झूमि रहल अछि केयो शराब पी... - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 29 जुलाई 2010

झूमि रहल अछि केयो शराब पी...



झूमि रहल अछि केयो शराब पी...
हम पानी लेल तरशै छी,
जेम्हरे भरल नदी नाला सब,
हे मेघ! अहूँ ओम्हरे बरसै छी,


दुनिया बढ़ि गेल मंगल ग्रह तक,
हम धरती के धयने छी,
ककरो खा के पेट फुलल छै
हम दस दिन सं बिन खयने छी,


खा के जिनकर मोन अघा गेल
हुनके दिस परशै छी,
जेम्हरे भरल नदी नाला सब,
हे मेघ! अहूँ ओम्हरे बरसै छी,


तन झाँपि सकब हम से उपाय नहिं
केकरो बहुत-बहुत कपड़ा छै,
केकरो आलिशान महल छै,
नहिं हमरा घर पर खपड़ा छै,


हमरा घर के हाल देखि के,
मोनहि मोन हरशै छी,
जेम्हरे भरल नदी नाला सब,
हे मेघ! अहूँ ओम्हरे बरसै छी,


ककरो पुत्र पढय लन्दन में
हमर पुत्र गोबर चुनै ए.
ककरो पत्नी परल सेज पर.
हम्मर पत्नी माथ धुनै ए,


फेर अहाँ ग़ुम किये भेल छी
इ हाल हमर दरशै छी,
जेम्हरे भरल नदी नाला सब,
हे मेघ! अहूँ ओम्हरे बरसै छी,


केयो कानै अछि बिलखि-बिलखि के,
केयो गीत खुशी के गावै ए,
दिन-राति इएह सब सोचि-सोचि के
नींद न हमरा आबई ए,


ग्रह ग्रसित त भेले छी फेर
अहाँ किये गरसै छी,
जेम्हरे भरल नदी नाला सब,
हे मेघ! अहूँ ओम्हरे बरसै छी,


लेखक : मनोज कुमार झा (प्रलयंकर), कल्यानपुर (समस्तीपुर)