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आदिकाल में बहुत प्रतापी आ महादानी असुर छलाह राजा बलि संपूर्ण संसार के अपना अधिन करै हेतु बहुतो संग्राम करैत पराजित करैत तीनू लोक पर अपन आधिपत्य कय लेलाह त देवतागण भगवान विष्णु लग जाई बलि से रक्षाक याचना केलथि। भगवान विष्णु ब्राह्मण बनि दंड कमंडल लय बामनक रुप धय राजा बलिक दरबार में दानक याचना हेतु पहुँचलाह।

राजा बलि सौं जे कियो किछु याचना करैथ खाली हाथ नै घुरथि ताहि हेतु ओ एतेक पराक्रमी आ बलशाली छलाह  तहूमें ब्राह्मण के बच्चा के याचक रूप में देखि बलि द्रवित भय भगवान बामन सौं मांगक लेल कहलाह त ओ तीन डेग भूमिक याचना केलाह। असुर गुरू शुक्राचार्य अनहोनीक आशंका सौं शिष्य बलि के रोकला किन्तु दानी राजा बलि नहिं मानल आ भगवान बामन के तीन डेग भुमि तहू में ई बच्चा कते नापत सोचि तैयार भेलाह।भगवान मंत्र पढक लेल जल लेबय लगला त कमंडलक टोटी में दैत्य गुरू शुक्राचार्य पैसि गेला जाहि सौं जल बाहर नहिं आबै आ बामन मंत्र नहिं पढि सके किन्तु त्रिकालदर्शी भगवान बुझि गेला आ भूमि सौं तिनका तोरी कमंडल टोटीक खोंचारला जाहि सौं दैत्य गुरूक एक आँखि फुटि गेलनि आ धम्म सौ भूमि पर खसला भगवान जल लय शिक्त केला कि विशाल भय गेला। एक डेग में संपूर्ण पृथ्वी दोसर डेग में तीनू लोक नपलाह त ब्रह्मलोक में भगवान विष्णु के पेर देखि ब्रह्मा कमंडल में जल लय हुनक पैर प्रक्षालन केलाह वेह जल गंगा भेली।

तेसर डेग में राजा बलि के नापि हुनका बंधन सौं बान्हि पाताल लोक पठा देलाह किन्तु राजा बलि ईन्द्रदेवक बज्र सौं खतरा देखि भगवान बामन के रक्षाक याचना केला त भगवान रक्षासूत्र लय बलिक हाथ में ई मंत्र पढैत बान्हला-

"येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल :
तेनत्वाम् प्रतिबधनाम् रक्षेमाचल माचल"

अर्थ- हे राजा बलि आहाँ एहन दानी के जौं ईन्द्र बद्ध करताह त हम हुनक बद्ध करब हम आहाँक रक्षा करै के वचन दै छी

एखनो भगवान विष्णु राजा बलिक दरबान बनि हुनक रक्षा कय रहल छथि।वर्षाकाल में मेघक गर्जना सुनै छी ओ ईन्द्रदेवक राजा बलि के मारै हेतु बज्रपात छी।

आईए एहन मुहूर्त में भगवान बामन राजा बलि के रक्षासूत्र बन्हने छलाह तैं ओहीदिन सौं सालमें एहन मुहूर्त जहिया होई छैक मैथिल लोकनि गोसाऊन के राखी चढवैत छथि आ जे भी कोनो उपयोगिताक वस्तु रहै छैक राखी चढवैत छथि। विद्वजन ज्ञानी पंडित पुरोहित बुजूर्ग सौं मनुगण रक्षासूत्र बन्हा आशीर्वाद लैत छथि।कते ठाम पंडित पुरोहित स्वयं जजमानक ओहिठाम जाई हुनका सपरिवार के राखी बन्ही आशीर्वाद दय छथि आ बहुते उपहार लय घुरइ छथि।

पुनः कृष्णावतार में जखन भगवान श्रीकृष्ण शिशुपाल के मारै लेल सुदर्शन चक्र चलेला त हुनक अंगूरी कटि सोनित बहय लगलनि,पतिव्रता नारी द्रुपद पुत्री द्रोपदी अपन आँचर फाड़ि अंगूरी के सोनित रोकैलेल बन्हली।भगवान श्रीकृष्ण द्रोपदीक ऋणि भ गेली आ द्रोपदी जिनका ओ बहिन मानै छली वचनबद्ध भेलाह जे दुर्गम समय एला पर हम आहाँक रक्षा करव आ ओहि ऋण के जखन दुस्सासन द्रोपदीक चीरहरण करय लागल त श्रीकृष्ण हुनक बान्हल ओही छोटसन आँचरक बदला साड़ीक अंबार लगा देलनि जे दुस्सासन थाकि बेहोश भेल किन्तु द्रोपदीक चीरहरण नहिं भेल।
             
ओहिदिन सौं सब सहोदर आ मुँहबोली बहिन अहि आशय से भाई के राखी बान्हय लगली जे ओहेन कोनो विकट परिस्थिति में भाई हमर रक्षा करताह बड पैघ आ पवित्र बंधन छी रक्षाबंधन।भाई बहिनक पवित्र रिश्ता सन आर कोनो स्त्री पुरुषक रिस्ता नहिं छैक तें अहि पर्वक अपना मिथिला में बहुत श्रद्धा सौं मनायल जाईत अछि दूरस्थ गाम सबसौं भाई सब अपन अपन बहिन ओतय उपहार लय राखी बन्हबै लेल अबैय छथि आ सप्रेम राखी पावैन मनबैत छथि।

मिथिलाक अलौकिक पाबनि अछि ई रक्षाबंधन।

[व्हाट्सएप सँ साभार]

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