क्षमा प्रार्थी छी -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' - मिथिला दैनिक

Breaking

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

क्षमा प्रार्थी छी -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

कतय गेल आ जा रहलय,
हमर ओ अप्पन छवि।
केहन बेदाग छल स्वर्णिम,
साक्ष्य छथि उगल रवि।

कतय गेल उर्वरता हमर माटिक,
जे उगबैत छल बिनु कांट गुलाब।
आश्वस्त छलहुं छवि रहत नीक,
मुदा पूर भेल ने हमर खोआब।

यैह माटि उगओने छल कहियो,
वीर सपूत शिवाजी कें ।
यैह माटि उगओने छल कहियो,
सावरकर, लोकमान्य तिलक कें ।

एकरे उपज छल ओ संत,
जकरा स्वार्थ छलैक ने एको पाई।
जनसेवा कें सर्वोपरि बुझलक,
ओ बनल देव शिरडी साईं।

कयने अछि हमरा अति आकच्छ,
उत्पात मचा 'दू गोट कपूत'।
नहि रहय देलक ई छवि स्वच्छ,
धयने छैक एकरा स्वार्थक भूत।

कयलक ई दुनू घोर कलंकित,
स्वर्णिम इतिहास मराठा कें ।
सेकि रहलय ई बिनु आंच,
अप्पन स्वार्थ पराठा कें।

जं घाव रहैछ कोनो अंग मे,
दुखित होइछ समूचा शरीर।
एहन नालायकक बात पर,
होउ ने अहाँ सभ अधीर।

किन्नहु नहि होयत भला जखन,
प्रान्तक हित देखि छोडि राष्ट्र।
हो खाहे ओ असाम, बंगाल,
वा हम अपने महाराष्ट्र।

डीरिया रहलय जे ई दुनू कुपात्र,
एहन ने हम स्वार्थी छी।
कष्ट पहुंचल अपने सभ कें,
ताहि हेतु हम क्षमा प्रार्थी छी।

http://teoth-aihik.blogspot.com
More Poems (Published) By रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'
Visit- www.rkjteoth.blogspot.com
E-mail: rkjteoth@gmail.com
Mobile-09239415921