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मैथिलीमे आत्मकथाक नामपर जे वस्तु अबैए ताहिसँ अरुचि भेनाइ आवश्यक, कारण प्रत्येक आत्मकथा एहन लागत जेना लेखक सत्य हरिश्चंद्रक जेठ बालक होथि। ओइ आत्मकथा सभहँक पाँति-पाँतिमे षडयंत्रक गंध भेटत। पढ़ैत-पढ़ैत एना लागत जेना लेखक बहुत रास तथ्य छोड़ि देने छथि। एकर कारण जे आत्मकथा लेखक अपन उज्जरका पक्ष मात्र देखबै छथि आ अपना द्वारा कएल गेल कारी अध्यायकेँ छोड़ि दै छथि। तँए पाठक औना क' रहि जाइ छथि आ हुनका वाग्जालक अतिरिक्त किछु नै भेटैत छनि।

मैथिली आत्मकथामे "कतेक डारिपर " महत्वपूर्ण अछि मुदा हमरा जनैत मात्र प्रतिक्रियासँ जन्मल अछि। १९९१सँ ल' क' २००० धरि एकटा ब्राम्हण अधिकारीकेँ लालू राजमे की-की भोगए पड़लै तकर एकभगाह विवरण अछि ऐमे। एकभगाह ऐ दुआरे जे लालू राजमे की-की फायदा  भेलै तकर ऐ पोथीमे कोनो विवरण नै अछि। ओना जँ हमर वयक्तिगत विचार पूछल जाए तँ ई आत्मकथा कम आ संस्मरण बेसी लागैए। ऐकेँ अतिरिक्त आर आत्मकथा सभ उपलब्ध अछि मुदा वएह रोगसँ ग्रसित। ऐ ठाम ईहो गप्प मोन राखब जरूरी जे मैथिलीमे दलित आत्म कथाक घोर अभाव। घोर अभाव की मने छलैहे नै।

जँ कोनो लेखक अपन आत्मकथाक शुरूआत एना करथि "जीवन एगो संघर्ष होइत अछि, संघर्षमय होइत अछि। ऐ संघर्षमे कियो-कियो आगू निकलि जाइत अछि तँ कियो अप्पन जीवनमे बहुत पाछू छूटि जाइत अछि" तँ पाठककेँ बूझि लेबाक चाही जे ई लेखक कोनो आन ग्रहसँ आएल छथि आ मैथिलीमे चलि अबैत उज्जरका पक्ष बला प्रसंशात्मक आत्मकथाक जमाना खत्म होमए बला छै। ताहूमे जँ लेखक आगू बढ़ि कहथि जे " हम फेर बंगलोर चलि एलौं। ऐठाम काज भेटल खानाक केटरिंगमे, कुक सबहक कपड़ा धोइ कऽ काज भेटल" तँ पाठककेँ स्वतः ई बुझना जाइ छनि जे ई आत्मकथा वास्तवमे आत्मकथा छै।

संदीप साफी मैथिली युवा लेखक छथि आ विभिन्न आयामक संग मैथिलीमे एलाह अछि। बर्ख २०१४मे हिनक पोथी " बैशाखमे  दलानपर" प्रकाशित भेल अछि। ई पोथी कुल पाँच खंडमे बाँटल अछि "आत्मकथा खण्ड,कविता खण्ड,विहनि कथा खण्ड,लघुकथा खण्ड आ विचार बिन्दु खण्ड"। हिनक आत्मकथाक कोनो अलग शीर्षक नै अछि जे की मैथिली लेल एकटा नव वस्तु अछि। ऐ आत्मकथामे बहुत रास नव विचार अछि मुदा हमरा बुझैत ई दलित आत्मकथा होइतो कोनो गरीब ब्राम्हणक आत्मकथा सेहो अछि। उदाहरण लेल " किछु दिन बाद गामपर सँ हमर विवाहक बातचीतक समाचार आएल जे तूँ गाम आबऽ। फरबरी-मार्चमे हम गाम गेलौं। बाबूजीकेँ कहलियनि जे विवाहमे जे दहेज देतऽ ओइ दहेजसँ अओर एक सालमे किछु रुपैया अओर लगा कऽ बहिनक कन्यादान सेहो कऽ लेब। किछु भाड़ा-बर्तन अओर ओइमे लगा देबै। ई सभ मजबूरी देख हमर विवाह २००२ मे भेल.."। आब ई देखू वर्णित विचार मात्र लेखक नै भ' क' पूरा पूरा समाजिक बनि गेल अछि। अधिकांश मैथिल ब्राम्हण वर्ग एनाहिते करैत छथि। बेटाक दहेजसँ बेटीक बियाह करै छथि। ऐ विचार सभहँक अतिरिक्त ऐ आत्मकथामे बहुत रास एहन छोट छोट विचार छै जकर परिधि पूरा समाजिक छै आ ऐ छोट आलेखमे ओकरा फड़िछाएब संभव नै।

ऐ पोथीक पाँचों खंडक वैचारिक परिधि एक दोसरासँ जूड़ल अछि। कने कविता खंडक ऐ कविता अंश दिस देखू--
"भाइ रौ सपनो कतौ सच भेलैए
महीसक पीठपर कहूँ मंच  होइए"

ऐ पाँतिमे आएल बिंबकेँ देखू। कोनो परंपरासँ आयातित बिंब नै अछि ई । एहन बिंब ओहने लेखक बना सकैए जकरामे कहबी बनेबाक क्षमता होइ। से क्षमताक ई नव लेखक देखा रहल छथि।
ओना मैथिलीमे आन भाषा जकाँ स्त्री विमर्श सेहो पसरि गेल अछि। आ तथाकथित किछु पुरुष वर्ग सेहो अपनाकेँ फैशनक तहत स्त्री विमर्शकार मानै छथि। संदीप जी सेहो स्त्रीक उपर कविता लिखला मुदा पूरा अलग मिजाजसँ। कने देखल जाए--

"मारैके मन घरवालीकेँ तऽ
कहैए सागमे किए ने हरदी देलही"

मने बिल्कुल टटका आ अनगढ़ बिंबक प्रयोग कर'मे माहिर छथि ई लेखक। 
---कोनाकेँ बुझाएब पियास
विलुप्त भऽ रहल अछि इनार-------

ऐ पाँतिकेँ पढ़िते हठात् आजुक परिवेश मोन पड़ैए। एखन तँ मात्र २० टके लीटर पाँति अछि ५० साल बाद की हएत ? ऐ कवितामे इनार मात्र प्रतीक अछि।

--बहुत दिनसँ आइ-काइ करै छी
जे एकटा महीस लेब
बेटा-पुतौह बाहरे रहैए
गामपर असगर बैसल नीक नै लागैए.....

जँ ऐ कविताकेँ पढ़बै तँ स्पष्ट रूपें पता लागत जे एकर नायक आ नायिका गैर ब्राम्हण आ गैर कायस्थ वर्गक छथि। आइसँ १५-२० साल पहिने मात्र ब्राम्हण आ कायस्थ वर्गमे पलायन होइत छलै। मुदा आजुक स्थिति भिन्न अछि आ तकरे उपज अछि ई कविता। एकटा नवका मनोभूमि के कविता थिक " मन  लगले रहि गेल " से ऐ दुआरे जे कवि बिजनेस करबाक इच्छा रखने छथि। मैथिल ( खास क' ब्राम्हण आ कायस्थ) नौकरी क' लेत मुदा बिजनेस नै करत। गैर ब्राम्हण-कायस्थ तँ गाम-घरमे साइकिलकेँ चिप्पी साट' केर दोकान खोलि क' ओतबे कमा लै छथि जतेक की बाहरमे नौकरीसँ भेटै छै। तँए ई कविता हमरा हिसाबें टटका विचारक जन्म अछि मैथिलीमे। देखल जा दू पाँति--

बिजनेसमे अप्पन नाम करितौं
मिथिलाक आगू नाम करितौं

पोथीमे विहिनि कथा ओ लघु कथा खंड सेहो अछि मुदा हमर अपन विचार जे लेखक केर आत्मकथा ओ कविताक सामने हमरा ई दूनू खंड झुझुआन लागल। हमर विचार जे संदीफ साफी जी जँ कवितापर गँहिकी नजरि राखि रचना करथि तँ मैथिलीकेँ भविष्यमे नीक कवि भेटतै। ऐ ठाम ई मतलब नै जे ओ विहिनि कथा ओ लघु कथा खराप लीखै छथि। मुदा एकट समीक्षकक तौरपर हमरा लगैए जे साफीजीक कवितामे किछु बात जरूर छै। आलोचक केर काजे छै जे इशारा करै जे लेखक कत' सुधार क' क' नीक लीखि सकै छथि वा कोन विधामे महारत हासिल क' सकै छथि।

(उदाहरण लेल कोनो आरोही वा अवरोही क्रम निश्चित नै अछि)

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