गजल - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

गजल


गजल
छोट-छीन सन बात बहुत अछि
मुँह बिधुऔने ठाढ़ बहुत अछि

ककरा की कहबै के पतिआएत
गह-गहमे अर्थात बहुत अछि

भयौन बनि ओ अछि ठाढ़ सोझाँमे
हाथक गहमे हाथ बहुत अछि

नीक काज देखि गुमसुम छी ठाढ़
चबासी दऽ दियौ बात बहुत अछि

ओकरहि पाछाँ सभ चलू चलै छी
बदलि देत विश्वास बहुत अछि

दोस्तियारी बिना ई राह कठिन अछि
निभरोस रहू तँ काल्हि कठिन अछि

अनठेने नै दै छी कान बात किए यौ
घृणो तँ करू जँ सएह भरल अछि

केलहुँ जखन जे काज सेहो नै हट्ठे
भेल नै होअए से काज केलहुँ अछि

सनेस हमर जे नीक नै लगलनि
प्रेमक दूट आखर केओ सुनै अछि

जे फुलवाड़ी लगा कृपा करै जाइ छी
आपरूपी बूढ़ नेना बनैत अछि

बिसबासी लोक जे जीवनमे हमर
प्रेम लै-दै बला समाजक परिचर

चिन्ताक मोटगर रेख कपारपर
छल छोट से बनल आब छेबगर

जतेक माँगलक देलहुँ बेशिये कऽ
रेख नहि आओल कखनो माथपर

जकरा पदक होश बेहोश बनौने
घृणा चक्कूओसँ बेशी अछि धरगर

दोसराक दर्दसँ दुखी भेलहुँ अछि
नेनोसँ बेशी जे भेलहुँ सुखितगर

खेत-खम्हारक काज कऽ सकलहुँ
सप्पत देल गप्प निमाहि देलहुँ

बिसबास रहए तेँ झगड़ा-झाँटी
पाइ तँ आएल समए गमेलहुँ


झगड़ा करैत छी बहुत अहाँसँ
प्रेम करैत छी बुझा ने सकलहुँ

आकांक्षाक पजरैत अग्निक बिच
पैघ छी तकर चेन्हासी कहलहुँ

देखै छी बजै ने छी कोना ने ई कहू
हमहूँ ओहिना घुरा कऽ कहलहुँ

भय रहित सत्यसँ भेँट भेल
सुरेब सम्पूर्ण छल अविचल

चित्रक रंगक करतब लेल
उद्देश्यक पाछाँ भटकि रहल

बड़का सन काजक छाह अछि
देखल विस्तृत सुन्दर बनल

आजुक बात खतम होएत यौ
भोरुका बसात से बिर्रो बनल

पूछू सभसँ आ छोड़ू नै ककरो
नव विहान किए छल रोकल

दिन-राति बीतल से मोन पड़ल ऐ
अपन आ आनोपर भरोस अछिये

आस्ते सँ जे सिहकि उठल ई बसात
अन्तर्मनक शक्ति बदलि देत सत्ते

विश्वासपर अडिग चलि रहल छी
नवजीवनपथ समस्या ने कोनो ऐ

सिखबाक ई इच्छा खतम भऽ गेने की
मगजक शान्ति भेटत के ई कहै ऐ

ओहि सोचल बुनल असत्य बातक
सत्यक प्रति ई नरम जे भेलहुँ ऐ

मोन पाड़ल नीक खराप बिसरि कऽ
मित्र बढ़ल अछि आ शत्रु कमल ऐ
छातीक धरधड़ी घटि बढ़ल अछि
पएर थाकल बेहोशी थम्हल नहि

प्रेममे पड़ि घुरमि हम रहल छी
साँस फुलल आ उद्वेग कमल नहि

निन्नक मारल अछि आँखि फुलल ई
प्रेमक सभटा आख्यान कहल अछि

कहू किए अछि ई चित घबड़ाएल
स्मृति हँसि सूरति बदलल अछि

माँछ बिनु पानिक उन्टा प्रेम हम्मर
प्रेम पाबि खटबताह बनल अछि

हँसैत ओकर जे मुँह हम देखल
सुन्दर सलिल ई धार बहल अछि

आस बहुत छल क्षणमे से बीतल
आस निराशमे कोनो अन्तर नहि

प्रेम पियासल मोन भेल उचाट ई
ई बिसरि गेने तँ बाट बहुत अछि
बकथोथीसँ काज चलत नै
आत्म प्रशंसे बात बनत नै

भौकीसँ हम नै घबड़ाएब
पथमे प्रतिकार करब नै

भार मिलि- कऽ सभ उठबै छी
उठल नै आ की गुड़कल नै

खतम करू बात बड्ड भेल
ठठा हँसू तँ बात बढ़त नै

देखि छूबि अनुभूतिक क्षण
ई पाँती इतिहास बनत नै