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मुम्बई। 01 फरवरी। मिथिलारत्न, मिथिलाक गौरव व मैथिल समाजक कमल धीरज चंद्र झा विपुल मैथिल समाजके कानैत-खिझैत हमेशाक लेल परलोक निवासी भ' गेलाह। सत्य कहल गेल अछि विधाताक विधानमे बाधा देनिहार कियो नञि। परन्तु विधाता द्वारा देल गेल असामयिक संताप, हुनका द्वारा रचित रचना व अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह उठबैत अछि । 

सर्वशक्तिमान विधाता कायर बनि मिथिलाक सपूतकें हठात्ह मरालोकनिक बीचसँ उठा लेलन्हि, ई कायरता वस्तुतः हुनक निष्ठुरताक क्रुर परिचायक अछि ।


समस्त मैथिल सुधिवृन्दसँ अश्रुपूर्ण तथा विनम्रतापूर्वक अनुरोध करब जे दिवंगत धीरजजीक सम्मान एवं श्रद्धांजली हेतु तीन दिन धरि कोनो प्रकारक धार्मिक अनुष्ठानसँ परहेज करैत मात्र प्रतीकात्मक वा संकेतात्मक शुभ कर्मादि करबाक प्रयास करी ।

पंचतत्वसँ निर्मित पंचभौतिक शरीर अपन-अपन अंश ल' निश्चिंत भ' गेल। देखैत-देखैत अग्निदेव, चिर-निद्रामे निमग्न मिथिलाक सपूतकें अपना कोरामे हमेशाक लेल विश्राम हेतु आलिंगन कयलनि। किछु दिन पूर्व धरि, जे प्रत्यक्ष छलाह ओ इतिहासमे परिवर्तित भ' गेलाह। स्मृतिक अनेकों गौरवपूर्ण अध्याय अपना पाछां छोड़ि, एहि असार संसारके त्यागि प्रस्थान कS गेलाह । राजेन्द्र भवन अपन एहि लाल केर अंतिम यात्राक दरम्यान जयघोष सुनि सिसकि रहल छल । पुनः प्रत्यक्ष दर्शनसँ सदाके लेल वंचित, व्यथित राजेन्द्र भवनक बाह्य व आंतरिक आवरण व्याकुल छल । स्नेही सुधिवृन्द, परिजन, मित्र-मंडली एवं एहि व्यथाकें प्रत्यक्ष नजरिसँ देखैत मात्र अश्रुपात क' रहल छलाह । एक कविक रचना मोन पड़ैत अछि :

"कौन है किसका इस दुनिया में, कैसी प्रभु की माया, आज समझ में आया।"


हे मिथिला पुत्र ! अहींक चेतनामयी प्रेरणासँ, हमरालोकनि शक्ति ग्रहण करैत समाजक सेवाक संकल्पक प्रतिज्ञा क' रहल छी। अहाँ द्वारा प्रारम्भ कयल गेल सामाजिक कार्य चलैत रहत। अहाँक रिक्तताक कमीके पूर्ति भेनाई असंभव अछि। समस्त मैथिल परिवार शोक-संतप्त अछि। एहि संक्रमणक घड़ीमे, मुंबई स्थित मैथिलसेवी संगठन एवं मैथिल समाजसेवी अपनेक अमर आत्मा केर प्रति श्रद्धावत् आ भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित क' रहल अछि ।

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