0
एखनो धरि
किछु लोक छथि ओझरायल
भाषाक भांति भांति घास फ़ूसि में !
साहित्यक लताक नैसर्गिक सौन्दर्य
स भय अनचिन्हार!!! अज्ञात !
एकटा गाछक ओट में ठार!!
ताकैत टुकुर टुकुर एना
जेना दूरक दृष्टिक हरायल !

माथ पर फ़ूसिये पहिरने
कोपमंडुकताक ललका पाग !
सामासिक ज्ञानक संस्कार सं
कटल! फ़ेकल फ़ाकल !
पुरान धुरान बुढियाक नुआ जका !

बस, आब बहुत भेल!
फ़ेकू परम्पराक धोती
पहिरु सब भाषाक पैण्ट
आ बनाबि एक ऎहन परिवेष
जतय उभरि कय आबि सकय
मिथिलाक विशाल महता !

भास्करानन्द झा भास्कर

मिथिला दैनिक क' समाचार ईमेल द्वारा प्राप्त करि :

Delivered by Mithila Dainik

मिथिला दैनिक (पहिने मैथिल आर मिथिला) टीमकेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, पाठक लोकनि एहि जालवृत्तकेँ मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय आ सर्वग्राह्य जालवृत्तक स्थान पर बैसेने अछि। अहाँ अपन सुझाव संगहि एहि जालवृत्त पर प्रकाशित करबाक लेल अपन रचना ई-पत्र द्वारा mithiladainik@gmail.com पर सेहो पठा सकैत छी।

 
#zbwid-2f8a1035