साहित्यक लठैत - भास्करानन्द झा भास्कर - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 16 नवंबर 2011

साहित्यक लठैत - भास्करानन्द झा भास्कर

एखनो धरि
किछु लोक छथि ओझरायल
भाषाक भांति भांति घास फ़ूसि में !
साहित्यक लताक नैसर्गिक सौन्दर्य
स भय अनचिन्हार!!! अज्ञात !
एकटा गाछक ओट में ठार!!
ताकैत टुकुर टुकुर एना
जेना दूरक दृष्टिक हरायल !

माथ पर फ़ूसिये पहिरने
कोपमंडुकताक ललका पाग !
सामासिक ज्ञानक संस्कार सं
कटल! फ़ेकल फ़ाकल !
पुरान धुरान बुढियाक नुआ जका !

बस, आब बहुत भेल!
फ़ेकू परम्पराक धोती
पहिरु सब भाषाक पैण्ट
आ बनाबि एक ऎहन परिवेष
जतय उभरि कय आबि सकय
मिथिलाक विशाल महता !

भास्करानन्द झा भास्कर