गजल - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 26 सितंबर 2011

गजल

एतऽ माथ चकराइए चलू घुरि‍ चली
तनोसँ तन छुबाइए चलू घुरि‍ चली

कि‍यो ककरो नहि‍ देखैए ऐ समाजमे
मोने मन झगड़ाइए चलू घुरि‍ चली

गोर मौगी गौरवे आन्हर भेलि‍ अड़ल
करि‍या बाट बुझाइए चलू घुरि‍ चली

कोन उपाए लगाबी तौड़ैले ऐ फानीकेँ
टूटि‍ मन जे कनाइए चलू घुरि‍ चली

करब नै कोनो आस ऐ समाजसँ हम
उमेश जँ घुरियाइए चलू घुरि‍ चली