छी मानव अलबत्ते हम (कविता) - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 14 जुलाई 2010

छी मानव अलबत्ते हम (कविता)

मजदूरक दुर्दशा आ तदुपरान्तो सकारात्मक सोच देखि, मजदूर दिवस- १ मई क' हमर ह्रदय स' प्रस्फुटित एक गोट कविता I

छी मानव अलबत्ते हम

नहि झूठ बजै छी
नहि फूसि बजै छी
जे बाजै छी से सत्ते हम
नहि चोरि करै छी
नहि डाका दै छी
छी मानव अलबत्ते हम

आशक महल बनौने जाई छी
ई नहि बूझी जे मजदूर छी
बड़का सपना बड़के पुरबैइयै
हम त' परम मजबूर छी
सीमित दुनिया मोर मजदूरक
तै रही सतत एकमत्ते हम
छी मानव अलबत्ते हम

रौदक धाह वा जारक कनकन्नी
जोन-बोइनहारक जीवन जीबी
थाकल हारल घर में आबि क'
सांझ क' भरि छाक तारी पीबी
ठेही मिटब' लेल करू उपाय की
तैं लगेने तेहने लत्ते हम
छी मानव अलबत्ते हम

दू सेर बोइनक खातिर रोजे
मेहनैत के घाम चुबाबी हम
कोंढ़ तोड़ि क' काज करै छी
पाथर पर दूभि जनमाबी हम
दिन कहुना क' काटि रहल छी
बुझू भरि रहल छी खत्ते हम
छी मानव अलबत्ते हम

मृग-तृष्णा दिस भागि रहल छी
कहियो ने कहियो त' दिन घुमतै
हम नहि पढ़लहु त' की भेलै
कम-स-कम धिया-पुता त' पढ़तै
पोथी-पिलसिम त' जुमा देबै
मुदा करम बनेबै कत्ते हम
छी मानव अलबत्ते हम

हमरा कोना नैं हैत मनोरथ
जे हमहूँ हाकिम के बाप कहाबी
गम-गम करितै हमरो घर-आँगन
हमहूँ एहेन गाछ लगाबी
खैट रहल छी मिठका फल पाबइलै
खैट सकै छी जत्ते हम
छी मानव अलबत्ते हम


मनीष झा "बौआभाई"
ग्रा.+पो.-बड़हारा, भाया-अंधरा ठाढ़ी
जिला-मधुबनी(बिहार)-८४७४०१
हमर ब्लॉग:
http://manishjha1.blogspot.com/