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"हृदयक पुस्तक"
 शिक्षक दिवसक उपलक्ष्य मे
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एक एहन पुस्तकक विषय मे चर्चा करबाक इच्छा भऽ रहल अछि जाहि पुस्तक कें पढ़बा एवं लिखबाक हेतु कागज एवं कलमक आवश्यकता नञि अछि । ई पुस्तक हृदयक असाधारण पुस्तक थिक । एहि पुस्तकक अध्ययन सभ क्यो कऽ सकैत छथि हेतुए जे एहि पुस्तकक प्रत्येक अक्षर व्यक्तिक भावना सँ जुड़ल अछि । एहि पुस्तक कें मुद्रण करबाक कोनो प्रयोजन एवं अनिवार्यता नञि अछि । एहि पुस्तक मे कोनो प्रकारक अशुद्धि वा गलतीक गुंजाइशक कल्पनो नञि कयल जा सकैत छैक । जाहि पुस्तकक चर्चा कऽ रहल छी ओ पुस्तक कागजक पुस्तक नञि बल्कि एहि पुस्तकक रचनाकार स्वयं सृष्टिक रचयिता नारायण छथि । एहि मे वर्णित प्रत्येक शब्द भाषा सँ प्रतिबद्ध नञि अछि बल्कि पुस्तकक अध्ययन वा पाठन सभ क्यो सहज रुप सँ कऽ सकैत छथि ।

एहि पुस्तक मे लिखल अछि - स्वयं केर भीतर, जीवन कें महसुस करबाक कोशीश करी । स्वयं केर भीतर व्याप्त आनंदक अनुभूति करी । हम स्वयं ईश्वरक श्रेष्ठ अंश छी, एहि धारणा कें दृढ़ बनावी । हमरा चित्त मे सम्पूर्ण साम्राज्य स्थापित अछि, अनुभव करी । हम स्वयं दिव्य चरित्र धारण करअ वाला जीवनक श्रेष्ठ स्वरुप छी एवं हमर जीवन सभ प्रकार सँ दिव्य एवं भव्य अछि, एहि चिंतन कें सतत् मर्यादित करी । एहि सर्वश्रेष्ठ पुस्तकक अध्ययन सँ श्रेष्ठता प्रमुदित होइत अछि । अहंकारक क्षरण होइत अछि । प्रश्न अछि - एहि पुस्तकक अध्ययन सँ कोन प्रकारक स्थितिक प्राप्ति संभव अछि ? उत्तर अछि  हृदय मे उत्पन्न आध्यात्मिक अनुराग रुपी प्यासक तृप्ति । हमरालोकनिक किछु एहन  प्रकारक समस्या, जाहि समस्याक समाधान शासन-प्रशासन एवं सरकार द्वारा संभव नञि भऽ सकैत अछि जकर सरोकार प्रत्यक्ष रुप सँ मनुष्यक आन्तरिक अशांति सँ जुड़ल अछि, ताहि समस्याक समाधान एवं निदान हृदयरुपी पुस्तकक अध्ययन आ मनन द्वारा संभव भऽ सकैत अछि । अध्ययन एवं मनन द्वारा मानसिक शांतिक प्राप्ति संभव होइत छैक । एहिलौकिक पुस्तक मे लिखल जाइत अछि  - व्यक्तिक संग फलां-फलां वस्तुक अभाव छन्हि । परन्तु हृदयक पुस्तक मे लिखल अछि - व्यक्तिक जीवन मे श्रेष्ठ वस्तु प्रचुर मात्रा मे संचित अछि, जकरा उपयोग सँ जीवनक प्रत्येक चेष्टा कें मर्यादित एवं व्यवहारिक स्तर पर निष्पादन कयल जा सकैत अछि ।

जाहि समय हमरालोकनि हृदयक भाषा कें बुझवाक सामर्थ्यक संचयन कऽ लेब ताहि दिन सँ अनुभव होमय लागत जे जीवन वस्तुतः कतेक अनमोल अछि । तैं हृदयक पुस्तक कें गुरू एवं मार्गदर्शक बनेवाक कोशीश कयल जेबाक चाही । हमरालोकैन हृदयक प्रेम कें श्रेष्ठ चिंतन मे परिवर्त्तित करी । हृदय मे प्रेमक चिंतनक याचना हेबाक चाही जे प्रत्येक व्यक्ति परमात्माक प्रेम मे अत्यधिक आह्लादित भऽ जीवनरूपी यात्रा कें,  सर्वोच्च बनेवाक हेतु सुन्दर संस्कार सँ सुसज्जित जीवनक आनंद कें करुणाक आश्रय सँ पवित्र बनाबी । जाहि दिन एहि प्रकारक पुनीत भावनाक आविर्भाव हयत, निश्चित रुप सँ हृदय रुपी पुस्तकक अध्ययनक महत्त्व एवं अनिवार्यता कें स्वीकार करबा मे रंचमात्रहूं किन्तु- परन्तु आदिक संदेह नञि रहत । इत्यलम् । जय श्री हरि । राजकुमार झा ।
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