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आम चुनाव
अछि गाम-गाम मे उतरि रहल
किछु लोक फेर सँ अनचिन्हार।
अछि पर्व चुनावक आवि गेल
क्षण-क्षण जड़तै सौंसे बिहार।

हमरे गामक किछु लोक बेद
आतंक मचायत अर्थ पाबि।
के कखन ककर दल मे जायत
के छीन लेत सभ वोट आबि।

नहि जानि कते दल बनत फेर
संघर्ष हएत टूटत समाज।
ओ रहत फेर अपने एक्कहि
छै ओकर मात्र विध्वंस काज।

जौं छै सभके उद्ेश्य एक
मानव सेवा कल्याण कार्य।
त’ बनल कियै छै दल सहस्त्र
क’ रहल कियै छै घृणित कार्य।

हम कोना करू प्रतिकार एकर
जड़ि गेल समाजक आत्मबोध।
सभटा जनितो सभ वोट देत
अन्यायक के करतै विरोध।

जातिक अछि भ गेल राजनीति
भाषा भाषा मे भेद भाव।
सभ अपन स्वार्थ मे अंध भेल
क’ रहल मनुक्खक मोल भाव।

बनते सरकार एतय ककरो
नहि बदलि सकत संपूर्ण चित्र।
विपदा बिहार के मिटा सकय
अछि कहाँ आइ ओ एकर मित्र।


सतीश चन्द्र झा

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  1. 1.buddhi nath mishra

    प्रिय सतीश जी,
    अहाँक कविता सामयिक आ अत्यंत विद्धाकर अछि| बहू दिन पर एकटा नीक मैथिली कविता पढ़वाक सौभाग्य भेटल|
    धन्यवाद आ बधाई|
    बुद्धिनाथ मिश्र / देहरादून
    2.kumar amriteshwar

    badd nik laagal, Dhanyabaad

    3.chandan kumar mishra

    very good

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