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हमरा आगूमे पसरल अछि “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍” तारानंद ि‍वयोगीक गजल संग्रह। चालीस गोट गजलकेँ समेटने। लोककेँ छगुन्‍ता लागि‍ सकैत छैक जे मैथि‍लीमे गजलक आलोचना कहि‍आसँ शुरू भए गेलैक। ऐ छगुन्‍ताक कारण मुख्‍यत: हम दू रूपेँ देखैत छी पहि‍ल तँ ई जे गजल कहि‍ओ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक मुख्‍यधारामे नै आएल दोसर-मैथि‍ल-जन एखनो गजलक समान्‍य नि‍अम आ ओकर बनोत्तरीसँ परि‍चि‍त नै छथि‍। समान्‍ये कि‍एक अपने-आपकेँ गजल बुझनि‍हारक सेहो हाल एहने छन्‍हि‍। बेसी दूर नै जाए पड़त। “‍घर-बाहर” जुलाइ-सि‍तम्‍बर 2008ई.मे प्रकाशि‍त अजि‍त आजादक लेल “कलानंद भट्टक बहन्ने मैथि‍ली गजलपर चर्च‍” पढ़ि‍ लि‍अ मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत।
जँ वि‍ष्‍यान्‍तर नै बुझाए तँ थोड़ेक देरले तारानंद वि‍योगीक पोथीसँ हटि‍ अजाद जीक लेखक चर्च करी। ऐ लेखक पहि‍ले पाँति‍ थि‍क- मैथि‍लीमे गजल लि‍खबाक सुदीर्ध परम्‍परा रहल अछि.....। मुदा कतेक सुर्ढीध तकर कोनो ठेकाना अजादजी नै देने छथि‍न्‍ह। फेर एही लेखक दोसर पैरामे अजि‍त जी दूमरजामे फँसल छथि‍। ओ मैथि‍ल द्वारा समान्‍य गप-सप्‍पमे गजलक पाँति‍ नै जोड़बाक प्रथम कारण मानैत छथि‍। जे मैथि‍लीमे शेर एकदम्‍मे नै लि‍खल गेल। आब पाठकगण कने घि‍यान देल जाए। लेखक पहि‍ल पाँति‍ तँ अपनेकेँ धि‍यान हेबोटा करत जे मैथि‍लीमे गजलक सुर्दीध....।” सभसँ पहि‍ल गप्‍प जे गजल कि‍छु शेरक संग्रह होइत छैक आ दोसर गप्‍प ई जे जँ अजाद जीक मोताबि‍क शेर लि‍खले नै गेलैक तँ फेर कोन प्रकारक सुर्दीध परंपराकेँ मोन पाड़ि‍ रहल छथि‍ अजादजी। एेठाम गलती अजाद जीक नै मैथि‍लीक ओहि‍ गजलकार सभक छन्‍हि‍ जे गजल तँ लि‍खैत छथि‍ मुदा पाठककेँ ओकर परि‍चए, गठन, नि‍अम आदि‍ देबासँ परहेज करैत छथि‍। ओना प्रसंगवश ई कहबामे कोनो संकोच नै जे गजल कखनो लि‍खल नै जाइत छैक। मुदा मैथि‍लीक धुरंधर सभ गजल लि‍खैत छथि‍। मूल रूपसँ अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल कहल जाइत छैक लि‍खल नै। पाठकगण गजलक ई नि‍अम भेल। आब फेरो अजि‍त जीक लेखकेँ आगू पठू आ अपन कपार पीट अपनाकेँ खुने-खूनामे कए लि‍अ। अजि‍त जी अपन संपूर्ण लेखमे जै शेर सभ मक्‍ता कहलखि‍न्‍ह अछि वस्‍तुत: ओ मक्‍ता छैके नै। पाठकगण मोन राखू, मक्‍ता गजलक ओहि‍ अंति‍म शेरकेँ कहल जाइत छैक जैमे गजलकार (एकरा बाद हम शाइर शब्‍द प्रयुक्त करब, अहूठाम मोन राखू शायर गलत उच्‍चारण थि‍क।) अपन नाम वा उपनामक प्रयोग करैत छथि‍। (अहूठाम मोन राखू हरेक गजलमे नाम वा उपनामक समान प्रयोग होएबाक चाही ई नै जे एकरा गजलक मक्‍ता तारानंदसँ होअए आ दोसर गजलक मक्‍ता वि‍योगीक नामसँ नामसँ।) मुदा आश्‍चर्य रूपेण अजादजी जै शेर सभकेँ मक्‍ता कहलखि‍न्‍ह अछि ओइमे कोनो शाइरक नाम- उपनाम नै भेटत। ओना अजि‍तजी हि‍न्‍दीक सुप्रसि‍द्ध शाइर छथि‍ तकर प्रमाण ओ लेखक प्रारंभेमे दए देने छथि‍।
हँ तँ ऐ लेखक संक्षि‍प्‍त अवलोकनक पछाति‍ फेरसँ वि‍योगी जीक गजल संग्रहपर चली। तँ शुरूआत करी स्‍पष्‍टीकरणसँ, हमर नै वि‍योगी जीक। सभसँ पहि‍ने ई जे अन्‍य मैथि‍ली शाइर जकाँ वि‍योगीओ जी मानैत छथि‍ जे गजल लि‍खल जाइत छैक। देासर गप्‍प जे वि‍योगीजी द्वारा देल अपन भाषा संबंधी वि‍चारसँ लगैत अछि जे भनहि‍ं ि‍वयोगी जी उर्दु सीख उर्दूक पोथी पढ़ैत हेताह मुदा गजल तँ कि‍न्नहुँ नै लि‍खैत हेताह, कारण, पाठकगण धि‍यान देल जाए। अरबी-फारसी-उर्दू तीनू भाषाक छंद शास्‍त्र एकमतसँ कहैए जे दोसर भाषाकेँ तँ छोड़ू अपनो भाषाक कठि‍न शब्‍दक प्रयोग गजलमे नै हेबाक चाही। ठीक उपरोक्‍त भाषाक नि‍अम जकाँ मैथि‍लीओ मे नि‍अम छैक। तँए महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ अपन कोनहुँ गीतमे कृष्‍ण, वि‍ष्‍णु आदि‍क प्रयोग नै केने छथि‍। मुदा वि‍योगी जी अपन पोथीक नाम रखने छथि‍ “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍”। जनसमान्‍य युद्ध तँ कहुना बुझि‍ जेतैक मुदा साक्ष्‍य....। ऐठाम प्रसंगवश ई कहब बेजाए नै जे वि‍योगीजी अपनाकेँ अभि‍जात शब्‍दक प्रयोग मानैत छथि‍।
आब हमरा लोकनि‍ ऐ पाेथीमे प्रस्‍तुत चालीसो गजलक चर्च करी। पहि‍ले भाषाकेँ देखी। ओना वि‍योगीजी भाषा संबंधी गलती जानि‍ बूझि‍ कए लौल-वश ततेक ने कएल गेल छैक जकरा अनठा कए आँगा बढ़ब संभब नै। एकर कि‍छु उदाहरण प्रस्‍तुत अछि- दोसर गजलक मतलाक दोसर पाँति‍मे दुखक बदला यातना। अही गजलक दोसर शेरक पहि‍ल पाँति‍मे नाराक बदला जुमला। तेसर गजलक दोसर गजलक दोसर शेरक दोसर पाँति‍ धधराक बदला ज्‍वलन। अही गजलक अंति‍म शेरमे प्रयुक्‍त तन्‍वंग, आब एकर अर्थ जनताकेँ बुझबि‍औ। फेर आगू गजलक दोसर शेरमे नजरि‍ केर बदला दृष्‍टि‍, दसम गजलक दोसर शेरमे उन्‍यक जगह वि‍परीत। एगारहम गजलक मतलामे दुबि‍धाक जगह द्धैध। तेरहम गजलक तेसर शेरमे नेकदि‍ली आ बदीक प्रयोग। तइसम गजलक अंति‍म शेरमे भटरंगक बदला बदरंग। पचीसम गजलक तेसर शेरमे इजोरि‍आक बदला ज्‍योतसना। चौतीसम गजलक मतलामे दुख केर बदलामे पीड़-इत्‍यादि‍। ओना ऐ उदाहरणक अति‍रि‍क्‍त हरेक गजलमे हि‍न्‍दी, उर्दू, संस्‍कृत आदि‍ भाषाक तत्‍सम बहुल शब्‍दक ततेक ने प्रयोग भेल छैक जे गजलक मूल स्‍वर, भाव-भंगि‍मा, रसकेँ भरि‍गर बना देने छैक। तैपर वि‍योगीजी गर्व पूर्वक घोषण केने छथि‍ जे ओ ओइ परि‍वारक नै छथि‍ जि‍नका संस्‍कारमे अभि‍जात शब्‍द भेटल हो। बि‍डंबना छोड़ि‍ एकरा कि‍छु नै कहल जा सकैए। जँए चालीसो गजलक भाषाकेँ धि‍यानसँ देखल जाए तँ हमरा हि‍साबें वि‍योगीजी ऐ गजल सबहक मैथि‍ली अनुवाद कए देथि‍न्‍ह तँ वेसी नीक हेतैक।
भाषासँ उतरि‍ आब गजलक वि‍चारपर आएल जाए। बेसी दूर नै जाए पड़त-तेसर गजलक अंति‍म शेरसँ मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत। सोझे-सोझ ई शेर कहैए जे- लोककेँ अपन जयघोष करबामे देरी नै करबाक चाही आ काज केहनो करी चान-सुरूजक पाँति‍मे अएबाक जोगाड़ बैसाबी। ओना हम एतए अवश्‍य कहब जे ई कोनो राजनीति‍क वि‍चार नै छैक जकर स्‍पष्‍टीकरण दए-वि‍योगीजी अपन पति‍आ छोड़ा लेताह। ई वि‍शुद्ध रूपे समाजि‍क वि‍चार छैक आ ऐ वि‍चारसँ समाजपर की नकारात्‍मक प्रभाव पड़लैक वा पड़तैक तकर अध्‍ययन अवश्‍य कएल जेबाक चाही। मुदा एहन नकारत्‍मक वि‍चार ऐ संग्रहमे कम्‍मे अछि। संग्रहक कि‍छु सकारात्‍मक ि‍वचार प्रस्‍तुत अछि। दसम गजल केर अवलोकन कएल जाउ। नि‍श्‍चि‍त रूपसँ वि‍याेगीजी एकरा परि‍र्वतनीय वि‍चार रखलाह अछि ई कहि‍ जे-
देस हमर जागत अच्रक एना चलि‍ ने सकत
हारि‍ लि‍खब झण्‍डा के आदमीक जीत लि‍खब।
पाठकगण आजुक समएमे झण्‍डाक वि‍परीत गेनाइ सहज गप्‍प नै। तहि‍ना चारि‍म गजलक तेसर शेरक पहि‍ल पाँति‍- राम राज्‍यक स्‍थापना लेल भरत-लक्ष्‍मण झगड़ि‍ रहला। कतेक सटीक व्‍यंग अछि से सभ गोटे बुझैत हेबैक। ओतै आजुक भ्रमोत्‍पादक सरकारपर तै दि‍नमे लि‍खल अड़तीसम गजलक मतलाक पहि‍ल पाँति‍ देखू-
राजनीति‍ भटकल तँ डूबल मझधार जकाँ।
वि‍चार संबंधी प्रस्‍तुत उदाहरणसँ स्‍पष्‍ट अछि जे सकारात्‍मक वि‍चार बेसी अछि। मुदा कहबी तँ सुननहि‍ हेबैक अपने जे एकैटा सड़ल माछ.....।
अस्‍तु आब ऐ गजल संग्रहक व्‍याकरण पक्षकेँ देखल जाए। ऐठाम ई स्‍पष्‍ट करब आवश्‍यक जे मैथि‍ली गजल अखनो फरि‍च्‍छ भए कए नै आएल अछि जैसँ हम बहर (छंद) आदि‍पर वि‍चार करब। तँए ऐठाम हम मात्र रदीफ आ काफि‍याक प्रयोगपर वि‍चार करब। पाठकगण गजलमे रदीफ ओइ शब्‍द अथवा शब्‍द समूहकेँ कहल जाइ छैक जे गजलक मतलाक (गजलक पहि‍ल शेरकेँ मतला कहल जाइत छैक।) दुनू पाँति‍मे समान रूपसँ आबए आ तकरा बाद हरेक शेरक अंति‍म पाँति‍मे सेहो समान यपे रहए। तहि‍ना काफि‍या ओइ वर्ण अथवा मात्राकेँ कहल जाइत जे रदीफसँ तुरंत पहि‍ने आबैत हो जेना एकटा उदाहरण देखू- दूटा शब्‍द लि‍अ, पहि‍ल भेल अनचि‍न्‍हार ओ दोसरमे अन्‍हार। आब मानि‍ लि‍अ जे ई दुनू शब्‍द कोनो गजलक मतलामे रदीफक तुरंत बादमे अछि। आब जँ गौरसँ देखबै तँ भेटत जे दुनू शब्‍दक तुकान्‍त “र‍” छैक। तँ एकर मतलब जे “र‍” भेल काफि‍या (काफि‍या मतलब तुकान्‍त बूझू) तेनाहि‍ते मात्राक काफि‍या सेहो होइतैक जेनाकि‍- राधा आ बाधा दुनू शब्‍द आ'क मात्रासँ खत्‍म होइत अछि तँए ऐमे आ'क मात्रा काफि‍या अछि। “एहि‍‍” आ “रहि‍‍” दुनूमे इ‍'क मात्राक काफि‍या अछि। अन्‍य मात्राक हाल एहने सन बूझू। तँ फेर चली ऐ संग्रहक व्‍याकरण पक्षपर- एे संग्रहक कि‍छु गजलमे काफि‍याक गलत प्रयोग भेल छैक- उदाहरण लेल सातम गजलकेँ देखू। मतलाक शेरमे काफि‍या अछि “न‍” (भगवान आ सन्‍तान)। मुदा वि‍योगीजी आगू देासर शेरमे काफि‍या “म‍” (गुमनाम) केँ लेलखि‍न्‍ह अछि जे सर्वथा अनुचि‍त। तेनाहि‍ते सताइसम गजलक उपरोक्त “म‍” काफि‍या बदलामे “न‍” काफि‍याक प्रयोग।
कुल मि‍ला कए ई गजल संग्रह ओतेक प्रभावी नै अछि जतेक की शाइर कहैत छथि‍। हँ एतेक स्‍वीकार करबामे हमरा कोनो संकोच नै जे ई गजल संग्रह ओइ समएमे आएल जै समएमे गजलक मात्रा कम्‍मे छल। आ शाइर आ गजल संग्रह सेहो कम्‍मे जकाँ छल।

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