द्विभाषिक लेखन - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 16 मई 2011

द्विभाषिक लेखन

साहित्यिक लेखन मे प्राय: द्विभाषिकता क स्थिति आ कतहु कतहु बहुभाषिकता क स्थिति व्‍याप्‍त अछि ।कालिदास देवभाषा मे लिखतहु किछ पात्रक लेल प्राकत क प्रयोग करैत छथिन्‍ह ।विद्यापति मैथिली,अपभ्रंश,अवहत्‍थ आ देवभाषा मे एक साथ निष्‍णात छलाह ।आधुनिक लेखन मे बाबा नागार्जुन अर्थात यात्री जी (हिंदी ,मैथिली ,बांग्‍ला ,आदि)सुमन जी(मैथिली आ देवभाषा)आरसी बाबू(हिंदी ,मैथिली)राजकमल चौधरी(हिंदी ,मैथिली)आदि एक साथ दू टा या बेशी भाषा मे सक्रिय रहलाह ।ई कोनो तरहें लेखकगणक कमजोरी नहि रहल ।बहुभाषिक विनिमयक स्थिति के कारणें दूनू दिश फायदा रहल ।शब्‍द भंडार,क्रिया रूप वा अभिव्‍यक्ति क विभिन्‍न धरातल पर ई उपयोगी स्थिति छल ।एकरा कोनो तरहें वर्णसंकरता नइ कहल जा सकैत छैक ।हमर मित्र आ एकटा छोट भाइ ऐ स्थिति पर चिंता व्‍यक्‍त करैत एकरा वर्णसंकरता कहैत छथिन्‍ह आ रचना क शुद्धता पर बल दैत छथिन्‍ह ।शुद्धता आ मौलिकता अलग चीज छैक आ द्विभाषिकता के वर्णसंकरता क अभिधान दैत अपन बात रखनए अलग बात छैक ।ओहि आलेख मे यात्रीजी के वर्णसंकरताक जनक मानल गेल अछि ।यदि विद्यापति,यात्री,आरसी,फिराक,खुसरो क बहुभाषिकता वर्णसंकरता छैक तखन वर्णसंकरता साहित्‍य क लेल कते बडका वरदान छैक ई विचारनीय ।
द्विभाषिकता क ई स्थिति ओहि ठाम वाकइ असमंजस उत्‍पन्‍न करैत अछि जखन एके टा रचना दू भाषा मे फराक फराक मौलिक बताओल जाइत छैक ।ई स्थिति प्राय: हिंदी मैथिली मे लेखन करए वला कविगण करैत छथि ,मुदा ई साहित्‍य क लेल कोनो बडका संकटक बात नइ छैक ।प्रेमचंद पहिले उर्दू मे लिखिके हिंदी मे अनुवाद करैत छलाह ।बाद मे हिंदी मे लिखिके उर्दू मे अनुवाद करए लागलाह ।हमखुर्मा व हमसवाब क अनुवाद ओ 1907 ईसवी मे प्रेमा अर्थात दो सखियों का विवाह क नाम से केलथि ।हुनकर उर्दू उपन्‍यास जलवा ए ईसार 1921 ईसवी मे वरदान नाम सं प्रकाशित भेल ।वास्‍तव मे हिंदी क हुनकर पहिल उपन्‍यास सेवासदन(1918)पहिले उर्दू मे बाजारे हुश्‍न नाम सं लिखल गेल ।इए‍ह स्थिति प्रेमचंदक कहानी क अछि ।मुदा हिंदी आ उर्दू दूनू हुनका श्रेष्‍ठ साहित्‍यकार क रूप मे सम्‍मान दैत अछि ।हुनका नकारवा क लेल ने हिंदी ने उर्दू प्रस्‍‍तुत अछि ।
हिंदी मैथिली मे इएह स्थिति नागार्जुनक अछि ।नागार्जुन मने अप्‍पन ठक्‍कन मिश्र ।बलचनमा क स्थिति पर जे विवाद हो हुनकर कविता हिंदी आ मैथिली दूनू जगह मॉडल जंका अछि ।कोनो साधारण मॉडल नइ अभिव्‍यक्ति क परम प्रतीक क रूप मे ,जकरा दिश संशोधन क आंखिए देखनए संभव नइ ।
ऐ संक्षिप्‍त आलेख मे हमर निवेदन ई जे मौलिकता क मार्ग सुन्‍दर अछि मुदा ई एकाकी आ निस्‍संग नइ होइबाक चाही ।जेना वैदिक मुनि ज्ञान क सभ श्रोत के अपना दिश अएबा क आवाहन करैत छथि ,तहिना मैथिली साहित्‍य सेहो सभ के साथ चलए आ सबसं आगां बढए ।