मैथिली गजलशास्त्र -१४ - मिथिला दैनिक

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शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

मैथिली गजलशास्त्र -१४

मैथिली गजलक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। गजलक प्रारम्भ इस्लामक आगमनसँ पूर्वक घटना अछि आ अवेस्ता आ वैदिक संस्कृत मध्य ढेर रास साम्य अछि। दोसर दुर्भाग्य मायानंद मिश्रक ओ कथन भेल जाहिमे ओ घोषणा केलथि जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए, हुनकर तात्पर्य दोसर रहन्हि मुदा लोक अही तरहेँ ओकरा प्रस्तुत करए लागल, कारण ओ स्वयम् गीतल नामसँ गजल लिखलन्हि।  मैथिली गजलमे "अनचिन्हार आखर" सन ब्लाग उपस्थित भेल जतए बहर (छन्दयुक्त) गजल आ गजलकारक लाइन लागि गेल। मुदा सभसँ बड़का दुर्भाग्य ई भेलै जे मैथिलीक किछु तथाकथित शाइर सभ रामदेव झा द्वारा बहर संबंधी विचारकेँ नकारि देलन्हि ( देखू- लोकवेद आ लालकिलामे देवशंकर नवीन जीक आलेख)। जँ वर्तमानमे गजलक परिदृश्यकेँ देखी तँ मोटामोटी दूटा रेखा बनैत अछि (जकरा हम दू युगक नाम देने छी) पहिल भेल "जीवन युग" आ दोसर भेल "अनचिन्हार युग"। आब कने दूनू युग पर नजरि फेरल जाए।
1)  जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह। रामलोचन ठाकुर जीक बहुत रचना गजल अछि मुदा ओ अपने ओकर क्रम-विन्यास कविता-गीत जकाँ बना देने छथिन्ह मुदा किछु गजलक श्रेणीमे सेहो अबैए। ऐ “जीवन युग”क गजलक प्रमुख विशेषता अछि बे-बहर अर्थात बिन छंदक गजल। ओना बहरकेँ के पूछैए जखन सुरेन्द्रनाथ जी काफियाक ओझरीमे फँसल रहि जाइ छथि। एकर अतिरिक्त आर सभ विशेषता अछि ऐ युगक। आ जँ एकै पाँतिमे हम कहए चाही तँ पाँति बनत---" गजल थिक, ई गजल थिक, आ इएह टा गजल थिक"।
2)  आब कने आबी " अनचिन्हार युग" पर। ऐ युगक प्रारंभ तखन भेल जखन इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल गजल आ शेरो-शाइरीकेँ समर्पित ब्लाग "अनचिन्हार आखर" ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) क जन्म भेल।आ ऐ अन्तर्जालक “अनचिन्हार आखर” जालवृत्तक नामपर हम ऐ युगक नाम "अनचिन्हार युग" रखलहुँ अछि। ऐ युगक किछु विशेषता देखल जाए-

·         गजलक परिभाषिक  शब्द आ बहरक निर्धारण---- ई सौभाग्य एकमात्र "अनचिन्हारे आखर"केँ छैक जे ओ हमरासँ १३ खंडमे (एखन धरि १३ खण्ड) "मैथिली गजल शास्त्र" लिखेलक। आ ई मैथिलीक पहिल एहन शास्त्र भेल जइमे गजलक विवेचन मैथिली भाषाक तत्वपर कएल गेलै। तकरा बाद आशीष अनचिन्हार सेहो "गजलक संक्षिप्त परिचय" लीख ऐ परंपराकेँ पुष्ट केलथि। आ एकरे फल थिक जे सभ नव-गजलकार बहरमे गजल कहि रहल छथि।
·         स्कूलिंग ---- "अनचिन्हार आखर" गजल कहेबाक परंपरा शुरू केलक आ तइमे सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार उभरि कए अएलाह।
·         गजलमे मैथिलीक  प्रधानता----"अनचिन्हार युग" सँ पहिने गजलमे उर्दू-हिन्दी शब्दक भरमार छल आ मान्यता छल जे बिना उर्दू-हिन्दी शब्दक गजल कहले नै जा सकैए। मुदा "अनचिन्हार आखर" ऐ कुतर्ककेँ धवस्त केलक आ गजलमे १००% मैथिली शब्दक प्रयोगकेँ सार्वजनिक केलक।
·         गजलक लेल पुरस्कार  योजना--- "अनचिन्हार आखर" मैथिली साहित्य केर इतिहासमे पहिल बेर  गजल लेल अलगसँ पुरस्कार देबाक घोषणा केलक। ऐ पुरस्कारक नाम "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा" पुरस्कार अछि।
·         उपर चारू विशेषताक आधारपर एकटा अंतिम मुदा सभसँ बड़का विशेषता जे निकलल ओ थिक मायानंद मिश्रक ओइ कथनक खंडन, जकर अभिप्राय छल जे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखल नै जा सकैए। "अनचिन्हार आखर" सरल वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दक अतिरिक्त फारसी/ उर्दू बहरमे सेहो मैथिली गजल लिखबाक शास्त्र ओ उदाहरण खाँटी मैथिली शब्दावलीमे प्रस्तुत केलक।