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नाटककार, कथाकार आ उपन्यासकारक रुपमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथिली साहित्यमे नूतन उर्जाक संग उपस्थित भेल छथि। हिनक जन्म १९५७ ई. मे भेल। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे हिनक कथा, प्रेरक कथा उपन्यास सेहो प्रकाशित भऽ चुकल अछि।

एहि उपन्यास ‘उत्थान-पतन’ क माध्यमसँ लेखक गामक जिनगीकेँ यथार्थ आ नव रुपमे उपस्थित करबाक चेष्टा कएने छथि। गामक जड़ता, रीति-रिवाज, पावनि-तिहार, मूर्खता, विद्वता, अड़ि जाएबला भाव आ सहज स्वभाव आदि सहज रुपमे आबि गेल अछि।

तत्वक दृष्टिसँ देखल जाए तँ सर्वप्रथम कथावस्तु घ्यानकेँ आकृष्ट करैत अछि। कथावस्तु तँ सशक्त आधार अछि जाहिपर उपन्यासक कतेक रंगक प्रसाद ठाढ़ होइत अछि। जाहिमे जिनगीक श्वास रहब आवश्यक।

उत्थान-पतनमे गंगानंद, यमुनानंद, पंडित शंकर, सुधिया, ज्ञानचंद, भोलिया, विसेसर, भोलानाथ, सुकल, निलमणि, मोहिनी, रीता, महंथ रघुनाथ दास, लीला, दीनानाथ, गुलाब आदि अनेक पात्रसँ सज्जित भऽ अंचलक मार्मिक चित्र उपस्थित भेल अछि।

कथावस्तुमे बिच्छिन्न होइत गाम-घर आ टूटैत बेकती सबहक समस्याकेँ मार्मिक ढंगसँ अभिव्यक्ति कएल गेल अछि। उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि- ‘‘गामे-गाम, कतौ अष्टयाम-कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ तँ कतौ सहस्त्र चण्डी यज्ञ होइत। किएक तँ एगारहटा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हएत की नै हएत कहब कठिन। एकटा बालग्रह बच्चाकेँ भेने तँ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह ग्रह एकत्रित अछि तइठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नामसँ गदमिसान होइत।........ जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग मंडपमे कीर्तन करैत ताधरि घरक सभ सुधि-बुधि बिसरि मस्त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबितहि.......... बच्चाकेँ बाइस-बेरहट लेल ठुनकब सुनि। व्यथाककेँ दबैत सभ आँखिक नोर होइत बहबैत।’’

सामाजिक उत्थान करऽ बला बेकतीकेँ गामक एहि परम्परा आ धार्मिक आडम्बरसँ संधर्ष करऽ पड़ैत अछि। लेखक अपना पात्रक द्वारा अंधविश्वासकेँ तोड़ि परिवर्तन अनबाक प्रयास कएने छथि।

साहित्यक भाषा होएबाक चाही जन-भाषा। जेकरा साधारण जन सहज रुपसँ पचा सकए। एहि उपन्यासक भाषा गाम-घरक बोलचालक भाषा अछि। जेकरा प्रयोग करैत काल सहजहि नव-नव शब्दक निर्माण भऽ गेल अछि। साधारण जनक बोली आ नूतन शब्दक प्रयोग एहि उपन्यासमे प्रचुरताक संग देखल जा सकैत अछि। कथोपकथनमे सहजता संक्षिप्तता आओर स्वभाविकता अछि। जेना एहि कथोपकथनपर दृष्टिपात कएल जा सकैत अछि-

‘‘अगर दसखत कएल नइ होइत होअए तब?’’

‘‘तब की? औंठा निशान दऽ देतइ।’’

‘‘भाय दूटा समांग आएल अछि। दुनूकेँ काज कऽ दहक।’’

‘‘अच्छा थमहह। किरानी बाबूसँ गप्प केने अबै छी।’’

कथोपकथन उपन्यासमे वर्णित जिनगीक अनुकूल अछि। दौड़ैत-पड़ाइत संसारमे बृहताकार उपन्यास पढ़बाक लेल समएक अभाव रहैत अछि। किन्तु भाषा आ शौलीमे जँ आकर्षणक गुण रहैत अछि तँ ओ जनमानसकेँ पढ़बाक लेल अपना दिशि घिचि लैत अछि। ताहि गुणसँ भरल-पूरल एहि उपन्यासक चित्रात्मक शैलीक एकटा उदाहरण देखल जा सकैत अछि।

‘‘गौर वर्ण, रिष्ट-पुष्ट शरीर, घनगर मोंछ, बड़दक आँखि सन नम्हर-नम्हर आँखि सुकलक रहै। कोठीक गेटपर कान्हमे बन्दूक लटका ठाढ़ ड्यूटी सुकल सेठक करैत।’’

एकहि वाक्यमे बहुत बात कहि देब लेखकक बिशेषता अछि। जेना-

‘‘माथपर छिट्टा, दुनू हाथसँ दुनू भाग छिट्टाकेँ पकड़ने, दुलकी डेग बढ़बैत गुलाब, सैंया भेल किसनमा घुनघुनाइत आंगन दिशि लफड़ल चललीह।’’

केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। एहि दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा कएलनि अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भहिसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि।

सामाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहैत छथि जे टूटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जाहिसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतैक आ गामक सम्पूर्ण विकास होएतैक। सबहक संगे सामाजिक न्याय होएतैक। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जाहिसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। एहि माध्यमसँ लेखक देखाबए चाहैत छथि जे अपनहुँ गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करए तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नहि जाए पड़तैक आ पलायन रुकि जएतैक।

एखनहुँ गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नहि पहुँचि सकल अछि। ताहि कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध कएने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजहि एहि उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। एहि तरहेँ देखैत छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित कएने छथि, संगहि आदर्श रुप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि।

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