सहरसा के विषय मे लोक खूब सुनैत अछि, मुदा वास्तविक अनुभूति ओतहि जा क होयत अछि - मिथिला दैनिक

Breaking

शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

सहरसा के विषय मे लोक खूब सुनैत अछि, मुदा वास्तविक अनुभूति ओतहि जा क होयत अछि

सहरसा के विषय मे लोक खूब सुनैत अछि, मुदा वास्तविक अनुभूति ओतहि जा क होयत अछि। कहियो सहरसा क' भूमि अन्नक भंडार छल। सही अर्थ मे ओ सोना उगलैत छल, आई सर्वत्र गरीबी पसरल अछि। यैह कारण जे सहरसा सँ लाखोक संख्या मे लोक रोजी रोटी खोज मे दिल्ली, मुंबई, पंजाब आ दोसर शहर जा रहल अछि।

पहिने लोक कलकत्ता जायत छल, मुदा आई अहि दौर मे हरियाणा, पंजाब, दिल्ली मे सहरसाक लोक संघर्ष क़' रहल अछि। मजदूरक टोली भोर होयते जखन काम काज पर जयबाक उपक्रम करैत छथि तं हुनक गप सुनी हमरा अपार आनंदक अनुभव होयत अछि। सहरसा सँ दूर होयतो ई वर्ग अपन गाम नहि छोड़ लक सहरसाक सबसँ पैघ समस्या अछि प्रलयंकारी बाढी, हर साल ई मीडिया के लेल रिकॉर्ड तोड़े वाला होइत अछि। लेकिन ई समस्या सँ निजात आई तक नहि भेट सकल।

हम देखलहु जे समस्त सहरसा मे कोनो ऐहेन अस्पताल नहि अछि जतय' गरीब मरीज इलाज़ करबा सकैथ। लाचार मरीज के दिल्ली जाईये पडैत छैथ। दिल्ली मे एम्स के इलाज आ रहनाय सहनाय के दिक्कत के अंदाज लगा सकैत छी की एहने अस्पताल सहरसा मे नहि भ' सकैत अछि।

राजनेता सभ मात्र अपन जेबी टा भडलैंह आ जातिक नामपर लोक के लड्बैत रहलाह सहरसा मे समस्या अनंत अछि लेकिन कोनो एहन समस्या नहि अछि जकर निदान नहि अछि। आबश्यकता अछि लोक सबके जागरूक हेबाक अबश्यकता अछि नौजवान के आगा अयबाक अन्यथा सहरसा के दर्द के केयो नहि बुझी सकत आर समाज केर प्रत्येक व्यक्ति केर कर्तव्य होइत छैक।

मनुष्य एक टा सामाजिक प्राणी होइत छैक। ओ ‘प्राणी’ जे अहि संसार केर सर्वाधिक विकसित जीव अछि आ अहि समाजक बिना ओकर रहब कठिननहि नै असंभव छैक। माय-बाप, भाई-बहन, कुटुंब आदि लोक के मिला के अहि समाजक रचना होईत छैक। समाज के बिना मनुष्यक पूर्ण रूप सं विकास भेनाई सम्भवे नै छै। जीवन केर प्रत्येक क्षण में हमरा अहाँ के समाजक आवश्यकता होइत अछि आ होइत रहत।

अक्सर ई प्रश्न उठबैत बहुत रास व्यक्ति के सुनल जा सकैत अछि जे समाज हमरा लेल की केलक जे हम समाज के लेल करब। मुदा कखनों सोचलीयई अछि जे बिना समाज के आगु बढ़ब असंभव छै। कखनों ई सोचलौंह की समाज के मतलब की छै। समाज पड़ोसी सेहो होइत अछि, हम जिनका संगे अधिकतर समय व्यतीत करैत छि जिनका बीच उठईत बैसैत छि तकरे समाज कहल जैत छै। जाहि प्रकारें प्रत्येक व्यक्ति निस्वार्थ भाव सं अपन परिवारक तन, मन, धन सं समर्पित भ' पूर्ण दायित्वक संग अप्पन परिवारक सेवा करैत अछि। ठीक तहिना सभ गोटे के अपन समाजक प्रति सेहो जिम्मेदारी बनैत अछि की ओ अपन परिवारक समान अपन समाजक लेल सोच विचार करथि आ समाजक प्रति अपन कर्त्वयक निर्वाह करथि आ समाजक सेवा के एक टा जिम्मेदारीक संग निभाबथि।

मनुष्य हेबाक नाते हम अहाँ जा धरि एक- दोसरक दुःख-दर्द में संग नहीं निभायब ताबत तक अहि जीनगीक सार्थकता सिद्ध नही होयत। यदि अप्पन आवश्यकता पर कियो काज नहि आबय त' केहेन लागत? ताहिना त दोसरो के लगतई....... त आऊ आगु आ सभ द्वेष भाव सँ सहरसा शहरक उत्थान मे भागीदारी बनीं, समाज के आगु बढाबी।

__भारत भूषण राय