गजल - मिथिला दैनिक

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रविवार, 24 जुलाई 2011

गजल


बाट तकैत दिन बीति जाएत बुझलिऐ
आस तकैत जिनगी बिताएत बुझलिऐ

आफन तोड़ब अहाँ सुनबै तखन की की
बीतत बेर उदासी कहाएत बुझलिऐ


ऊँह ई टीस उठल फेर वेदना सहै
छी
आदति बनल बनि बुझाएत बुझलिऐ

सहबाक शक्ति जे खतम भेल काल्हियेसँ
सम्वेदना अदौसँ जँ हराएत बुझलिऐ


गढ़ुआरि छी पहिने दर्द नै छल कनेको
दुख सहैक सुभावे कहाएत बुझलिऐ

करऽ पड़त मेहनति तिगुना कैक गुना
गोनरिपर बैसल सोचाएत बुझलिऐ

गभछब ऐ मालक जिरतिआ कहबैत
गोरहन्नी लऽ खपड़िआ गाएत बुझलिऐ

गतायात बन्न, भाव गोपलखत्ता गेलैए
गच्छ बना कऽ गोधियाँ बनाएत बुझलिऐ
ऐरावतक गोधिआँ बनत के असगर
हाथी-हेंज बिसरत हराएत बुझलिऐ