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प्रिये पाठक



आदर करैत छी जन - जन सं ,
प्रिये पाठक छी अतिथि हमर |
हम निर्भर करैत छी ओही पर ,
जे संतुष्टि लक्ष्य अछि हमर |

      आदर करैत छी जन - जन सं ,

      प्रिये पाठक छी अतिथि हमर |

मधुर वचन जीवनक श्रेय अछी ,
प्रेम स्नेह जग - संसार में |
बोली - वचन सुख सँ सम्रिध्ह ,
आत्मरक्षा के अधिकार में |
        आदर करैत छी जन - जन सं ,
        प्रिये पाठक छी अतिथि हमर |


फुरसैतक कमी सब के संग अछी ,
बेश्त आई ई संसार अछी   |
मिथिय्या जिनगी छोरी चलल ,
आस्तित्व रहस्य ई अधिकार में | 
         आदर करैत छी जन - जन सं ,
         प्रिये पाठक छी अतिथि हमर  |

होर परस्पर आई लागल ,
आगू बढाइये के प्यास जागल |
अप्पन पद सेवा के खातिर ,
जग में आई अधिकार भेटल | 
         आदर करैत छी जन - जन सं ,
          प्रिये पाठक छी अतिथि हमर |

प्रेम - भाव भाई चारा के संग ,
मानव अहि सँ प्यासल आई |
एक - दोसर के पार लगाऊ ,
जन - जन से ई नारा हमर | 
         आदर करैत छी जन - जन सं ,

          प्रिये पाठक छी अतिथि हमर |


  (मदन कुमार ठाकुर )

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  1. प्रेम - भाव भाई चारा के संग ,
    मानव अहि सँ प्यासल आई |
    एक - दोसर के पार लगाऊ ,
    जन - जन से ई नारा हमर |
    आदर करैत छी जन - जन सं ,
    प्रिये पाठक छी अतिथि हमर |
    bahut nik lagal padhi ke

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  2. sahi batelo aa sahi marga achhi apnek thakur ji

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  3. प्रेम - भाव भाई चारा के संग ,
    मानव अहि सँ प्यासल आई |
    एक - दोसर के पार लगाऊ ,
    जन - जन से ई नारा हमर |
    आदर करैत छी जन - जन सं ,
    bahut nik prastuti madan ji

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