर एकटा दस वर्षक बालक ।हुनका देखतही बंगाली बाबू सोर कैल्खिंह मोशाय ई दिगे आशून ।दू मिनट के भीतर दुनु परिवार दूध चीनी ज़का घुली मिली गेल ।हम अनुमान कयल जे नवागंतुक व्यक्ति बंगाली सज्जनक कोनो आत्मीय सम्बन्धी होइथिन ।परन्तु जखन वार्तालाप होमय लगलानी तखन बुझल जे हिनका दुनु कें पूर्व मे कहियो भेट नहि छैन्ह ।ई जे सज्जन पहिने स बैसल छैथि हुनकर नाम छैन्ह राखाल बनर्जी नदिया जिला घर छैन्ह ।मेरठ मे ठेकादारी करैत छैथ ।दुर्गा पूजा मे देस आयल छलाह ।आब पुनः काज पर जा रहल छैथ

नवागंतुक छति अतुल चटर्जी घर छैन्ह मुर्शिदाबाद ।जमालपुर मे डॉक्टर छैथ ।भतीजी बी ए मे पढैत छाथिन तिनकर विवाह मे आयल छलाह ।आब बनर्जी परिवार आ चटर्जी परिवार मे शिष्टचारक आदान प्रदान होमय लागल ।बनर्जी क कन्या चाह बिस्कुट ल ऽक ऽ चटर्जी क पत्नीक आगा बढ़ा देलखिन्ह ।चटर्जी साहेब नीचा उतरि क पूरी तरकारी लय अनलाह।चटर्जी क पत्नी परसे लागलैथ।

ई दृश्य देखि हमरा अपूर्व आनद भेटल ।मन मे अनेको भाव आ तरंग उठल।एही दुनु परिवार के पहिने कहियो भेट नहि छैक आगा सेहो कुनों फेर संभावना नहि छैक ।तथापि एतबे काल मे आ एतबे कालक लेल दुनु मे कतेक अपनैती भ ऽ गेलैक अछि ।येह कारण छैक जे अहि जातिक सर्वत्र अभ्युदय छैक ।येह बनर्जी महाशय थोड़े काल पहिने पाथरक मूर्ति बनल छलाह तनिका मे अचानक ई सरसता कोना आयल ।ई आनद बाज़ार पत्रिका के माया थीक ।

येह सभ सोचैत मोकामा घाट आबी गेल ।इच्छा त रहय ई दृश्य आउर देखि अपन देस मे ई दृश्य देखनाय मुश्किल अछि ।कदाचित बंगला भाषाक ई प्रताप मैथिलियो मे आबी जयतैक ।

जहाज स गंगा पार क अपन भूमि पर पैर देलहुं ।सिमरिया घाट मे ट्रेन लागल छल ।परन्तु ओहिमे जे दृश्य देखलहुं से एखनो आँखिक सामने नाची रहल अछि ।

हाथ मे गंगाजली नेने एकटा वृधा चढे चाहित छथि ।परन्तु लोक चढ़े नहि दैत छनि।गाडीक भीतर मल्लयुद्ध भ ऽ रहल अछि ।वृधाक हाथ मे एकटा सजी आउर गंगाजली छैन ।पाछां मे पुतोहू एकटा शिशु के नेने ठाढ़ छैथि ।वृधा के अपन पुत्र पर भरोसा छलैन से ओ चुप चाप ठाढ़ रहैथ।परन्तु जखन देखाल्खिंह जे बेटाक हालत त चिचिया उठाल्खिंह हे ओ बाबू हम निहोरा करैत छी हमर सरवन पूत छ मास स दुखिताह छैथ ।हुनका चढे दीयों ।।हे ओ बाबू हमरा सबके चढ़ा लियऽ ।बहुत पुण्य होयत ।

जखन हमरा नहि रहल गेल तखन ओहिठाम ज पहुंचलाहू आ कोठली मे बैसल यात्री के आग्रह काहूँ जे ऽ देखू एत्तिकल स आहंक एकटा देशी भाय निहोरा कय रहल छैथ संग मे वृधा माता आउर प्रसूतिका स्त्री छथिन्ह अहाँ लोकनि के कनेको विचार नहि अछि ।

एक गोटे बजलाह देशी भाय छैथ त कि माथ पर उठा लियों ।

हम कहलों देखू अहाँ लोकनि जन अपन मोटरी नीचा राखी ली त ई तीनो गोटे आराम स बैसी सकैत छैथ ।

एकगोटे कहलैंह मोटरी में खयबाक सामान अछि ।नीचा कोना उतारू?

हम "त ऊपर राखी दिओक

दोसर बजलाह से कोना होयत ओही ठाम बच्चा सुतल अछि ओकरा हम पीचाय दियोक ?

हम "अहाँक बच्चा नहि पिचायत ई लोकनि कोना मे सटी क बैस जेतीह।

आब तरह तरह के बोली भीतर स आबे लागल

एक ऽवकील बनि क पैरवी करैत छैथ

दोसर सभटा कानून अहि ठाम झारे आयल छैथ

हम विनय पूर्वक कह्लाहूँ बेस त अहाँ अपन सीट पर बैसू ई सब पेटी पर बैस जेताह

कोठलिक यात्रिगन एक दोसरक मुहं ताके लगलाह एकटा के मन मे किछु दायक संचार भ ऽ उठ्लैंह कहाल्खिंह कि करबाहक आब दहक।

हम श्रवण कुमार के कहलहुं अहाँ लोकनी अब्बै जाऊ ई लोकनि जतय जगह देथ बैस जाव।

हम आश्वस्त भ ऽ अपन डिब्बा में गेलहुं जीवन मे एकटा पुण्य कार्य आई भेल ई विचारैत खिड़की स बाहर देखि देह सिहरी उठल श्रवण कुमारक परिवार गाड़ी मे चढ़वाक प्रयास कै रहल छलाह तबई गाड़ी सरकाई लागल ।

ताबत एक झुण्ड मोगल हु हु करैत पहुँच गेल आ माँ पुत्र आ पुत्रवधू के ठेली क नीचा करैत गाडी मे चढ़ी गेल ।गाडी चलल लागल आर श्रवण कुमारक परिवार नीचा खसि पडल

हुनकर परिवारक ओ करुण दृश्य हमरा एखन तक नहि बिस्रैत अछि

तहिया स हम नहि जानी जे कतेक बेर अहि प्रश्न पर विचार केने होयब जे चटर्जी क माता आ बनर्जी क पत्नी मे जे मर्यादा छलैन्ह सैह मर्यादा ओही वृधा आ युवती मे छलैन्ह ।परन्तु हुनकर नारित्वाक आदर किएक नहि भेलेंह ।हम जतेक सोचे छी ततेक समस्या जटिल भ जायत अछि ।गाड़ी मे भडिक अपन देशवासी रहैथ परन्तु चारी टा आगा पहुँच गेलेंह त सब सकदम किनको बाजबाक सहस नहि छेलानी ।

बात अछि जे बंगाली अपन लोक के मैथ पर चढ़ बैत छैथ आउर हमरा सब अपन लोक के पैर स ठोकर मारैत छी ।थोड बेक दूरक अंतर छैक तखन बंग आउर मिथिला मे एतेक अंतर किएक ?





मर्यादाक भंग

आई पंडित जी क ऽ आँगन में हुली माल छैन्ह कारण जे एकटा पाहून आबी गेल छाथिन सेहो विशिष्ठ लोक दुलारपुरक चौधरी जी ।हुनक सेवासत्कार मे कोनो त्रुटी नहि होयबाक चाही ।परन्तु समस्या ई जे पंडित जी के कचहरी काज सँ एखन लहेरियासराय जेबाक छैन्ह ।अब कि हो ।पंडिताइन कहाल्खिंह आर ओरियन त हमरा लोकनि सभटा कय देबैंह ।एकटा भाटा अदौडी भ ऽ जेतैंह चार पर सजिमान छाहिये ।भटवर हेतैंह ।तिलकोरक पात तड़ी देबैंह तखन बड़बड़ी पापड़ तिलोरी ।परन्तु भारी बात ई जे भोजनक हेतु बजबय के जय तैंह । पंडित जी किछु सोची क ऽ बजलाह जखन सबटा पीढ़ी पानी ठीक भाय जाय तखन बचनु के कहबैक बजा अन्तैंह ।केहों बचनु !पाहून के बजा अनबहून से हेतो की नहि ?कहियों चालू खायक लेल ।तखन हम तोरा लेल बाज़ार सँ लड्डू नेने एबो ।ई कही पंडित जी दालान पर गेलाह ।चौधरी जी के कहाल्खिंह जे कहैत संकोच होयत अछि परन्तु ई संयोग जे आइये एकटा मामिला क ऽ तारीख छैक से हमरा दस बजे कचहरी पहुँचने जरूरी अछि ।अपने के एते एस्कर छोडि क ऽ जायब त हमरा अनर्गल लागैत अछि परन्तु कयल की जय ।हम शांझ धरी वापस अबी जायब ।

चौधरी कहलखिन्ह नहि नहि अपने अवश्य गेल जाओ ई त हमर अपन घर थीक आर धिया पुता अछिए ।

आब आंगनक हाल सुनु पंडिताइन चारु  दियादनी मिली    भानस भात मे जुटी गेलीह ।ओसारा पर छनमन होमय लागल आउर थोडबे काळ मे बड़ बड़ी ओ तारुअक पथार लागी गेल चारू जनि तेहन अप्स्यात रहैथ जे किनको अपन देहक होश नहि रहें ।सब घमे पसीने तर मुहं धोय्बक अबकाश नहि परन्तु घरक पुतोहू करनपुर वाली कनिया अविचलित भाव स स्नान कऽ अपन केस थकड़ी रहल छलीह ।ई देखि सासु लोकनि आपना मे कनखी मटकी चलबे लगलीह ।आशय ई जे हमरा लोकनी त फाटि रहल छी आउर हिनका लेल धन सन। परन्तु कनिया क स्वाभाव सबके जानल छलैन्ह ते किनको जोर स बाजबाक साह्स नहि भेलेंह ।

बचनु कतो स खेलैत धुपायत पहुचल आउर ओंघयल पाहून के उठाबय लागल

कियो पाहून सुतले रहब ?खैक लेल नहि चलब?चौधरी जी धरफरा क आंखि मिरैत उठलाह ।की भाय गेलैक ?बेस चलु ।चौधरी जीक पैर खडाम खोजे लग्लैंह परन्तु नहि भेटल ।चौधरी जी खाली पैर बच्नुक संग बिदा भय गेलाह ।ओम्हर आँगन मे ककरो खबरी जे बचनु पाहून के बिझो करेने आबी रहल छैथ ।फलस्वरूप तमाशा लगुई गेल ।

ओसारा पर नाबहाथ वाली पलता मारि सज्मानिक चका कटैत छलीह ।एकाएक देखैत छैथ जे बीच आंगन मे पाहून ठाढ़ भेल छथि ई देखतही ओ पडैलिः भारी भरकम शरीर तलमलैत दोड्लीह से बिस्हत वाली स टकडा गेलीह ।दुनु गोटक नाक थौआ भ ऽ गेलैंह बिस्हत वाली ठाडी भऽ क ऽ अदौरी भाटा क झोर लाडैत छलीह ।ओहो करछ फेकी आँचर सम्हारैत कनिया घर मे जाक नुकैलिः पंडिताइन आँगन मे पीढ़ी पर बैसी नाहित छलीहएक्लोटा पैन देह पर देने रहैथ आउर दोसर लोटा ढारैत ताबत ई काण्ड उपस्थित भय गेल ओ जहिना भिजल रहैथ लत्ते पत्ते पचुअड दिश पडैलिः

एके क्षण मे तेहन भगदड़ मचि गेल जेना बाघ आबी गेल हो ।चौधरी जी बीच आँगन मे चुप चाप ठाढ़ ।ओ वापिस दलान पर चली जैतथि परन्तु अहि काल मे एक आउर घटना भय गेल आँगन स आउर स्त्रिगन पड़ा गेलीह लेकिन करनपुर वाली कनिया दही चुड़ा जलपान करैत छेलिः से करिते रहलीह ।पछुआर स सासु इशारा देमय लगाल्खिंह कोनिया घर स दुनु दियादनी चुटकी बजबय लगाल्खिंह ।परन्तु करनपुर वाली किनको दिस कर्न्पात नहि केलैन्ह ।ओ निर्विकार भाव स पाहून के संबोधित करैत बजलीह ।चौधरी जी ओना थक मकायल किये छी आऊ !चौधरी जी स्तंभित रही गेलाह ।मैथिलक आँगन मे अठारह वर्षक नवयोवना पुतहु मे इतबा साह्स भ ऽ सकैत छैक ई कहियो कल्पना मे नहि आयल छलैन्ह ई जीवन मे प्रथम बेर एहन दृश्य छल ।युवती अपन जलखई समाप्त करैत कहलखिन्ह ।अहांके बचनु किछु पहिने बजा अनलक ।बेस कोनो हर्ज नहि अहाँ ताबत बैसू ।हम पांच मिनट मे सबटा ठीक कय दैत छी ।ई कही युवती हुनका एक छोट चौकी पर बैसे कही हाथ मुह धोबय हेतु एक लोटा जल देलखिन्ह आउर आसन लगा कय थारी मे भात साठे लगलीह ।चौधरी जी लाजे कठुयल धड निचा केने बैसल रहलाह एहेन अभूत पूर्व दृश्य देखि स्त्रिगन दात तर जीव काटे लगलीह ।सब सासू तामसे भुत भय गेलीह ।ओ बारंबार पछुआर मे खाखासय लगलीह ।परन्तु पंडिताइन खखासिते रही गेलीह एम्हर करनपुर वाली बेस सुभ्यस्त भय चौधरी जी के भोजन कराबय लगाल्खिंह।पछुअड मे पंडिताइन छाती पिटी बाजे लगलीह" बाप रे  बाप !ई कलियुगी जग    जीती लेलक ।अहि घरक आई नाकि कटी गेल ।कोनिया घर स दोनु दियादनी फुसफुसाय लगलीह "कुलबोरनी नाश कऽदेलक ।हमरा सब भारी थारी भात जांतिक परिस्तों ।ई छूछी पाव भरि चावरक भात आगा मे देल्कैंह अछि ।देखतुन जे तरकारी केना चीखी क देल्कैंह अछि ।देखतुन सबटा तर्कारू एकेटा थारी मे परसि देल्कैंह ।ताबत करनपुर वाली कड़ कड़ा क दालि भात पर द ऽ देलखिन्ह ।

ओम्हर पंडिताइन पुतोहू के गारी देबय लगल्खिंह "जो गे धोंछी केशो झापि लेबे से नहि होयत छौक ।करनपुर वाली पंद्रह  मिनट मे पाहून के कहा पिया क बिदा क देलखिन्ह ।

पाहून के जैत देरी चारू सासु पुतोहू पर छुटली ।परन्तु करनपुर वाली अपन गलती माने लेल तैयार नहि भेल्खिंह आवेश मे सासु पीढ़ी सँ कपार फोड़ी लेलैंह ।दियादनी सभ हरैद चुन लगाबय लगल्खिंह ।

पंडित जी संध्याकाल गाम अयलाह ।ता पाहून जलाशय दिस  गेल रहैथ ।आँगन मे सब सुन्न ।सोर क पूछल खिन्ह की बाट छै?पंडिताइन के पहिने कंठे नहि फूटें आँखिक नोर पोछैत कहलखिन्ह "कर्मक बाट अछि आई घरक मर्यादा नष्ट भय गेल ।पंडिताइन आद्योपांत कही सुनैलेंह ।पंडित जी किछु काल गुम रहलाह फेर बजलाह अहि बताही के नैहर पठाऊ।नहि त समाज मे रहब कठिन भ जायत ।ताबत पाहून दरबाजा पर आबी गेलाह ।पंडित जी सकुचैयत चौधरी जी हरा परोक्ष मे बड़ कष्ट भेल ।चौधरी जी बजलाह कष्ट किएक ?

पंडित जी अप्रतिभ होयत बजलाह "हमरा घर मे एकटा पुतोहू छित से किछु झानकाही छित किछु अनट बिनत भेल हो त ओही पर प्रकाश नहि कयल जाय ।चौधरी जी बजलाह हमरा त अहि घर मे सबस बेसी सम्मत ओ बूझेलाथबुझी पडल जे अपन कन्या होथि ।यैह चाही ।आई हमरो आंखि खुजी गेल ।यदि प्रतेयक घर मे एहने तेजस्विनी बेटी पुतोहू बहराथि त ऽ फेर मिथिला के शिथिल के कही सकैत अछि ।पंडित जी अवाक् रही गेलाह ।।