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जखन-जखन मैि‍थली भाषा साहि‍त्‍यमे नाट्य वि‍धाक चर्च होइत अछि‍ तँ हठात् पंडि‍त जीवन झासँ लऽ कऽ झि‍झि‍रकोना आ तालमुट्ठी सन नाटकक नाटककार अरवि‍न्‍द कुमार अक्‍कू जीक वि‍वेचन स्‍वभावि‍क भऽ जाइछ। एहि‍ एक सय छ: बरखक नाट्य रचनमे बहुत रास नाटककार वि‍वि‍ध शैलीक साहि‍त्‍यि‍क नाटकक संग-संग लोकप्रि‍यताक लेल चलन्‍त आ ओछ नाटक सेहो लि‍खलनि‍। कि‍छु रचनाकार तँ नाटककारेक रूपेँ वेस चर्चित छथि‍ संग-संग हुनका सभकेँ पुरस्‍कृत सेहो कएल गेल अछि‍। उदाहरणस्‍वरूप श्री महेन्‍द्र मलंगि‍या मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रति‍ष्‍ठत सम्‍मान प्रबोध सम्‍मानसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल छथि‍। मलंगि‍या जी बहुत रास नाटक लि‍खलनि‍- लक्ष्‍मण रेखा : खण्‍डि‍त, जुअाएल कनकनी, एक कमल नोरमे, ओकरा अॉगनक बारहमासा, कमलाकातक राम, लक्ष्‍मण ओ सीता आर काठक लोक। एहि‍ नाटक सभमे 'एक कमल नोरमे' साहि‍त्‍यक समग्र बि‍न्‍दुकेँ वि‍म्‍बि‍त करएबला नीक नाटक मानल जाइत अछि‍। मुदा 'काठक लोक' पढ़लासँ पाठक स्‍वयं ि‍नर्णय सुनाबथि‍ जे कतए धरि‍ एकरा 'मैथि‍ली नाटक' मानल जाए। बि‍म्‍व लोकगाथा आ वि‍वेचन मैथि‍लीसँ बेसी हि‍न्‍दीमे। ओना सभ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे भाषाक प्रयोग ठाम-ठाम कएल जाइत अछि‍ मुदा मात्र पात्रक दशा आ परि‍स्‍थि‍ति‍मे तारतम्‍य स्‍थापि‍त करबाक लेल। मलंगि‍याजी एहि‍ पोथीमे हि‍न्‍दीक प्रयोग कोन रूपेँ कएने छथि‍ ई गप्‍प झारखंडक अंत:स्‍थ कक्षाक (मैथि‍ली भाषी जौ उपलब्‍ध होथि‍) छात्र-छात्रासँ पुछल जा सकैत अछि‍ कि‍एक तँ 'काठक लोक' झारखण्‍ड अधि‍वि‍द्य परि‍षद्क मैि‍थली पाठयक्रममे सम्‍मि‍लि‍त अछि‍।
मैि‍थलीक संग दुभाग्‍य मानल जाए वा वि‍डम्‍वना कि‍छु कथाकथि‍त साहि‍त्‍यकार आ समीक्षकक दलपुंज भाषापर अपन अधि‍कार चमौकनि‍ जकाँ छथि‍। 'अहाँक सोहर हम गाएब आ हमर डहकन अहाँ बि‍दबि‍दाउ' एहि‍ परि‍पेक्ष्‍यमे कि‍छु प्रति‍भा झॉपले रहि‍ गेल, कतहु कोनो चर्च नहि‍।
एहि‍ बज्र पातक शि‍कार छथि‍ आधुनि‍क पिरहीक सनसनाइत युगान्‍कारी नाटककार- 'श्री आनंद कुमार झा' आनंद जीक एखन धरि‍ पॉच गोट नाटक प्रकाशि‍त भेल अछि‍ 'टाकाक मोल (2000), 'कलह (2001), 'बदलैत समाज (2002), धधाइत नवकी कनि‍याँक लहास (2003) आ हठात् परि‍वर्त्तन 2005ई.मे। एहि‍ नाटकक संग-संग आनंदजीक अप्रकाशि‍त नाटकक गणना दू अंक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍।
आनंद जीक जन्‍म 1977ई.मे मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क संहंति‍त भूखण्‍ड 'मधुबनी जि‍ला'क मेंहथ गाममे भेल। जौं समस्‍तीपुर खगड़ि‍या आ बेगूसराय जि‍लाक लाल रहि‍तथि‍ तँ उपेक्षाक दंश स्‍वाभावि‍क छल मुदा ठामक वासी उपेक्षि‍त भेलाह कनेक संत्रास जकाँ लगैछ। गाम-गामसँ लऽ कऽ कोलकाता शहर धरि‍ मंचि‍त एहि‍ नाटकक कोनो समीक्षा नहि‍ भेल, ई सभ मात्र मैथि‍ली भाषामे संभव छैक। जौं बि‍म्‍वक उपयोगि‍ताकेँ केन्‍द्र बि‍न्‍दु मानल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रवीण नाटक कारक समूहमे आनंद जीक स्‍थान नि‍श्‍चि‍त अछि‍।
टाटाक मोल : आर्य भूमि‍क एकटा पैघ व्‍याधि‍ काटर प्रथाक दु:स्‍थि‍ति‍पर केन्‍द्रि‍त एहि‍ नाटकमे मि‍थि‍ला संस्‍कृति‍ कोढ़ि‍क चि‍त्रण नीक ढंगसँ कएल गेल अछि‍। कन्‍याक पि‍ता नाओ गरीवनाथ संग-संग दरि‍द्र सेहो। अपन धर्मपत्नी सुमि‍त्राक आश पूर्ण करवाक लेल 'पुत्र कामनार्थ' पॉच गोट कन्‍याकेँ जन्‍म देलनि‍। पहि‍ल बेटीक वि‍वाहमे डॉड़ टुटि‍ गेलनि‍ सभटा खेत बि‍का गेलनि‍। दोसर बेटीक कन्‍यादानक लेल आतुर छथि‍ मात्र बारह कट्ठा जमीन बॉचल छन्‍हि‍। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि‍, वि‍वाह अपना मोने नहि‍ करए चाहैत छथि‍- मात्र समाजक हेय दृष्‍टि‍सँ बचवाक लेल बेटीक वि‍आह एहि‍ शुद्धमे करवाक लेल परेशान छथि‍। हमरा सबहक समाजक कतेक कलुष रूप अछि‍ अप्‍पन टेटर नहि‍ देखि‍ कऽ लोक सभ दोसरक फुसरीपर काग-दृष्‍टि‍ लगौने रहैत छथि‍। कुमारि‍ बेटी छन्‍हि‍ गरीब झाक घरमे आ परेशान छथि‍ समाजक लोक। एहि‍ लेल नहि‍ जे मि‍थि‍लाक बेेटीक उद्धार कएल जाए मात्र बारह कट्ठा जमीन लि‍खएबाक लोभमे। प्रभा अपन बहि‍नक देअर प्रभाकरसँ सि‍नेह करैत छथि‍ लेकि‍न आंडबरधर्मी समाज एहि‍ सि‍नेहक मंजूरी नहि‍ देत तँए चुप्‍प।
गरीव झा दलाल काकासँ संपर्क करैत छथि‍। जेहन नाअो तेहने कार्य। हुनक चेला कक्कासँ बेसी पारखी। दुनूक जोड़ी शुभ्‍म नि‍सुम्‍भ जकाँ दुष्‍ट आ धृष्‍ठतासँ भरल। हर्षदमेहताक दलाली हि‍नका लग ओछ पड़ि‍ जाइत। बालकक पि‍ता लीलाम्‍बर बाबू वास्‍तवमे लीलाधारी छथि‍। भाति‍ज सभसँ कम कैंचा पुत्रक वि‍आहमे कोना लेतथि‍ तँए पचहत्तरि‍ हजारसँ कम टाका नहि‍ चाही। दलाल काकाक मोहि‍नी मंत्रक जाइमे आबि‍ पैंसठ हजारमे वि‍आह करबाक ि‍नर्णय सुनौलनि‍। शर्त्त छनि‍ जे समाजमे पचहत्तरि‍ हजारक उद्धोष कएल जाए। दलाल काकाक लि‍षुगी उगना एहि‍ उद्धोषणक लाभ लेवाक प्रयासमे सफल भेलनि‍।
दलालीक दस हजार कमीशन दुनू चेला गुरूक पेटमे। गरीब झा अपन वॉचल जमीन 50 हजारमे बेि‍च लेलनि‍। मि‍त्र गुणनंद जीसँ दस हजार टाकाक मदति‍ भेटलनि‍, शेष प्रश्‍न ओझराएल पंद्रह हजार आव कोना हएत? येन केन प्रकारेन वरि‍याती दलान लागल। फेर धमगि‍ज्‍जड़ि‍। माथक पाग खसि‍ पड़लनि‍ मुदा वरि‍याती आपि‍स। अंतमे प्रभाकरक संग प्रभाक वि‍आह होइत अछि‍। लीलांवर जी काटर टाका पचास हजार कन्‍यागतकेँ आपि‍स कएलनि‍। मुदा नाटककार ई स्‍पष्‍ट नहि‍ कऽ सकलनि‍ जे दलाल काका दलालीक दस हजार कन्‍यागतकेँ देलनि‍ वा नहि‍। कथानकक कि‍छु तथ्‍य वास्‍तवि‍कता नहि‍ भऽ कऽ कल्‍पना मात्र लागल। गरीब नाथक बेटी प्रभा काॅलेजमे पढ़ैत छथि‍ आ छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्‍हि‍। ओना तँ पुत्रक आकांक्षामे पॉच गोट पुत्रीक जन्‍म देमएबला माए-बापक अर्थव्‍यवस्‍था अव्‍यवस्‍थि‍त हएव स्‍वाभावि‍क अछि‍। परंच मैथि‍ल संस्‍कृति‍क ग्रामीण व्‍यवस्‍थामे रहनि‍हार माता-पि‍ताक जीवनमे संतानक रूपेँ पुत्रसँ पुत्रीक बेसी महत्‍व देव कल्‍पना मात्र छैक, वास्‍तवमे तँ बेटी जन्‍महि‍सँ आनक धरोहरि‍ मानल जाइत अछि‍ तँए बेटा महीस चराबथि‍ आ बेटी कॉलेजमे पढ़तीह, आश्‍चर्य जनक लागल।
कथानकक बीच-बीचमे अंग्रेजी शब्‍दक प्रयोग कऽ नाटककार आधुनि‍कता लेबन करवाक प्रयास कएलनि‍ ई उचि‍त अछि‍ वा नहि‍, पाठकपर छोड़ि‍ देवाक चाही। एकटा अनसोहॉत अवश्‍य लागल जे मैथि‍लीमे 'चुकल' शब्‍दक प्रयोग कहि‍या धरि‍ रहत। नि‍ष्‍कर्षत: ई नाटक मंचनक योग्‍य अछि‍।
कलह : कलह आनंदजी लि‍खि‍त दोसर नाटक थि‍क। समाजमे जीवन्‍त धटना सभकेँ एक सूत्रमे जोड़ि‍ कऽ एहि‍ नाटकक सृजन कएल गेल। आकाश एकटा बेरोजगार नौजवान छथि‍। टाकाक लोभमे पि‍ता सुरेश्‍वर हि‍नक वि‍आह करा दैत छथि‍न्‍ह। आकाश सुरेश्‍वर बाबूक पहि‍ल पत्नीक संतान छथि‍ तँए वि‍भाता सुमि‍त्राक दृष्‍टि‍मे हि‍नक कोनो स्‍थान नहि‍। सुमि‍त्रा तँ अपन कोखि‍सँ जनमल पुत्र राजीव आ ओकर कनि‍याँ कोमलक लेल ज्‍येष्‍ठ पुत्रक संग यातनाक सभटा बान्‍ह लॉधि‍ देलनि‍। प्रौढ़ पि‍ता मूक पि‍रस्‍थि‍ति‍क मारल मात्र दर्शक बनि‍ कऽ रहि‍ गेलाह। काल मारि‍सँ भटकैत-भटकैत दुनू परानीक ि‍नर्मम अंत होइत अछि‍। एकटा अबोध नेनाक जन्‍म भेल जे आकाशक अंतरंग मि‍त्र योगेशक कोरमे कथाक अंत धरि‍.....।
नाटककार एहि‍ नाटकक रचना भऽ सकैत अछि‍ जे कथानकमे संत्रास भरबाक संग-संग दर्शकक मध्‍य लोकप्रि‍य बनएवाक लेल केने होथि‍ मुदा एहि‍ सभसँ नाटकक प्रासंगि‍कतापर प्रश्‍न चि‍न्ह नहि‍ लगाओल जा सकैत अछि‍। कतहु-कतहु बि‍म्‍व वि‍श्‍लेषण चलंत आ हि‍न्‍दी भाषाक व्‍यवसायि‍क चलचि‍त्र जकाँ लागल मुदा मैथि‍लीमे नवल प्रयोगकेँ कि‍ओ झॉपि‍ नहि‍ सकैत छथि‍, जतए-जतए एहि‍ नाटकक ि‍चत्रण होएत अवश्‍य छाप छोड़त।
बदलैत समाज : बदलैत समाज नाटकक आरंभ एकटा ब्‍लड कैंसर पीड़ि‍त बालकक अपन पत्नीक संग वार्तालापक संग होइत अछि‍।
कर्जसँ मुक्‍ति‍क लेल घूरन जी अपन बीमार पुत्रक वि‍आह करा दैत छथि‍। हुनका ओना बूझल नहि‍ छलनि‍ जे पुत्र अवधेश ब्‍लड-कैंसरसँ पीड़ि‍त अछि‍। भजेन्‍द्र मुखि‍याक पुत्र दीपक अवधेशक बाल संगी छथि‍। ओ पहि‍नेसँ जनैत छलाह जे अवधेशक मृत्‍युक दि‍वस नजदीक छन्‍हि‍। तथाि‍प ओ खुलि‍ कऽ बजलनि‍ कि‍एक तँ घूरन बाबू स्‍वयं बूढ़ लोक छथि‍। एकटा पि‍ता अपन कान्‍हपर पुत्रक लाशक कल्‍पना मात्रसँ सि‍हरि‍ सकैत अछि‍, वास्‍तवि‍कता.........।।
वि‍वि‍ध घटनाक्रममे अवधेशक मृत्‍युक भऽ गेलनि‍। समाज हुनक वि‍धवा शोभापर चरि‍त्रदोष सेहो लगौलक। समाज की जाहि‍ अवलापर ओकर सासुक वि‍श्‍वास नहि‍ हुअए ओकरापर आन के वि‍श्‍वास करत। नाटकक अंतमे सबहक भ्रम टुटैत अछि‍ जखन शोभा दीपककेँ 'भैया' कहि‍ कऽ सश्रुलाप करैत छथि‍। अंतमे वि‍धवा शोभाक एकटा सच्‍चरि‍त्र युवक वीजेन्‍द्रसँ पुर्नवि‍वाहक कल्‍पना कएल गेल। ओना तँ एहि‍ नाटकमे जात-पाति‍क कोनो चर्च नहि‍ मुदा प्रसंगसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे सवर्ण परि‍वारक पृष्‍ठभूमि‍मे नाटक केन्‍द्रि‍त अछि‍। नाटककारक ई कल्‍पना नीक लागल जे सर्वण घरक वि‍धवा युवतीक पुनर्विवाह भऽ सकैत अछि‍। नाटकक संवादमे ठाम-ठाम अलंकार आ लोकोक्‍ति‍क लेपन नीक लागल। 'सम्‍भावनाक आधारपर मनुष्‍य कल्‍पना करैत अछि‍। मुदा प्रकृति‍क शास्‍वत नि‍यमकेँ कि‍ओ नहि‍ बदलि‍ सकैत अछि‍' एहि‍ संवादक माध्‍यमसँ अवधेश अपन मृत्‍युक संकेतकेँ बूझि‍ रहल छथि‍। हुनक दोसर संवादमे- 'हम मृत्‍युसँ भयभीत नहि‍ छी। भय अछ ओइ नि‍स्‍सहाय अवला नारीक असीम दु:ख, पीड़ आ वेदनासँ। भय अछि‍ अनजानमे हमरासँ भेल गलतीसँ।' श्रंृगारक प्रवल लालसा रहि‍तहुँ परि‍स्‍थि‍ति‍ मनुक्‍खकेँ वैरागी बना दैछ। जनतंत्रक कुटि‍ल व्‍यवस्‍थापर सेहो एहि‍ नाटकमे कटाक्ष कएल गेल। भजेन्‍द्रजी सन कुटि‍ल गामक मुखि‍या छथि‍ तँ वि‍पक्ष हुनकेँसँ बेसी कुटि‍ल। तँए ने फुराइतो छन्‍हि‍ हुनका 'ओ बनि‍याँ बुड़ि‍वक होइत अछि‍ जे पलड़ापर बटखड़ा रखलासँ पहि‍ने समान चढ़ा दैत अछि‍।''
आनंदजीक चारि‍म नाटक धधाइत नवकी कनि‍याॅक लहास : कोनो काटक प्रथाक नाटक नहि‍। मात्र कि‍छु गहनाक खाति‍र शि‍खाक आत्‍महत्‍याक प्रयास अजीव कहल जा सकैछ।
हठात् परि‍वर्त्तन : देशभक्‍ति‍ मूलक नाटक थि‍क।
नि‍ष्‍कर्षत: ई कहल जा सकैत छथि‍ जे आनंद जीक नाटक शैलीमे गोवि‍न्‍द झाक हास्‍य समागम, ईशनाथ झाक अलंकार, जगदीश प्रसाद मंडल जीक साम्‍यवाद, अक्कूजीक आधुनि‍कता, लल्‍लन ठाकुर जीक मंचन शैली आ शेखर जीक जनभाषा कलकल अछि‍।

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