मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य-पार्ट 2 - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 5 अगस्त 2010

मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य-पार्ट 2

सुशांत झा
एकटा प्रश्न मिथिला राज्य के निर्माण सं सेहो जुड़ल अछि। मिथिला के इलाका अप्पन दरिद्रता, विशालता, भाषाई विशिष्टता के वजह सं राज्य के दर्जा पाबै के पूरा हकदार अछि, लेकिन की सिर्फ मिथिला राज्य बनि गेला सं हमर भाषा के पूरा विकास भय पाओत? हम एतय राज्य बनि गेला के बाद आर्थिक विकास के उम्मीद त कय सकै छी लेकिन की भाषाई आ सांस्कृतिक विकास भय पाओत ? उत्तराखंड या छत्तीसगढ़ बनि गेला के बादो ओतय के स्थानीय भाषा के की हाल अछि, ई एकटा शोध के विषय भय सकैत अछि। दोसक गप्प, मैथिली के एकरुपता सं जुड़ल अछि। एतय मैथिल भाषी आ ओकर साहित्यकार खुद एकर जिम्मेवार छथि। दरभंगा-मधुबनी के मैथिली के मानक बना कय हम केना पूरा मिथिला के ठीका उठबै के दावा कय सकैत छी ? एखनो दरभंगा-मधुबनी के भाषाई अहं, सहरसा-पूर्णिया आ मधेपुरा बला के अहि आन्दोलन के शंका के दृष्टि सं देखै पर मजबूर कय रहल अछि। हमर ई माननाई अछि जे मैथिली कतौ के हुए, ओकर मूल रुप में जाबे तक ओकरा स्वीकार नहि कयल जाओत, मिथिला आ मैथिली आन्दोलन के बहुत फायदा नहि हुअ बला।

दोसर बात फेर लिपि के अछि। की हम मिथिला राज्य बनि गेला के बादो मैथिली के मिथिलाक्षर में लिखि सकब ? की हम देवनागरी सं मुक्त भय सकब ? की हम राष्ट्र के मुख्यधारा सं टकराई के साहस कय सकब...आ दरभंगा-सहरसा के शहरी वर्ग के मैथिली बाजै आ लिखै के लेल मना या प्रेरित कय सकब-ई लाख टका के प्रश्न। देखल जाए त सांस्कृतिक रुप सं हमर मिथिला, बंगाल के बेसी नजदीक अछि, लेकिन हमर राजनीतीक जुड़ाव हिंदी पट्टी सं स्थापित कय देल गेल अछि। इतिहास के अहि आघात सं मुक्ति कोना भेटत, राज्य निर्माण एकटा कदम त भय सकैत अछि, लेकिन हिंदी के इन्फ्रास्ट्रक्चर हमर जनता के मजबूर कय देने अछि जे हम अपन लेखन या पाठन हिंदी में करी। हमरा ओकर लत लागि गेल अछि आ हमर भाषा सिर्फ बाजै के भाषा बनि कय रहि गेल अछि। तखन उपाय की अछि ?

मैथिली के बारे में किछु विज्ञ लोक सं जखन चर्चा होईत अछि त कहैत छथि जे 50 या 60 के दशक में जते मैथिली के आन्दोलन मजबूत छल ओते आब नहि। सर गंगानाथ झा, या अमरनाथ झा या उमेश मिश्र या हरिमोहन बाबू घनघोर मैथिलवादी छलाह। ओ या त अंग्रेजी में संवाद करैत छलाह या फेर मैथिली में। ओ हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद के चीन्ह गेल छलाह- ओ उर्जा एखन कहां देखि रहल छी ?

हमर बहिन कैलिफोर्निया में रहैत अछि। ओकरा ओतय कयकटा मैथिल टकराईत छथिन्ह जे मैथिलीये में गप्प करैत छथि। लेकिन ई चेतना भारत में कहां अछि ? एतय ओ हिंदी कियेक बाजय लगैत छथि ? जे अपनापन ओ अमेरिका में ताकय चाहैत छथि ओ भारत में कियेक नहि करैत छथि-एकर कोनो जवाब हमरा नहि सुझाईत अछि।

एम्हर किछु लोग बहुत एलीट भेला के बाद फेर सं अपन रुट सं जुड़ै के कोशिश कय रहल छथि। शायद ओ हॉलीवुड स्टार सबसं प्रेरणा ल रहल होईथि। ओरकुट या फेसबुक पर मिथिला के गामक तस्वीर फेर सं जागि रहल अछि। एकटा महत्वपूर्ण भूमिका मिथिला पेंटिंग के सेहो अछि। लेकिन लेखन या पठन के स्तर पर एखनो लोग मैथिली सं कहां जुड़ि पेला अछि? जाहि भाषा-भाषी के जनसंख्या 2 करोड़ सं ऊपर हुए ओतय कोनो नीक अखबार या पत्रिका कहां देखि रहल छी। तखन त इंटरनेट के धन्यवाद देबाक चाही जे ओ एहि दिसा में नीक काज कय रहल अछि-कारण जे अहि में पूंजी कम लगैत छैक।

एकटा उम्मीद ऑडियो-विजुअल माध्म सं अछि लेकिन हमर भाषा ओहू मोर्चा पर भोजपुरी जकां प्रदर्शन नहि कय रहल अछि। हलांकि भोजपुरी के विशाल आबादी आ अंतराष्ट्रीय बाजार ओकरा सहयोग कय रहल छैक लेकिन ओहू सं बेसी महत्वपूर्ण हमरा जनैत ई जे हमर भाषा बेसी क्लासिकल होई के वजह सं अहि मोर्चा पर पिछड़ि रहल अछि। मैथिली भाषा लेखन के परंपरा सं विकसित भेल अछि आ बेसी मर्यादित अछि, जखन की भोजपुरी में लेखन के परंपरा सं बेसी बाचन के परंपरा छैक। ई क्लासिकल भेनाई हमर भाषा के पोपुलर कल्चर सं काटि कय राखि देने अछि। मिथिला में संभ्रान्त वर्ग के मैथिली अलग आ आम जन के मैथिली अलग भय गेल छैक। एकर अलावा लेखन के परंपरा होईके कारण एकर लोकगीत आ नाट्य में एक प्रकारक अश्लीलता या बेवाकपन के बड्ड कमी छैक जे भोजपुरी में प्रचुर रुप सं छै। ताहि कारणें हमर भाषा में हाहाकारी रुप सं हिट लोकगीत के कैसेट या फिल्म नहि बनि पबैत अछि। परिणाम ई जे मैथिलियों के दर्शक भोजपुरिये गीत या फिल्म के आनंद बेसी लैत छथि-जे बाजार द्वारा हुनकर बेडरुम तक पहुंचा देल गेल अछि। लोक ‘महुआ’ चैनल त देखैत छथि लेकिन ‘सौभाग्य मिथिला’ के बारे में कतेक लोक के पता छन्हि ? मैथिली के बाजार नहि बनि पायल अछि। इहो प्रश्न विचारणीय।

तखन हमर भाषा के उम्मीद कतय अछि ? की सिर्फ ‘विल पावर’ आ गार्जियन सबके अतिशय जागरुकताये हमर उम्मीद अछि जे ओ अप्पन बच्चा सबके कम सं मैथिली जरुर सिखाबथु या आओर किछु ?

लगैये हम बेसी निराश भय रहल छी। शायद हमरा एतेक निराश नहि हुअक चाही। जे भाषा हजार साल सं लेखन आ वाचिक परंपरा सं जीवित अछि ओ आगूओ जीवैत रहत। एकर त्राता ओ किछु हजार या लाख लोग नहि छथि जे दरभंगा-पटना या दिल्ली में आबि क कॉरपोरेट भय गेल छथि-बल्कि ई भाषा करोड़क करोड़ मैथिल भाषी के हृदय में जीवित अछि जे एखनो कोसी के बाढ़ि आ जयनगर रेलवे लाईन के कात में पसरल हजारो गाम में रहैत छथि। हमर ई विवशता अछि जे हमर युवा आबादी, जवान होईते देरी दिल्ली-बंबै भागि जाईत अछि। अबै बला समय में जखन आर्थिक गतिविधि हमरा इलाका में पसरत त लोक के पलायन नहि हेतै, लोक अप्पन भाषा में संवाद करैत रहत। अहि शुभेच्छा के जियबैक लेल हमरा आर्थिक लड़ाई लड़य पड़त। दिल्ली आ पटना के सरकार सं अप्पन हक मांगय पड़त, इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करय पड़त। शायद मिथिला राज्य ओहि दिसा में एकटा पैघ कदम साबित हुए। कमसं कम मिथिला राज्य के निर्माण के अहि आधार पर जरुर समर्थन करक चाही। आ मैथिल बुद्धिजीवी सबके के अहि आन्दोलन में अहम भूमिका के निर्वाह करैय पड़तन्हि।(समाप्त)

(ई आलेख 'समाद' पर सेहो छपि चुकल अछि)