मॉं मिथिले त कनिते रहती: प्रवीण झा जीक एक गोट अतुकांक कविता । - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

मॉं मिथिले त कनिते रहती: प्रवीण झा जीक एक गोट अतुकांक कविता ।

मॉं मिथिले त कनिते रहती, जाबए नै करब सब मिली हुंकार
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत, सब मिली के होउ तैयार ।
घर-घर जरै छै धू-धू के आगि, तैयो सब जाइ छै मिथिला के त्‍यागी,
माई के ममता के पैर सॅ कुचलि क, छोडि जाउ नै अहॉ अपन घर-द्वारि ।
बाढि रूपी दानव अबैछ हर साल,
विनाशलीला सॅ करैत पूरा मि‍थिला के बेहाल ।
मॉ मिथिला क उठै छथि चित्‍कार,
जनमानस में मचि जाइत अछि हाहाकार,
सामग्री राहतक गटकि क नेता सभ होइछ मालामाल ।
एहि दानव सभक त्रास सॅ मॉ मिथिले भ गेली कंगाल ।
के साजिश क दबौलक मिथिलाक अधिकार ?
की मातृद्रोही नहि अछि अपन मिथिलेक कर्णधार ?
जमाना बदलि क भ गेल छैक नवीन,
किया मिथिला अछि एखनो साधन विहीन ?
मिथिलाक नेता सॅ हमरा जवाब चाही,
तथाकथित विकासक हमरा हिसाब चाही ।
पॉंच साल पर छलै अपन दरश देखौने,
फुसियाहा छलै केहन भाषण सुनौने ।
“अलग मिथिला राज्‍य बनायब,
घर-घर में खुशहाली लायब.....
-से कहि क ओ ठकबा भ गेल फरार ।
ल-ल के वोटे समेटै टा नोटे,
मॉ मैथिली के पहुंचाबै टा चोटे
मिथिला के संतान बेईमान बडका,
करू एकरा सब के अहॉ बहिष्‍कार ।
की थिक इ उचित जे परदेश जा क मात्र मिथिला के कोसी ?
की नै इ उचित जे संगठित भ हम सब आब मिथिला लेल सोची ?
धन्‍य छथि ओ मैथिल नहि जिनका अपन संस्‍कृति पर नाज,
अपन समृद्ध भाषा बाजए में जिनका होई छनि एखनहु बड लाज ।
बंगाली हुए वा मराठी, मद्रासी हुए वा गुजराती,
स्‍वयं निज भाषा पर कियो नै करै छै प्रहार ।
एहन सुकर्म क क अपन दामन के बनाउ नै अहॉ दागदार ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक पतन हेतु स्‍वयं नै बनु अहॉ जिम्‍मेवार ।
मातृभूमिक लेल जे काज नै आबए, ओ जिनगी के थिक शत-शत धिक्‍कार ।
मॉ मिथिला पुकारि रहल छथि, अश्रुपूरित नेत्र सॅ निहारि रहल छथि ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक करू अभिमान, तखनहि भेटत विदेशो में मान ।
कटि क अपन माटी सॅ, के पओलक अछि एखन तक सम्‍मान ?
किया बनब आन भाषा के दास,
कान में अमृत घोरैछ अपन मैथिलीक मिठास ।
चलू निज धाम, करू प्रस्‍थान,
आब नै हेतै मिथिलाक अपमान ।
कर्ज बहुत छैन मातृभूमि के सब पर, निज माटी के करू सब मिली नमस्‍कार ।
लिय प्रतिज्ञा हाथ उठा क, मॉ मिथिला के करब हम सब उद्धार ।
अपन श्‍वास सॅ अहॉ गिरि के खसाउ, पैरक धमक सॅ जग के हिलाऊ ।
करू भैरव नाद आ नभ के गुंजाऊ,
मिथिलाक खंडित गौरव के सब मिली क वापस लाऊ ।
सहलौ बहुत, आब नै सहब हम सब तिरस्‍कार,
याचना ओ प्रार्थना सॅ नै भेटल एखन तक, आब धरू अहॉ तरूआरि
सौम्‍य रूप मैथिलक देखलक एखन तक रौद्र रूप आब देखत संसार
उग्र पथ पर आब बढि क अहॉ आब, छीनू अपन अतिक्रमित अधिकार ।
मॉ मिथिले त कनिते रहती जाएब नै करब सब मिली हुंकार,
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत सब मिली क होऊ तैयार ।।