"बांसुरी" किछु दिन पूर्व अध्ययनक क्रम मे 'बांसुरी' केर मधुर स्वर सँ सम्बन्धित रस एवं उपियोगिताक विषय मे प्राप्त जानकारी अपने लोकनिक मध्य रखबाक कोशीश कS रहल छी । आशा अछि नीक लागत - मिथिला दैनिक

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शनिवार, 15 अक्तूबर 2016

"बांसुरी" किछु दिन पूर्व अध्ययनक क्रम मे 'बांसुरी' केर मधुर स्वर सँ सम्बन्धित रस एवं उपियोगिताक विषय मे प्राप्त जानकारी अपने लोकनिक मध्य रखबाक कोशीश कS रहल छी । आशा अछि नीक लागत


 "बांसुरी"
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किछु दिन पूर्व अध्ययनक क्रम मे 'बांसुरी' केर मधुर स्वर सँ सम्बन्धित रस एवं उपियोगिताक विषय मे प्राप्त जानकारी अपने लोकनिक मध्य रखबाक कोशीश कS रहल छी । आशा अछि नीक लागत ।

एक जिज्ञासु व्यक्ति बांसुरी सँ प्रश्न करैत जिज्ञासा करैत छथि - हे बांसुरी ! अहाँ कोन प्रकारक तपस्या कयलौं, जाहि कारण सँ भगवान श्यामसुन्दर अहां कें अपना होंठ सँ सदैव लगेने रहैत छथि, हुनक मधुर अधरामृतक रसपान करैत रहैत छी । गोविन्द प्रभु जखन अपना होंठ एवं आंगुर सँ अहांक शरीरक निश्चित भाग पर स्पर्श कय मधुर संगीतक राग सँ समस्त चेतना कें आनंदित करबाक भाव जागृत करैत छथि, ओहि समय अहांक उपयोगिता वंदनीय एवं सराहनीय होइत अछि ।

वंशी शब्द कें जँ उल्टा कयल जाय, शब्द बनैत अछि "शिव" । एहि सँ संदेश प्राप्त होइत अछि जे वस्तुतः बांसुरी शिव स्वरुप अछि । संदेश प्राप्त करबाक कोशीश कयल जेबाक चाही जे भगवान शिव सदृश, शांत एवं मधुर वचन सँ अन्य कें शीतलता प्रदान करी ।

बांसुरी भगवान श्रीकृष्ण कें अति प्रिय अछि, एहि हेतु बांसुरी कें मुख्यतः तीन प्रकारक गुणक संक्षिप्त जानकारी निम्न अछि :-
- "बांसुरी मे गांठ नहि" - बांसुरीक माध्यम सँ संदेश ग्रहण करी जे जीवन मे कोनो प्रकारक गांठ अथवा मनोमालिन्यता कें महत्त्वहीन बनावीं । चाहे अन्य द्वारा कोनो प्रकारक अमर्यादित व्यवहार कियक न हो परन्तु प्रतिरोधात्मक भावना सँ विरक्त रहि । सहनशीलता मर्यादित जीवनक श्रेष्ठ पूंजी थिक संगहि ध्यान राखब आवश्यक अछि जे सहनशीलता कमजोरी कदमपि नहि भS सकैत अछि ।

"बांसुरी बिना बजेला सँ नहि बजैत अछि" - अर्थात् संदेश प्राप्त करी जावत् धरि किछु कहल वा पूछल नहि जाय, तावत् धरि बिना कहला वा पूछला सँ अपन मत व्यक्त करबा सँ परहेज करी ।अनर्गल बात बाजव सँ उचित अछि मौन रहि । कम बजबाक कोशीश करी परन्तु तर्कयुक्त बजला सँ समस्याक समाधान हो, एहि विषय कें ध्यान राखब आवश्यक ।

"बांसुरी जखन बजैत अछि, मधुर बजैत अछि" - अति सुन्दर बात अछि जे जखन बाजि वा बजबाक अवसर प्राप्त हो, मधुर बजबाक कोशीश करी । शब्द संचयन सुन्दर एवं मर्यादित हो जाहि सँ अन्य व्यक्ति मधुर शब्द सँ आनंदित भS परस्पर प्रेमभावक अविरल चेतना सँ ओतप्रोत भS आनंदित जीवन भव्य बनि सकय । सुन्दर शब्द केर प्रयोग सँ स्वयं कें  प्रसादिक बनावी एवं अन्य व्यक्तिक चित्त कें सेहो शीतलता प्रदान करबाक कोशीश करी ।

"ऐसी वाणी बोलिए मन की आपा खोय ।
औरन को शीतल करे आपहूं शीतल होय ।।"

 जय श्री हरि । राजकुमार झा ।
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