मादा काँकोड़- धीरेन्द्र - मिथिला दैनिक

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रविवार, 4 जुलाई 2010

मादा काँकोड़- धीरेन्द्र

दीयठि पुर लुक-लुक करैत माटिक दीप। कहुना घरक सघन अन्हारक करेजकेँ फाड़बाक चेष्टा करैत। पुआरक सेजौट पर पतियानी-जोड़सँ सूतल सात गो नेना, गोनरि ओढ़ने आ सेजौटक एक छोर पर घोकड़िआएल बैसलि बुधनी, अर्थात् एहि सातो मानवीय कायाक जननी। कनकनी ततेक बढ़ि गेल छलै जे निन्नो ने भ’ रहल छलै। दोसर गप्प ई छलै जे गोनरि एक्केटा छलै, जाहिसँ झाँपि कहुना टेल्ह सभक रक्षा क’ रहलि छल। ओकरो सभकेँ अशौकर्ये भ’ रहल छलै। कनिएँ क्यो करौट फेरै कि दोसराक देह उघार भ’ जाइ आ बुधनी फेर ससारि-पसारि सभकेँ झाँपि दै। ठारक हमलासँ अपन नेना सभक रक्षा करैत माइ! अपन परवाहि करओ तँ कोना?
बच्चा सभ तँ सूतल छल, मुदा घोकड़ी काढ़ने बैसलि बुधनी जेना एकटा मनकथाक संसारमे हेरा गेल छल। आँगुरक पोर पर गनलक-पूरा पूरी बारह बरख भ’ गेलै अइ गाम एना, आ बरखक माझेमे तँ जनमि गेल रहै सुकना, माने ओकर जेठका छौंड़ा। कैली टा जनमल तीन बरखक बाद, आ तकर बाद ढेबाहि लागि गेल। जे हो छओ भाइ छै आ एक बहिन। भगवान निकेँ-ना रखथुन। जनम देलखिन अछि, तँ प्रतिपालो करबे करथिन! ...मुदा... मुदा... ध्यान एकाएक चल गेलै। दरबरिया दिश, अर्थात् अपन घरवला दिश। जनमक गप्प अएलै, तँ ओ मोन पड़ि गेलै। ओना चारि-पाँच बरखसँ मुँहो ने देखलकैए, मुदा ताहिसँ की। ओहिना फोटो घिचाएल छै मोनमे। ओ भने बिसरि जाओ, बुधनी कोना बिसरतै? सोचलक बुधनी- लोक कहै तँ छै जे भगवान जनम देलखिन, मुदा... मुदा भगवान की सत्ते जनम दै छथिन... एकाएक जेना लजा गेल। सोचलक जे मुँह कुंडाबोर भ’ गेल हेतै। देहमे विचित्रा सिहरन जकाँ बुझेलै... उहूँ, जाड़सँ नइं... दोसरे-दोसरे जकाँ! जेना हेरा गेल कतहु! जेना हेलए लागल हो कोनो पोखरिमे! ...मोन पड़लै ओ पहिले पहिल गप्प! एहने त’ राति रहै। खाली सेजाओटमे सबरंग पटिया रहै आ ओढ़नामे जोलही तौनी, आ ओ... ओ रहै! ...ओ माने... ओ... अइ बेदरा सभक बाप! ...बड़बड़ा उठलि मोनहि-मोन-जोरे चण्डलबा! ...एको बेर मोनो ने पड़ै छियौ आ... आ... ओइ राति केहन भभटपन पसारि ठकि नेने रहें हमरा! ...हाथ अकस्मात् गाल पर चल गेलै। एखनो दाँतक दाग हेबे करतै आ पुनः छाती दिस देखलक आ जोरसँ उसाँस लेलक आ फेर आँखि नोरा गेलै! देखलक जे डिबिया पर एकटा फतिंगा चकभाउर दैत छलै।
बड्ड तामस उठलै फतिंगा पर। भेलै जे जा क’ एक बाढ़नि मारए! ...कोना चकभाउर दै’ए पपियाहा! एहिना तँ ओहो चकभाउर दै आ... आ... कोना बकोटि क’ धएने रहै जेना कहियो छोड़बे ने करत। कहनहुँ त’ रहए... नइं गइ बुधन... कहियो ने छोड़बौ, आ केहन दुलार करए। केहन दिन छलै ओ। ओना गुजर तँ बटैया-फटैया आ बोनि-मजूरीसँ चलै, मुदा लगै छलै जेना सभ किछु रहए आ चारि-पाँच बरख पहिने कोन उदबाहि उठलै जे सोझे कलकत्ता विदा भ’ गेलै। बुधनी बड्ड रोकने रहै, मुदा ओकरा की भ’ गेलै की ने! नइं जानि! कहलकै, बस! एक बरख कलकत्ता कमेबौ आ एक जोड़ा बरद लेबौ! गाड़ी चलाएब! बेसीसँ बेसी बटाइ करब! देखिहें बुधन! की क’ दै छियौ!
आ ओ हारि क’ छोड़ि देने छलै। खाली जएबा काल कहने छलै हँसि क’-हे! बंगला जादूक फेरमे नइं पड़िह’!
मुदा दरबरिया ओकरा पँजिया क’ चुम्मा लैत विश्वास दियौने रहै-धुत्! बताहि! तोरा बिसरब सोझ छै कोनो?
मुदा केहन नीक जकाँ बिसरि गेलै। एक बरख धरि तँ टको-कौड़ी पठबै आ चिट्ठयो-फिट्ठियो लिखै, मुदा तकर बाद तँ जेना गुम्मी लाधि देलकै आ आब... आब तँ सकुंता छौंड़ाक गप्प ठीके लगै छै ओकरा। ठीक बंगालक जादूमे ओझरा गेलै मने!
आ जेना कछमछा उठल बुधनी! कोना-कोना क’ ई चारि बरख बितौलक ओ, आ धीया-पूताकेँ जिऔने जा रहलि अछि। कुटिया-पिसिया, ठिकौतीमे खेत रोपब, पगरबाहि करब, रोड़ी फोड़ब...। की-की करैए ओ। सात टा नेनाकेँ पोसने जा रहलि अछि! मुदा... मुदा... जो रे चण्डलवा! एक्को बेर ने मोन पड़ै छियौ? आ... आ... आकस्मात् तेहन गप्प मोन पड़लै, जे काँपि उठल ओ! ओइ टोलक सुकन्ती बुढ़िया छै ने, से कतए-ने-कतएसँ चल अएलै एम्हरे, आ फेर हुक्का पीबा ले बैसि गेलै। बैसबे टा थोड़बे कएलै। आशा माइक कथा पसारि देलकै। केहन डेराओन गप्प कहि बैसलै-हइ दाइ! जखने मंशा सभ झप्प-झप्प क’ लेध-गेध देबए लागए कोरामे कि बुझि जाइ उड़नमा पंछी छी-मरदबा काँकोड़ जकाँ कहियो-ने-कहियो नेह-छोह छोड़ि देत आ तखन त’ बस! कँकोड़बा बियान कँकोड़बे खाए! ...से, तोरो सैह परि भेलह... आब उघैत रह’ मोटा!...
आ... ओकर मोन काँपि गेल रहै... एखनो काँपि उठलै। तँ सत्ते ओकरो अन्त की मादा काँकोड़े जकाँ हेतै? ...सत्ते ओकरो नरबा काँकोड़ तँ ओकर नेह-छोह छोड़ि बंगलनियाँकेँ ध’ क’ बैसि गेलै, आ... ई धीया-पूता सभ केना खाउँ-खाउँ करैत रहै छै। बासि चाही, कलौ चाही, बेरहटिया चाही आ राति चाही! ...सत्ते ओ मादा काँकोड़ थिक! जेना मादा काँकोड़क पेटमे बच्चा होइते मर्दबा ओकरा छोड़ि नव-नौतारिक पछोड़ ध’ लै छै, तहिना ओकरो...! ओ हिचुकि-हिचुकि कान’ लागल। माथमे नेनपनक दृश्य नाचए लगलै। खूब रेठान मारए बाध-बोनक, जखन नैहरमे छल। अपना बच्चा सभसँ देह खोखरबैत, मरैत वा कौआक आहार बनैत कतेको असोथकित मादा काँकोड़केँ देखने होएत आ बूढ़-पुरनियाँसँ ‘कँकोड़बा बियान कँकोड़बे खाए’ क’ कथा सुनने होएत! त’ की... ओकरो...? ओ एक बेर सातो टा लेध-गेधकेँ देखलक। तँ? ...तँ? ...मुदा... मुदा... मोन पड़लै ओइ दिनका जेठका छौंड़ा सुकनाक गप्प। मोन पड़लै, आ भरि दिन रोड़ा फोड़ि घुरल रहए, ततेक थाकल रहए जे ओम्हरेसँ पैट घाटक हलुआइक दोकानमे सातु कीनि लेलक, आ धीया-पूता ले बीलम झाक दोकानसँ कनेक गूड़ कीनि लेलक सएह खा क’ सभ सूति रहल। ओ त’ आओर थाकल छल। जेठका बेटा आबि पैर जाँत’ लगलै आ कहलकै-...कनेके दिन रहलौए माइ! बेसीसँ बेसी दू बरख! जखन हम ज’नमे जाए लगबौ तँ तोरा थोड़बे हरान होब’ देबौ। आ ममत्वक मधुर आघातसँ ओ कान’ लागल, आइयो आँखि नोरा अएलै। ओ बड्ड आवेशसँ सातो लेध-गेधकेँ देखलक। पुनः नोर पोछि लेलक आ मोने-मोन सोचलक ओ काँकोड़ नइं, मनुखक बेटी छी, ओकर बच्चा सभ मनुखक बच्चा छिऐ, जकरा नेह-छोह होइ छै। नइं, ई बच्चा सभ ओकर करेजक टुकड़ा छिऐ। ओ एना नइं सोचत। आ उठि क’ पुनः सभकेँ गोनरि ओढ़ा देलक आ आवेशसँ सभकेँ देख’ लागल।