गजल - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 12 जुलाई 2010

गजल

गप्प हमरा संग अहाँ करैत रहू
एहिना मोन हमर जुरबैत रहू

मोन कहिओ नहि भरतैक केकरो
हम अहाँ के छूब अहाँ हमरा छूबैत रहू

बरसि जेतै सभतरि अमरित केर बरखा
कनी कनडेरिए अहाँ देखैत रहू

चलू दोस्त नहि दुश्मने बनि जाउ हमर
आ करेज सँ करेज भिरा लड़ैत रहू

अनचिन्हार लिखत प्रेमक पाँति
करेज पर हाथ राखि एकरा पढ़ैत रहू