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सुशांत झा
एकटा प्रश्न मिथिला राज्य के निर्माण सं सेहो जुड़ल अछि। मिथिला के इलाका अप्पन दरिद्रता, विशालता, भाषाई विशिष्टता के वजह सं राज्य के दर्जा पाबै के पूरा हकदार अछि, लेकिन की सिर्फ मिथिला राज्य बनि गेला सं हमर भाषा के पूरा विकास भय पाओत? हम एतय राज्य बनि गेला के बाद आर्थिक विकास के उम्मीद त कय सकै छी लेकिन की भाषाई आ सांस्कृतिक विकास भय पाओत ? उत्तराखंड या छत्तीसगढ़ बनि गेला के बादो ओतय के स्थानीय भाषा के की हाल अछि, ई एकटा शोध के विषय भय सकैत अछि। दोसक गप्प, मैथिली के एकरुपता सं जुड़ल अछि। एतय मैथिल भाषी आ ओकर साहित्यकार खुद एकर जिम्मेवार छथि। दरभंगा-मधुबनी के मैथिली के मानक बना कय हम केना पूरा मिथिला के ठीका उठबै के दावा कय सकैत छी ? एखनो दरभंगा-मधुबनी के भाषाई अहं, सहरसा-पूर्णिया आ मधेपुरा बला के अहि आन्दोलन के शंका के दृष्टि सं देखै पर मजबूर कय रहल अछि। हमर ई माननाई अछि जे मैथिली कतौ के हुए, ओकर मूल रुप में जाबे तक ओकरा स्वीकार नहि कयल जाओत, मिथिला आ मैथिली आन्दोलन के बहुत फायदा नहि हुअ बला।

दोसर बात फेर लिपि के अछि। की हम मिथिला राज्य बनि गेला के बादो मैथिली के मिथिलाक्षर में लिखि सकब ? की हम देवनागरी सं मुक्त भय सकब ? की हम राष्ट्र के मुख्यधारा सं टकराई के साहस कय सकब...आ दरभंगा-सहरसा के शहरी वर्ग के मैथिली बाजै आ लिखै के लेल मना या प्रेरित कय सकब-ई लाख टका के प्रश्न। देखल जाए त सांस्कृतिक रुप सं हमर मिथिला, बंगाल के बेसी नजदीक अछि, लेकिन हमर राजनीतीक जुड़ाव हिंदी पट्टी सं स्थापित कय देल गेल अछि। इतिहास के अहि आघात सं मुक्ति कोना भेटत, राज्य निर्माण एकटा कदम त भय सकैत अछि, लेकिन हिंदी के इन्फ्रास्ट्रक्चर हमर जनता के मजबूर कय देने अछि जे हम अपन लेखन या पाठन हिंदी में करी। हमरा ओकर लत लागि गेल अछि आ हमर भाषा सिर्फ बाजै के भाषा बनि कय रहि गेल अछि। तखन उपाय की अछि ?

मैथिली के बारे में किछु विज्ञ लोक सं जखन चर्चा होईत अछि त कहैत छथि जे 50 या 60 के दशक में जते मैथिली के आन्दोलन मजबूत छल ओते आब नहि। सर गंगानाथ झा, या अमरनाथ झा या उमेश मिश्र या हरिमोहन बाबू घनघोर मैथिलवादी छलाह। ओ या त अंग्रेजी में संवाद करैत छलाह या फेर मैथिली में। ओ हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद के चीन्ह गेल छलाह- ओ उर्जा एखन कहां देखि रहल छी ?

हमर बहिन कैलिफोर्निया में रहैत अछि। ओकरा ओतय कयकटा मैथिल टकराईत छथिन्ह जे मैथिलीये में गप्प करैत छथि। लेकिन ई चेतना भारत में कहां अछि ? एतय ओ हिंदी कियेक बाजय लगैत छथि ? जे अपनापन ओ अमेरिका में ताकय चाहैत छथि ओ भारत में कियेक नहि करैत छथि-एकर कोनो जवाब हमरा नहि सुझाईत अछि।

एम्हर किछु लोग बहुत एलीट भेला के बाद फेर सं अपन रुट सं जुड़ै के कोशिश कय रहल छथि। शायद ओ हॉलीवुड स्टार सबसं प्रेरणा ल रहल होईथि। ओरकुट या फेसबुक पर मिथिला के गामक तस्वीर फेर सं जागि रहल अछि। एकटा महत्वपूर्ण भूमिका मिथिला पेंटिंग के सेहो अछि। लेकिन लेखन या पठन के स्तर पर एखनो लोग मैथिली सं कहां जुड़ि पेला अछि? जाहि भाषा-भाषी के जनसंख्या 2 करोड़ सं ऊपर हुए ओतय कोनो नीक अखबार या पत्रिका कहां देखि रहल छी। तखन त इंटरनेट के धन्यवाद देबाक चाही जे ओ एहि दिसा में नीक काज कय रहल अछि-कारण जे अहि में पूंजी कम लगैत छैक।

एकटा उम्मीद ऑडियो-विजुअल माध्म सं अछि लेकिन हमर भाषा ओहू मोर्चा पर भोजपुरी जकां प्रदर्शन नहि कय रहल अछि। हलांकि भोजपुरी के विशाल आबादी आ अंतराष्ट्रीय बाजार ओकरा सहयोग कय रहल छैक लेकिन ओहू सं बेसी महत्वपूर्ण हमरा जनैत ई जे हमर भाषा बेसी क्लासिकल होई के वजह सं अहि मोर्चा पर पिछड़ि रहल अछि। मैथिली भाषा लेखन के परंपरा सं विकसित भेल अछि आ बेसी मर्यादित अछि, जखन की भोजपुरी में लेखन के परंपरा सं बेसी बाचन के परंपरा छैक। ई क्लासिकल भेनाई हमर भाषा के पोपुलर कल्चर सं काटि कय राखि देने अछि। मिथिला में संभ्रान्त वर्ग के मैथिली अलग आ आम जन के मैथिली अलग भय गेल छैक। एकर अलावा लेखन के परंपरा होईके कारण एकर लोकगीत आ नाट्य में एक प्रकारक अश्लीलता या बेवाकपन के बड्ड कमी छैक जे भोजपुरी में प्रचुर रुप सं छै। ताहि कारणें हमर भाषा में हाहाकारी रुप सं हिट लोकगीत के कैसेट या फिल्म नहि बनि पबैत अछि। परिणाम ई जे मैथिलियों के दर्शक भोजपुरिये गीत या फिल्म के आनंद बेसी लैत छथि-जे बाजार द्वारा हुनकर बेडरुम तक पहुंचा देल गेल अछि। लोक ‘महुआ’ चैनल त देखैत छथि लेकिन ‘सौभाग्य मिथिला’ के बारे में कतेक लोक के पता छन्हि ? मैथिली के बाजार नहि बनि पायल अछि। इहो प्रश्न विचारणीय।

तखन हमर भाषा के उम्मीद कतय अछि ? की सिर्फ ‘विल पावर’ आ गार्जियन सबके अतिशय जागरुकताये हमर उम्मीद अछि जे ओ अप्पन बच्चा सबके कम सं मैथिली जरुर सिखाबथु या आओर किछु ?

लगैये हम बेसी निराश भय रहल छी। शायद हमरा एतेक निराश नहि हुअक चाही। जे भाषा हजार साल सं लेखन आ वाचिक परंपरा सं जीवित अछि ओ आगूओ जीवैत रहत। एकर त्राता ओ किछु हजार या लाख लोग नहि छथि जे दरभंगा-पटना या दिल्ली में आबि क कॉरपोरेट भय गेल छथि-बल्कि ई भाषा करोड़क करोड़ मैथिल भाषी के हृदय में जीवित अछि जे एखनो कोसी के बाढ़ि आ जयनगर रेलवे लाईन के कात में पसरल हजारो गाम में रहैत छथि। हमर ई विवशता अछि जे हमर युवा आबादी, जवान होईते देरी दिल्ली-बंबै भागि जाईत अछि। अबै बला समय में जखन आर्थिक गतिविधि हमरा इलाका में पसरत त लोक के पलायन नहि हेतै, लोक अप्पन भाषा में संवाद करैत रहत। अहि शुभेच्छा के जियबैक लेल हमरा आर्थिक लड़ाई लड़य पड़त। दिल्ली आ पटना के सरकार सं अप्पन हक मांगय पड़त, इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करय पड़त। शायद मिथिला राज्य ओहि दिसा में एकटा पैघ कदम साबित हुए। कमसं कम मिथिला राज्य के निर्माण के अहि आधार पर जरुर समर्थन करक चाही। आ मैथिल बुद्धिजीवी सबके के अहि आन्दोलन में अहम भूमिका के निर्वाह करैय पड़तन्हि।(समाप्त)

(ई आलेख 'समाद' पर सेहो छपि चुकल अछि)

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  1. Hi Dear my name is a ashok jha sorry i m not write to my lunge but reading and speaking i love all my all maithil family's sorry dear pls cont.me my cell number 9146452101

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  2. -------------मनोज कुमार झा "प्रलयंकर"


    छोटे-छोटे राज्यों के निर्माण की मांग तो वर्षों से चली आ रही है, किन्तु झारखंड. उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद इस तरह की मांग और बढ़ गयी. इसी क्रम में मिथिला राज्य के निर्माण की बात भी है. यह मांग भी वर्षों पुरानी है, परन्तु इसकी सार्थकता पर शायद किसी ने गौर नहीं किया कि इसकी मांग जायज है या नाजायज? मेरी समझ से तो मिथिला राज्य की मांग सर्वथा नाजायज है. उससे ज्यादा जरुरी है मिथिला का सर्वांगीण विकास.
    अभी मैं ६ जून से ९ जून तक दरभंगा, १० जून से १३ जून तक बेगुसराय , १४ जून से १६ जून तक समस्तीपुर, १७ और १८ जून को मुजफ्फरपुर तथा १९ जून से २१ जून तक छपरा में था. मुझे लगा कि वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नितीश जी के नेतृत्व में विकास का काम हों रहा है. समस्तीपुर से दरभंगा जाने वाली सड़क में लगभग सभी पूलों का निर्माण कार्य चल रहा था. किन्तु ६ जून को जब मैं बागमती ट्रेन से उतर कर अम्बेसडर कार से बेता चौक जा रहा था मुझे लगा कि मैं खेत में ट्रेक्टर चला रहा हूँ, पूरे शरीर की हड्डी खिसक गई. अगर कोई गर्भवती महिला होती तो शायद गर्भपात हों जाता. मुझे लगा कि दुनिया भर की तमाम गंदगी भी आकर दरभंगा में ही एकत्र कर दी गयी है. मच्छरों की संख्या भी उतनी ही. आखिर इस विकासशील समय में भी दरभंगा का विकास उस रूप में क्यों नहीं हों रहा है जिसकी अपेक्षा की जाती है? क्या मिथिला राज्य की राजधानी बनने के बाद वह विकसित होकर बंगलोर, चेन्नई, लखनऊ या भोपाल के बराबर हों जाएगा या फिर एक और मधु कोड़ा को जन्म देगा जो बची-खुची संपदा और संसाधनों का वारा-न्यारा कर देगा. मिथिला राज्य के पास क्या बचेगा- कोशी और कमला बलान का पानी, हर साल बाढ़ की तबाही, आम, धान, पान, माँछ और मखान की खेती जो पूर्णत: प्रकृति पर निर्भर है, फिर नरेन्द्र मोदी जैसे किसी मुख्यमंत्री से अनुदान या केंद्र सरकार की कृपा-दृष्टि? फिर एक अहम् मुद्दा यह भी है कि चंद्रशेखर राव की तरह भूख हड़ताल या आत्मदाह करने वाले कितने नेता हैं जो मिथिला राज्य की मांग कर रहे हैं? शायद ऐसी स्थिति आने पर सब दुम दबाकर भाग खड़े होंगें, मिथिला में नेता के अभाव के साथ-साथ सामंजस्य की भी कमी है. अभी मैंने दरभंगा की एक कन्या की शादी बेगुसराय के लड़के से करबाई. कन्या पक्ष वाले बार-बार बेगुसराय की बुराई कर रहें थे, जबकि वह भी मिथिला में ही आता है, मुझे काफी बुरा लगा और मैंने कहा कि "श्रीमान! अच्छे बुरे तो सब जगह होते हैं, जिला या स्थान क्या करेगा? क्या काबूल में गधे नहीं होते है? हाँ इतनी बात जरुर है कि मधुबनी की मिट्टी नरम है इसलिए वहां के लोग उदारवादी होते हैं, ज्यों-ज्यों दक्षिण बढ़ते जाएँ त्यों-त्यों मिट्टी कड़ी होती जाती है और उसी हिसाब से उनकी बोली भी कड़ी होती जाती है. लक्खीसराय और मुंगेर की बोली तो और भी कड़ी है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वे बुरे लोग हैं, मुझे तो ऐसा लगता है कि पानी पड़ने पर दक्षिण की मिट्टी काफी लसदार हों जाती है, ठीक उसी प्रकार दक्षिण के लोंगो के साथ पानी की तरह नरमी से पेश आयें तो वे ज्यादा ही लसदार लगेंगे. इस तरह से सम्बन्ध हुआ और लोंगों ने मेरी बात को महसूस किया. इसलिए पहले हमें मिथिला की परिभाषा तय करनी होगी, उसका परिसीमन करना होगा, उनमे एकरूपता लानी होगी, मिथिला की परम्परा को बचाना होगा, मिथिलाक्षर की पढ़ाई को अनिवार्य करना होगा. मिथिला पेंटिंग और बांस तथा सींक से बनी वस्तुओं को कुटीर उद्योग की श्रेणी में लाकर उसको प्रोत्साहित करना होगा, इन सब चीजो को बचाने या इसको बढ़ावा देने वाले कितने लोग हैं? सिर्फ मिथिला राज्य की मांग को लेकर बैठे है. ज़रा सोचिये, गौर करिए, फिर आगे और भी बातें होंगी. शुक्रिया.
    (पुन: मैथिली की बजाय हिन्दी में लिखने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ, ऐसा नहीं है कि मुझे मैथिली नहीं आती है? हमारे कुछ मित्रों को मैथिली नहीं आती है उनका ध्यान रखते हुए इस भाषा में लिखी गई है) --
    -------------मनोज कुमार झा "प्रलयंकर"
    कल्याणपुर, समस्तीपुर
    (विगत १२ वर्षों से चेन्नई में )

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  3. अजीत-मैसूर।

    धन्यवाद सुन्दर आ विचारणीय आलेख लेल।
    निश्चित रुपेँ मिथिला-मैथिलीक उचित विकास लेल जँ केओ एक गोटे दोषी तँ ओ स्वयं मैथिल थिकाह। हुनका एखनो लाज होइत छनि अपन भाषामे गप करबामे, खास कए मिथिला क्षेत्रमे। अपनेँ कहबे कएल जे विदेशमे रहितो बहुतो मैथिल अपन मातृभाषाक प्रयोग कए गर्वक अनुभव करैत छथि, मुदा मिथिलामे? एहि हेतु आवश्यकता छैक दृढ़निश्चयक ।
    जतए धरि लिपिक प्रश्न अछि, बहुतो व्यक्ति तत्कालिन महराज पर कदीमा फोड़ि अपन मनक भरास निकालि अपन कर्त्तव्यकेर इतिश्री बुझि लैत छथि, मुदा से ठीक नहि। जे ओहि दिन नहि भेलैक से आइ भए रहल अछि कि नहि? तखन! हमसभ मिथिलाक्षरकेर विकास कए मैथिलीकेँ पूर्ण उर्जा शक्ति दए सकैत छी। एतेक भेलाक बादो गाम पाछू कतेक गोटे मिथिलाक्षर जनैत छथि? पुन एतए दृढ़ शक्तिक आवश्यकता छैक, जकर बिना सभ किछु सुन्न।
    अपनेँक एक गोट गप सँ हम सहमत नहि छी जे दरभंगा-मधुबनीकेँ मानक बना मैथिलीक विकास चाहब? जँ एहन गप रहितैक तँ मायानन्द मिश्र, सुभाषचन्द्र यादव, नचिकेताजी आदि मैथिलीक शीर्षस्थ नहि होइतथि, हँ तखन मानक केर प्रश्न छैक तँ ककरो मानक तँ बनबै पड़त, आ एहि हेतु मुह नहि बोली सुनए पड़त, जतए मैथिलीक बेसी सँ बेसी प्रयोग भए रहल अछि, तकरा देखए पड़त, मुदा तेँ एतए 'गाछ एत्तहि रोपब' से बला पड़ि नहि होएबाक चाही। प्राय: सभ भाषामे किछु ने किछु मतान्तर छैके, तेँ एकरा मात्र मैथिलीक समस्या बुझि घबड़एबाक गप नहि। आवश्यकता छैक मैथिलीक शीर्ष संस्था ओ सरकारी संस्था (जतए मैथिलीक प्रयोग भए रहल अछि, जेना- साहित्य अकादमी, मैथिली अकादमी, भारतीय भाषा संस्थान आदिकेर) केर जे ओ एकटा मानक मैथिलीक निर्धारण करए आ ओकरहि अनुसारेँ अपन कार्य संचालित कराबए।
    अस्तु, फेर बादमे
    अजीत-मैसूर।

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