गजल - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 24 जून 2011

गजल


मिरदङियाक तरंग भँसियाइए अङेजब कोना  
सुनि मोन घुरमाइए अकुलाइए अङेजब कोना 

आँखिक नोर झरलै बनलै अजस्र धार झझाइए
पियासल छी ठाढ़, जी हदबदाइए अङेजब कोना 

सगुन बान्हसँ बान्हल मोनक उछाही बिच
ठाढ़ सगुनियाँ बनल उसरगाइए अङेजब कोना 

हरसट्ठे अपने अपन चेन्हासी मेटा लेलक आइ
मुरुत हरपटाहि बनेने जाइए अङेजब कोना 

छरछर बहल छै धार मोनक, देखू चल अछि
धेने बनल बाट उधोरनि बनैए अङेजब कोना 

उड़ैचिड़ै आ बहैए अनेरे नील अकाश बिच
ऐरावत-मन जखन धियाइए अङेजब कोना