गजल - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 28 मार्च 2011

गजल


नोर झरैए     मोनक दागनि दगै छी
तराटक लागलए    आ बातो बकै छी

कोनटा बचल नै   एकान्ती ले एकोटा
अन्हरोखे उठै छी  आ गनती गनै छी

अन्हरियासँ बेसी    अन्हार जिनगीमे
ई इजोरिया किए   अहाँ मुँह दुसै छी

पिआ गेलाह देशान्तर      दूरस्त देस
कियो नै घुरै अछि से आसो नै तकै छी

भोरे अहाँ बिनु       दिन फेर बजरल
ऐरावतसँ भारी      ऐ दिनकेँ देखै छी